कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ हिन्दी कुलार्णव मृदङ्गीं सितशङ्खकुण्डलधरां माणिक्यपुष्पोज्ज्वलां । मातङ्गीं प्रणमामि सस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलां ॥ तदनन्तर दोनों हाथों से पात्र उठाकर द्वितीय तत्व के साथ साक्षात् पर शिव श्री गुरुदेव को प्रदान करे। तदनन्तर सत्सम्प्रदाय वाले वीरों के साथ पूजन कर परस्पर वन्दनपूर्वक गुरुदेव की अनुमति से पान करे। दाहने हाथ से पात्र ले बाएँ से मुद्रा कर द्वितीय तत्व के साथ यथा- विधि मन्त्रोच्चारण करते हुए उसे ग्रहण करे। हे देवेशि ! निम्न मन्त्र और मूलमन्त्र का उच्चारण कर स्थिर मन से धीरे-धीरे साधक अलि-पान करे— इदं पवित्रममृतं जगतां परभेषजम् । पशुपाशभवोच्छेदकारणं भैरवोदितम् ॥ चित्तेः स्वातन्त्र्यरूपत्वात्तदानन्दमयः स्वतः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावाश्चान्तरितासवे ॥ स्व-स्वातन्त्र्यविकाशाय स्वरसस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूर्णोऽहं त्वां पिबाम्यतः ॥ मूलाधार के त्रिकोण में स्थित कोटि सूर्यों के समान प्रभा- वती कुण्डलाकृतिवाली चिद्रूपा में द्रव्य का निम्न मन्त्र से हवन करे— अहन्तापात्रभरितमिदन्ता परमामृतम् । पराहन्तामये वह्नौ होमे स्वीकारलक्षणम् ॥ गुरु, दैवत और मन्त्र में ऐक्य भाव का चिन्तन करते हुए, जब तक उल्लास उत्पन्न न हो, तब तक मधु-पान करे। भोजन के बाद मद्य विष है और मद्य के बाद भोजन विष है। जो अन्न मधु के साथ ग्रहण किया जाता है, वह अमृत के