किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
पृष्ठ 701, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 701
श्लोकानुक्रमणिका
४४३
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| रुचिकरमपि नार्थं | १० | ६२ | वाससां शिथिलतामुर | ९ | ६५ |
| रुचिरपल्लवपुष्पलता | ५ | १९ | विकचवारिरुह दधतं | ५ | १३ |
| रुचिराकृतिः कनकसानु | ६ | १ | विकसितकुसुमाधारं | १० | ३२ |
| रुजन्महेतुम्बहुधा | १५ | ५१ | विकामुंकः कर्ममु शोच | १३ | ५३ |
| रून्धतो नयनवायव | ९ | ६७ | विकाशमोदूजंगनांण | १५ | ५२ |
| ल | विकोशनिधौततनो | १७ | ४९ | ||
| लघ्वसितया निशां | २ | ५३ | विगणय्य कारकमनेक | ६ | ३७ |
| लभ्यमेकप्रकृतेन | १३ | ५२ | विगाढमात्रे रमणीभि | ८ | ३१ |
| लब्धा चरित्रे तव | ३ | १७ | विचकर्ष च संहितेषु | १३ | १८ |
| लिलिखुस्तेऽथ शरकाल | १६ | ५४ | विचित्रया चित्रपतेव | १६ | ३ |
| लेखया विमलदृग् | ९ | २२ | विच्छिन्नाभ्रविलायं | ११ | ७९ |
| लोकं विधात्रा विहितस्य | ३ | ४१ | विजहीहि रणोत्साहं | ११ | ३१ |
| लोचनाञ्चलकृता | ९ | ६० | विजिगीषते यदि जगन्ति | १२ | ३० |
| लोलदृष्टि वदन | ९ | ५७ | विजित्य यः प्राज्य | १ | ३५ |
| व | विततशीकरराशिभिः | ५ | १५ | ||
| वदनेन पुष्पितलतान्तः | १२ | ४१ | वितन्वतांस्तस्य शरा | १७ | २० |
| वनान्तशय्याऽठिनौ | १ | ३६ | विदिताः प्रविश्य विहिता | ६ | ३० |
| वनाश्रयाः कस्य मृगाः | १४ | १३ | विदूरपातेन निदामुपेयुः | ८ | १० |
| वनेऽवने वनसदां | १५ | १० | विधाय रक्षाम्यरतः | १ | १२ |
| वपुरिन्द्रगोपतपनेषु | १२ | ३ | विधाय विध्वंसमनात्मन | ३ | १६ |
| वपुषा परमेण भूधरा | १३ | १ | विधिसमयनिगोगा | १ | ४६ |
| वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणो | १४ | २२ | विधुरं किमतः परं | २ | ७ |
| वरं कृतघ्नस्तगुणा | १५ | १५ | विधूतकेशाः परि | ८ | ३३ |
| वरोधभिवारणहस्त | ८ | २२ | विधूनयन्ती गहनानि | १४ | ४७ |
| वसूनि वाञ्छन्न वशी | १ | १३ | विनम्रशालिप्रसवोव | ४ | २ |
| वंशलक्ष्मीमनुद्घृत्य | ११ | ६९ | विनयं गुणा इव विवेक | १२ | १८ |
| वंशोचितत्वादभिमान | १७ | ४ | विनिर्यतीनां गुरुखेद | ८ | २६ |
| वाजिभूमिरिभराज | १३ | ५५ | विपक्षचित्तोन्मथना | ८ | ३४ |