किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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४४२ किरातार्जुनीयम्
| पाद | स० | श्लो० | पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| मुनयस्ततोऽभिमुख | १२ | २५ | यशोऽधिगन्तुं सुख | ३ | ४० |
| मुनिदनुततयान्विलोम्य | १० | १६ | यष्टुमिच्छसि पितॄन् | १३ | ६५ |
| मुनिमभिमुखतां | १० | ४० | यस्मिन्ननैश्वर्यकृत | ३ | १९ |
| मुनिरहिम निरागसः | १३ | ७ | यः करोति वचोदर्का | १२ | १९ |
| मुनिरूपतोऽनुरूपेण | ११ | २ | यः सर्वपामावरोधा | १८ | ४० |
| मुनिपुदहनातप्ता | १५ | ३० | या गम्याः सत्सहायानां | ११ | २२ |
| मुनेविचित्रैरिविभिः | १७ | १९ | यातस्य ग्रन्थ्यततरंग | ७ | १६ |
| मुनेः शरोघेण तदुग्र | १४ | ५९ | युक्तः प्रमाद्यसि हिता | ११ | २९ |
| मुहुरनुपतता विध्य | १० | ३३ | युक्ताः स्वशक्त्या मुनयः | ८ | २१ |
| मुहुश्चलत्पल्लवलोहिनी | १८ | ५३ | युयुत्सुरिव कवचं | ११ | १५ |
| मूलं दोषस्य हिंसादे | ११ | २० | येनापविद्धसलिलः | ५ | ३० |
| मृगान्धिनिघ्नन्मृगयुः | १४ | ५ | योगं च तं योग्यतमाय | ३ | २६ |
| मृणालिनीनामनुरञ्जितं | ४ | ७२ | योषितः पुलकरोधि | ९ | ४१ |
| मृदितकिसलयः सुराङ्गना | १० | ९ | योषिदुद्धतमनोभव | ९ | ६६ |
| य | र | ||||
| यच्छति प्रतिमुखं | ९ | १० | रक्षोभिः सुरमनुजैः | १८ | ३६ |
| यथा निजे वर्त्मनि | १३ | ५७ | रजनीषु राजतनयस्य | १३ | १२ |
| ययाप्रतिज्ञं द्विषतां | ११ | ७४ | रञ्जिता नु विविधा | ९ | १५ |
| यथायथं ताः सहिता | ८ | २ | रणाय जैत्रः प्रदिशन्निव | १४ | २८ |
| यथास्वमार्गंसित | १४ | ४३ | रथांगसंकीडितमश्व | १६ | ८ |
| यदवोचत वीक्ष्य | २ | २ | रम्या नवद्युतिरुपैति | ५ | ३७ |
| यदात्थ कामं भवता | १४ | १८ | रयेण सा संनिदधे | १७ | ५० |
| यदा विगृह्णाति हतं | १६ | २४ | रहितरत्नचयानशिलो | ५ | १० |
| यदि प्रमाणीकृतमार्य | १४ | १९ | रागकान्तनयनेषु | ९ | ६३ |
| यदि मनसि शमः | १० | ५५ | राजद्भिः पथि मरुता | ७ | ६ |
| यमनियमकृशीकृत | १० | १० | रात्रिरागमलिनानि | ९ | १६ |
| यथा समासादित | ३ | २२ | रामानामवजितमाल्य | ७ | ७ |
| यशसेव तिरोधधन्मुहु | ३ | ५८ | रिक्ते सविभ्रम्भमथा | १७ | ३६ |