भारतकोश
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कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

३६ हिन्दी कुलार्णव मृदङ्गीं सितशङ्खकुण्डलधरां माणिक्यपुष्पोज्ज्वलां । मातङ्गीं प्रणमामि सस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलां ॥ तदनन्तर दोनों हाथों से पात्र उठाकर द्वितीय तत्व के साथ साक्षात् पर शिव श्री गुरुदेव को प्रदान करे। तदनन्तर सत्सम्प्रदाय वाले वीरों के साथ पूजन कर परस्पर वन्दनपूर्वक गुरुदेव की अनुमति से पान करे। दाहने हाथ से पात्र ले बाएँ से मुद्रा कर द्वितीय तत्व के साथ यथा- विधि मन्त्रोच्चारण करते हुए उसे ग्रहण करे। हे देवेशि ! निम्न मन्त्र और मूलमन्त्र का उच्चारण कर स्थिर मन से धीरे-धीरे साधक अलि-पान करे— इदं पवित्रममृतं जगतां परभेषजम् । पशुपाशभवोच्छेदकारणं भैरवोदितम् ॥ चित्तेः स्वातन्त्र्यरूपत्वात्तदानन्दमयः स्वतः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावाश्चान्तरितासवे ॥ स्व-स्वातन्त्र्यविकाशाय स्वरसस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूर्णोऽहं त्वां पिबाम्यतः ॥ मूलाधार के त्रिकोण में स्थित कोटि सूर्यों के समान प्रभा- वती कुण्डलाकृतिवाली चिद्रूपा में द्रव्य का निम्न मन्त्र से हवन करे— अहन्तापात्रभरितमिदन्ता परमामृतम् । पराहन्तामये वह्नौ होमे स्वीकारलक्षणम् ॥ गुरु, दैवत और मन्त्र में ऐक्य भाव का चिन्तन करते हुए, जब तक उल्लास उत्पन्न न हो, तब तक मधु-पान करे। भोजन के बाद मद्य विष है और मद्य के बाद भोजन विष है। जो अन्न मधु के साथ ग्रहण किया जाता है, वह अमृत के

साधनमाला ३७ समान है। चर्वण-युक्त पान को ही अमृत कहा गया है। पान तीन प्रकार का होता है—१ दिव्य, २ वीर और ३ पशु। देवी के सामने किया जानेवाला दिव्य, मृद्धासन पर ग्रहण किया जानेवाला वीर और स्वेच्छा से पशुवत् किया जानेवाला पशु- पान कहलाता है। दिव्य पान भुक्ति और मुक्ति का देनेवाला है, वीरपान मुक्तिदायक है और पशुपान नरक को पहुँचाता है। दृष्टि, मन, वाणी और शरीर में जब तक भ्रम नहीं होता, तभी तक पान करे। इससे अधिक होने पर पशुपान में गणना होती है। आनन्द के उद्रेक से देवी तृप्त होती है, मूर्च्छा होने से स्वयं भैरव और वमन से सभी देवता तृप्त होते हैं। कुल- द्रव्य के सेवन से कुलपरायण लोगों को जो सुख मिलता है, वह मोक्ष-स्वरूप ही है, यह हे देवि ! सर्वथा सत्य है। इस प्रकार वटु, शक्ति आदि का पूजन संक्षेप में कहा गया है। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?

उल्लास एवं पान-भेद

आठवाँ उल्लास उल्लास एवं पान-भेद देवी ने कहा—हे कुलेश ! द्रव्य के उल्लास, द्रव्यपात्रादि की संगति, रत्युल्लास, श्री चक्र की स्थिति और कौलिक- शक्तियों की चेष्टा के विषय में बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, उल्लास सात प्रकार के हैं—१ आरम्भ, २ तरुण, ३ यौवन, ४ प्रौढ़, ५ प्रौढ़ान्त, ६ उन्मना और ७ मनोल्लास । तीन तत्वों के होने से 'आरम्भ' कहा जाता है, तरुण सुख के होने पर तरुणोल्लास माना जाता है, मन के सम्यक् उल्लास की स्थिति को यौवन कहा जात । और दृष्टि, मन, वचन का स्खलन होने पर प्रौढ़ उल्लास स्पष्ट होता है । चक्र में समुल्लास की स्थिति होने पर यदि पात्र- मेलन की इच्छा हो, तो इस बात का ध्यान रखे कि अदीक्षित अनाचारी, प्रपञ्ची, स्त्री-द्वेषी, गुरुओं से अभिशप्त, कुलाचार से अनभिज्ञ व्यक्ति से द्रव्यपात्र की संगति न हो । सङ्केतयोग के बिना द्रव्य-सङ्गति न करे । एकपात्र न करे और अपने पात्र के कारण को भैरव को न प्रदान करे । आसन, भोजन पात्र, उपानत्, शयन—इन सबकी संगति अनभिज्ञ और अयोग्य व्यक्ति के साथ नहीं करनी चाहिए । स्त्रियों का उच्छिष्ट तो ग्रहण करे, किन्तु उन्हें अपना उच्छिष्ट न दे । कनिष्ठ शिष्यों को ही उच्छिष्ट दे । जो स्नेह, लोभ या भयवश अन्य किसी को उच्छिष्ट देता-लेता है, वह आपत्ति को प्राप्त होता है। प्रौढोल्लास होने पर हे देवि ! 'अलि' का त्याग करे ।

साधनमाला ३६ पूजागृह से बाहर या भीतर एक त्रिकोण बनाकर गन्ध- पुष्पाक्षतों से शिष्य उच्छिष्टभैरव का ध्यान करे— गदात्रिशूलडमरुपात्रहस्तं त्रिलोचनम् । कृष्णाभं भैरवं ध्यायेत् सर्व्वाविघ्नंनिवारणम् ॥ इसके बाद 'ॐ ॐ ॐ डांउच्छिष्टभैरव एहि एहि बलिं गृह्ण गृह्ण फट् स्वाहा' से बलि प्रदान करे। फिर शान्तिस्तव का पाठ कर अलविन्दुओ से तर्पण करे। यथा— यजन्ति देव्यो हरपादपङ्कजं प्रसन्नवामस्थितमोक्षदायकम्। अनन्तसिद्धान्तमतिप्रबोधकं नमामि चक्राष्टकयोगिनीशम् ॥ योगिनीचक्रमध्यस्थं मातृमण्डलवेष्टितम् । नमामि शिरसा नाथं भैरवं भैरवीप्रियम् ॥ अनादिघोरसंसारपरिक्ष्वंसैकहेतवे । नमः श्रीनाथवेद्याय कुलौषधिविधायिने ॥ आपदो दुरितं रोगाः समयाचारलङ्घनात् । तत्सर्वाणि व्यपोहन्तु दिव्य वक्रस्य मेलनात् ॥ नन्दन्तु साधककुलान्यलिमात्मनिष्ठाम् पापा जहन्तु समयाद्दिशि योगिनीनाम् । सा शाम्भवी स्फुरतु कापि ममाप्यवस्था यस्यां गुरोश्चरणपङ्कजमेव सेव्यम् । नन्दन्तु सिद्धगुरवस्तदनुक्रमौघाः ज्येष्ठाऽनुगाः समयिनो वटुकाः कुमार्य्यः । यद्योगिनीप्रवरवीरकुलप्रसूता आचार्य्य भूमिपतयो द्विजसाधुलोकाः ॥ नन्दन्तु साधुकुलधर्मरताः परे ये चान्ये विशेषपदभेदकशाम्भत्राय ॥

४० हिन्दी कुलार्णव नन्दन्तु साधकाः सर्वे नश्यन्तु कुलदूषकाः । अवस्था शाम्भवीयास्तु प्रसन्नोऽस्तु गुरुः सदा ॥ यद्येषा भैरवी देवी यदि भैरवशासनम् । यद्येष कुलधर्मः स्यात्तदा नश्यन्तु दूषकाः ॥ यासामाज्ञाप्रभावेण स्वास्थितं भुवनत्रयम् । नमस्ताभ्यः समस्ताभ्यो योगिनीभ्यो निरन्तरम् ॥ याश्चक्रमभूमिकावसतयो नाड़ीषु याः संस्थिताः याः कायोद्गतरोगकूपनिलया याः संस्थिता धातुषु । उच्छ्वासोर्मिमहातरङ्गनिलया निःश्वासवासाश्च या- स्ता देव्यो रिपुपक्षभक्षणपरास्तृप्यन्तु मन्त्रार्चिताः ॥ या देव्यः कुलसम्भवाः क्षितिगता या देवतास्तोयगा या नित्या मुदितप्रभा निधिगता या या भुवि प्रस्थिताः । या व्योमाहितमण्डलामृतमया याः सर्वगाः सर्वदाः ता देव्यः कुलमार्गपालनपराः शान्तिं प्रयच्छन्तु मे ॥ ब्रह्मा श्रीः शेषदुर्गागुहवटुकगणा भैरवाः क्षेत्रपाद्या रुद्रादित्या ग्रहास्ते वसुपितृमुनयः सिद्धयो गुह्यकाद्याः । भूता गन्धर्वविद्याधरऋषिपितरः किन्नरा । यक्षनागा योगीशाश्चारणाद्याः सुरकरनिकराः पूजने सन्तु तुष्टाः ॥ देहस्थाखिलदेवता गजमुखाः क्षेत्राधिपा भैरवा योगिन्यो वटुकाश्च यक्षपितरो भूताः पिशाचा ग्रहाः । अन्ये भूचरखेचरा दिशिचरा वेतालकाश्चेटका- स्तृप्यन्तां कुलपुत्रकस्य पितरः पीत्वा समीपे चरुम् । ऊर्ध्वे ब्रह्माण्डतो वा दिवि गगनतले भूतले निष्कले वा पाताले वा तले वा सलिलपवनयोर्यत्र कुत्र स्थितो वा । तीर्थे पीठोपपीठादिषु च कृतपदास्ते सुराः सर्वपूज्या— स्तृप्यन्तु ज्ञानदेव्यस्त्वलिबलिपिशितैर्धूपदीपादिकेन ॥

साधनमाला ४१ सत्यं चेद्गुरुवाक्यमेव चतुरो वेदागमा योगिनी मन्त्राश्चेत् परदेवता यदि भवेद्ब्रह्मप्रमाणं हि चेत् । शाक्तीयं यदि दर्शनं भवति चेदाज्ञाप्यमायान्ति चेत् सत्यञ्चापि च कौलधर्मपरमं स्यान्मे जयः सर्वदा ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः पिबन्तु कुलसत्तमाः । पिबन्तु भैरवाः सर्वे मम देहे व्यवस्थिताः ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः समुद्राः स गणाधिपाः । योगिन्यः क्षेत्रपालाश्च मम देहे व्यवस्थिताः ॥ शिवाद्यवनिपर्यन्तं ब्रह्मादिस्तम्बसंयुक्तम् । कालाग्न्यादिशिवान्तश्च जगद् यज्ञेन तृप्यतु ॥ अब पूजापात्र को उठाकर गुरुदेव शिष्य को प्रसाद दे । अपनी अभीष्ट चेष्टा का करना 'प्रौढान्त' उल्लास है । इस उल्लास के होने पर वीरों में कार्याकार्य का विचार नहीं रहता । इच्छा ही शास्त्र-सम्पत्ति है अतः उक्त अवस्था में जो भी शुभ या अशुभ कर्म होते हैं, वे सब देवता-प्रीति के लिए होते हैं । उस समय का वार्तालाप ( जल्पं ) जप होता है, विक्रियायें पूजा होती हैं, शक्ति-संयोग मोक्ष और भाषण स्तोत्र होता है । अंगों का स्पर्श न्यास, भोजन हवन की क्रिया, वीक्षण ध्यान और शयन वन्दना के समान होता है । इस प्रकार उक्त उल्लास से युक्त साधक की सभी चेष्टायें सत्क्रियायें ही होती हैं । उनमें कार्याकार्य का विचार जो करता है, वह पापभागी होता है । इस सम्बन्ध की वार्ता का चक्र के बाहर वर्णन करने से भी पाप लगता है । चक्र में सदाकुल साधकों को देखकर देवता-बुद्धि से ध्यान करे और प्रसन्न होकर भक्ति- पूर्वक वन्दना करे । इस प्रकार जो चक्र का दर्शन करता है, वह करोड़ों व्रत-तीर्थ-तपदान-यज्ञादि का फल प्राप्त करता है ।

४२ हिन्दी कुलार्णव छठवें 'उन्मना' उल्लास से युक्त होने पर बारम्बार मूर्छा, गिर-गिर कर उठना आदि क्रियायें होती हैं। बाह्य दृष्टि निमेष और उन्मेष से रहित होकर लक्ष्य अन्तर्मुख हो जाता है। यही शिव की कामदायिनी शाम्भवी मुद्रा है। लोभ-रहित होकर उल्लास-युक्त होनेवाले वीर साक्षात् शिव ही हैं, इसमें संदेह नहीं। अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। इस अवस्था में वे मन- वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है। यह सुखपूर्ण अवस्था सातवें 'मनोल्लास' से युक्त महात्माओं की होती है। भैरवी चक्र में सभी वर्ण द्विजातिवत् माननीय होते हैं। जाति-भेद नहीं रहता। चक्र के समाप्त होने पर सामाजिक अनुशासन पुनः लागू हो जाता है। चक्र में चाहे स्त्रियों को अलग बैठावे या पुरुषों के साथ दम्पति के रूप में पंक्ति अथवा चक्राकार स्थान दे। शिव-शक्ति के रूप में उन सबकी चक्र में पूजा करे। जिस समय शिव-शक्ति का समायोग होता है, वही-कुल साधकों की समाधिस्था सन्ध्या है। इस प्रकार मैंने तत्त्वत्रयोल्लास और पान-भेदादि का वर्णन संक्षेप में किया। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?

नवाँ उल्लास योग-योगीश-लक्षण और कौलपूजा देवीबोली — हे कुलेश ! योग-योगीश का लक्षण और कुल- भक्त की पूजा का फल बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! ध्यान दो प्रकार का है—१ स्थूल, २ सूक्ष्म । साकार ध्यान स्थूल और निराकार ध्यान सूक्ष्म कहा जाता है। स्थूल से बुद्धि निश्चित होती है और सूक्ष्म से सुस्थिति । हाथ-पैर, पेटादि अंग और अस्थि से रहित, सर्वतेजोमय, सच्चिदानन्द परमेश्वर का ध्यान करे । न उसका उदय होता है, न अस्त । न बढ़ता है, न घटता । वह अवस्था- रहित और स्वयं-प्रकाश है। सत्तामात्र उस अदृश्य तत्त्व का वाणी द्वारा आत्मा में जो सायुज्य प्राप्त होता है, उस ज्ञान को 'ब्रह्मज्ञान' कहा जाता है। वायु-संचार को रोककर पत्थर के समान स्थिर हो परजीव के एक धाम को जाननेवाला 'योगी' कहलाता है। जिस ध्यानावस्था में पदार्थ मात्र भासित हो और रूप का अभाव हो जाय, वह 'समाधि' कही जाती है। हे देवि ! किसी भी चिन्तन से स्वयं तत्त्व का प्रकाश नहीं होता और स्वयं तत्त्व का प्रकाश होने पर साधक तत्क्षण तन्मय हो जाता है। स्वप्न-जाग्रदवस्था में जो स्वप्नवत् निश्वास- श्वासहीन रहता है वह निश्चय ही 'मुक्त' है। इन्द्रिय-समूह को निष्क्रिय रखकर आत्मा से निश्चय हो जो मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। न सुनता है, न देखता है, न बैठता है, न जाता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन उनमें लिप्त होता है—इस प्रकार संसार से विरक्त हो जो

४४ हिन्दी कुलार्णव 'शिव' में अपनी आत्मा को लय रखता है, उसे 'समाधिस्थ' कहते हैं। जिस प्रकार जल में जल, दूध में दूध और घी में घी डालने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार जीव-आत्मा- परमात्मा के सम्बन्ध में समझे। जिस प्रकार ध्यानशक्ति से कीड़ा भौंरे का रूप ले लेता है, उसी प्रकार ध्यान के द्वारा मनुष्य ब्रह्मभूत हो जाता है। दूध से निकाला हुआ घी जैसे पुनः उसमें फेंकने से पहले जैसा मिश्रित नहीं होता, वैसे ही गुणों के द्वारा पृथक् किया हुआ आत्मा यहाँ कहा जाता है। जिस प्रकार अंधेरे कारागार में बन्दी व्यक्ति कुछ नहीं देख पाता, उसी प्रकार अलक्ष्य योगी प्रपंच को नहीं देखता। जैसे आँख बन्द रहने पर प्रपंच नहीं दिखाई देता, उसी प्रकार आँख खुली होने पर भी वह दृष्टिगत न हो—यही 'ध्यान' का लक्षण है। जीव और आत्मा के ऐक्य को 'योग' कहते हैं। जो एक क्षण के लिए 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्म- चिन्तन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सहजा- वस्था उत्तम है, ध्यान-धारणा मध्यम है, जप-स्तुति अधम है और होम-पूजा अधमाधम है; तत्त्वचिन्ता उत्तम, जपचिन्ता मध्यम, शास्त्रचिन्ता अधम और लोकचिन्ता अधमाधम है। कोटिपूजा के समान स्तोत्र, कोटिस्तोत्र के समान जप, कोटि- जप के समान ध्यान और कोटिध्यान के समान लय है। नाद से परे मन्त्र नहीं, आत्मा से परे देवता नहीं, अनुसन्धि से परे पूजा नहीं और तृप्ति से परे फल नहीं है। हे देवि ! देह देवालय है और जीव सदाशिव है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को छोड़कर 'सोऽहं'-भाव से पूजन करे। जीव शिव है, शिव जीव है— वह जीव केवल शिव है। पाशों से बँधा हुआ 'जीव' है और पाशों से मुक्त 'सदाशिव' कहलाता है। जिस प्रकार भूसी से युक्त धान होता है और भूसी के दूर हो जाने पर चावल कहलाता

साधनमाला ४५ है, उसी प्रकार कर्मों से बँधा हुआ 'जीव' और कर्मों से छूटा हुआ जीव 'सदाशिव' माना जाता है। विप्रों का वेद (ज्ञान) अग्नि में, मनीषियों का हृदय में, अल्पबुद्धि लोगों का मूर्ति में और आत्मज्ञानी का सर्वत्र रहता है। जो निन्दा-स्तु त, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही 'योगीन्द्र' है । निःस्पृह, नित्य सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, स्वर्गहीन और उसके लिए प्रयत्न न करनेवाला परम तत्व का ज्ञाता योगी है। पञ्च मुद्राओं से उत्पन्न परमा- नन्द में मग्न रहनेवाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा में अपने को देखता रहता है। अलि, मांस और अंगना-सङ्ग में जो सुख मिलता है, वह विद्वानों के लिए तो पुण्य है किन्तु अधमों के लिए पाप है। हे देवि ! 'मैं', 'तुम' और 'वह' में ऐक्य भाव का चिन्तन करता हुआ संशयरहित हो वह मद्यपायी मांसाहारी हो स्वेच्छाचार-परायण रहता है। मांसाहार की सुरभि से हीन को सुख नहीं है, उसे प्रायश्चित्ती जानना चाहिए। वह पशु ही है, इसमें संदेह नहीं। जब तक आसव-गन्ध है, तब तक पशु भी साक्षात् पशुपति है और अलि-मांस की गन्ध के बिना साक्षात् पशुपति भी पशु के समान हैं। संसार में निकृष्ट को उत्कृष्ट और उत्कृष्ट को निकृष्ट मानना—महात्मा भैरव ने इसी को 'कुलमार्ग' निर्दिष्ट किया है। हे कुलेश्वरि ! कुलयोगीश्वर कौलिकों के लिए न विधि है, न निषेध । न पुण्य है, न पातक । न स्वर्ग है, न नरक । योगी लोकहित के लिए भोगों का भोग करता है, आकांक्षा से नहीं। सभी कुलों से भोजन ग्रहण करता हुआ वह पृथिवी पर क्रीड़ा करता है। सूर्यवत् वह सब कुछ पीता है, अग्निवत् सब कुछ खाता है। सभी भोगों का भोग करके भी योगी पापों से लिप्त नहीं होता ।

४६ हिन्दी कुलार्णव दुःखों से निवृत्त, सन्तुष्ट, निर्द्वन्द्व और मत्सरहीन होकर जो कुलज्ञान में तन्मय, शान्त और सक्त होते हैं, वे कौलिक हैं। मद, क्रोध, दम्भ, आशा, अहङ्कार से हीन सत्यवादी कौलि- केन्द्र जितेन्द्रिय होते हैं। कुल की प्रशंसा होने पर वे रोमांचित हो उठते हैं, उनका स्वर गद्गद् हो जाता है। संसार में शिवोक्त कुलधर्म सब धर्मों से श्रेष्ठ है, ऐसे निश्चय से युक्त बुद्धिवाले उत्तम कौलिक कहे जाते हैं। हे देवि ! शुभ दिन पर कौलिकों को देवता समझ कर सहर्ष उन्हें निमन्त्रण दे और गन्धपुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा कर पञ्चमकार एवं मुद्राओं से सभक्ति उनको सन्तुष्ट करे। उनके सन्तुष्ट होने से मैं प्रसन्न होता हूँ और समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। ज्ञानी हो; चाहे अज्ञानी—यदि किसी भी प्रकार की मुक्ति चाहिए तो जब तक शरीर की स्थिति है, तब तक अपने-अपने वर्ण और आश्रम के आचार का पालन अवश्य करना चाहिए। कर्म के द्वारा अज्ञान का उन्मूलन होने पर ज्ञान के द्वारा 'शिवत्व' की प्राप्ति होती है। शिव से ऐक्य स्थापित करने वाले की ही मुक्ति होती है। अतः कर्म समाप्त करे। कर्मनिष्ठ ही सुखी होता है। देहधारी सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। जो कर्म के फल का त्याग करता है, वही त्यागी कहा जाता है। इन्द्रियादि 'करण' अपने कार्य में तत्पर रहते ही हैं, ऐसा विचार कर जो अहंभाव को छोड़ कर्मनिष्ठ रहता है, वह ज्ञान- प्राप्ति के बाद क्रियमाण कर्मों में लिप्त नहीं होता। इस प्रकार योग और योगियों के कुछ लक्षण तुमसे संक्षेप में कहे। अब हे कुलेशानि ! तुम और क्या सुनना चाहती हो ?

दसवां उल्लास विशेष दिवसों के पूजन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं विशेष दिनों की पूजा के विषय में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उस पूजा का फल भी मुझे बताइए। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! नित्यपूजा उत्तम है, पर्वपूजा मध्यम है, मासपूजा अधम है और एक मास से अधिक समय हो जाने पर साधक भ्रष्ट हो जाता है। कृष्णाष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति —ये पाँच पर्व हैं। गुरु, परम गुरु, परापरगुरु के और अपने जन्मदिवस पर आचार्य के द्वारा या स्वयं चक्रपूजा करे। प्रति मास, हर दूसरे मास या छठे मास या वर्ष में श्रीगुरुपूजा भक्तिपूर्वक करे। गुरु के अभाव में किसी कौल या उसके शिष्य का पूजन करे और कुलपूजन-पूर्वक कुलद्रव्यों से उन्हें सन्तुष्ट करे। नवरात्रों में प्रथमा तिथि में एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या को स्नान करा कर पूजास्थान में लाकर देवता के पास बैठावे। फिर गन्धपुष्पधूपदीप और कुलदीपकों से उसका पूजन कर खीर, मधु-मांस, केला, नारियल आदि फलों से उसे संतुष्ट करे। तब इष्टदेवता का ध्यान कर यथाशक्ति जप करे और अन्त में देवता समझकर उस कन्या को नमस्कार कर विदा करे। द्वितीया तिथि में दो वर्ष की और पूर्व तिथि में पूजिता एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या का पूजन पूर्ववत् करे। इसी क्रम

४८ हिन्दी कुलार्णव से नवमी को एक वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करे । ये नौ हैं—१ सरस्वती, २ रमा, ३ गौरी, ४ दुर्गा, ५ चन्द्रमुखी, ६ हरप्रिया, ७ उमा, ८ भीमा और ६ शान्ता । ‘ॐ ॐ ॐ सरस्वत्यै देवतायै नमः’ आदि क्रम से यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से इनकी अलग-अलग पूजा करे । देवता समझते हुए विविध पदार्थों से इन्हें सन्तुष्ट करे । ताम्बूल और दक्षिणा देकर इन्हें विदा करे । ऐसा करनेवाला साधक पुण्यात्मा होकर देवी का प्रीतिभाजन होता है । हे पार्वति ! यदि युवा स्त्रियाँ सुलभ हों तो नवरात्रों में साधक भक्तिपूर्वक उन्हें निमंत्रित कर पूर्ववत् १ हृल्लेखा, २ गगना, ३ रक्ता, ४ महच्चण्डा, ५ करालिका, ६ इच्छा, ७ ज्ञाना, ८ क्रिया और ६ दुर्गा के रूप में उनकी पूजा करे । साथ ही वटुक और गणेश-रूप में बालकों का भी पूजन विधिवत् करे । इस प्रकार हे देवि ! जो वर्ष में या छठे मास में या तीसरे मास में या प्रति मास व्रतपूर्वक पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों को प्राप्त कर हमारा प्रिय होता है । भृगुवार को हे कुलेशानि ! सर्वलक्षणा, मन्दहासा, पुष्पिणी युवा स्त्री को स्नान कराकर सादर निमन्त्रित कर आसन पर बैठावे । गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से उसे सजावे । अपने को भी हे कुलेश्वरि ! गन्धपुष्पादि से अलंकृत करे । फिर देवता का आवाहन कर सविधि पूजन करे । अत्यन्त भक्तिपूर्वक मांसादि पदार्थों से उसे सन्तुष्ट करे । फिर प्रौढान्तोल्लास से युक्त उसका दर्शन करता हुआ मन्त्र का जप करे । स्वयं यौवनोल्लास से युक्त रहे और उसका ध्यान करता रहे । इस प्रकार निर्विकार चित्त से १०८ सहस्र जप कर जपफल समर्पित कर विहार करे । तीन, पाँच, सात, नौ भृगुवारा में जो इस विधि से पूजन करता

साधनमाला ४६ है, उसे असीम पुण्य मिलता है और जो भी उसकी मनोकामना हो, वह पूर्ण होती है । सभी संक्रान्ति-पर्वों में १ गौरी-शिव, २ रमा-विष्णु ३ वाणी- ब्रह्मा, ४ शची-इन्द्र, ५ रोहिणी-चन्द्र, ६ स्वाहा-अग्नि, ७ प्रभा-रवि, ८ भद्रकाली-वीरभद्र और ९ भैरवी-भैरव इन नौ युगलों की पूर्वोक्त विधि से पूजा करे । 'ॐ ॐ ॐ गौरीशिवेभ्यः नमः' आदि नाम- मन्त्रों से उक्त मिथुनों का गन्ध-पुष्पादि से पूजन कर उन्हें प्रौढ़ान्तोल्लास से युक्त ध्यान करे । इस प्रकार पूजन करने से ये मिथुनदेवता प्रसन्न होकर साधक के मनोरथ को पूर्ण करते हैं । प्रतिवर्ष जो यह पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर उक्त मिथुनलोकों में निवास करता है । वैशाख मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त हो मनोरम एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके बैठे । फिर विधिपूर्वक अपने आपको गन्ध-पुष्पों से अलंकृत कर पूर्वोक्त न्यास कर देवताभाव को प्राप्त करे । सूर्य- मण्डल के कुछ उदित होने पर इष्टदेवता का आवरणों के सहित ध्यान कर षोडशोपचारों से चक्रपूजा-युक्त पूजन करे । इसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को भक्ष्य-भोज्यादि-सहित अर्घ्य निवेदित करे और उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से पान करे । देवी के उक्त मण्डल का ध्यान करते हुए १०८ बार जप करे । फिर जपफल समर्पित कर पूजा और देवता का विसर्जन करे । इस प्रकार शुक्ल प्रति- पदा के शुभ दिन से प्रारम्भ कर कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक जप- पूजा करे और अमावास्या के दिन कृपणता छोड़कर यथाशक्ति तीन, पाँच या सात शक्तियों तथा कौलिकों का पूजन करे । एक मास तक जो यह सूर्योदय का अर्चन करता है, उससे देवता फा० ४

५० हिन्दी कुलार्णव सन्तुष्ट होता है और उसके अभीष्ट पद को प्रदान करता है। इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी पूजा की जा सकती है। उसका भी वही माहात्म्य है। जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक यह पूजा करता है, वह सिद्ध होकर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है। माघ शुक्ल की प्रतिपदा के दिन निराहार रहकर स्नानपूर्वक श्वेत वस्त्र पहन सायं सन्ध्या करे। फिर पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर चिद्रूपा देवता का ध्यान करते हुए चन्द्रमा के अस्त होने के समय तक एकाग्रचित्त से जप करे। इस प्रकार शुक्ल चतुर्दशी तक प्रतिदिन पूजन करे। पूर्णिमा के दिन यथा- शक्ति शक्तियों और कौलिकों की पूजा करे। भक्तिपूर्वक शुक्लपक्ष का यह पूजन जो साधक करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर सब लोगों से पूजित होता है और शिव-सान्निध्य को प्राप्त करता है। शुक्लपक्ष के ही समान कृष्णपक्ष का पूजन भी वैसा ही फलप्रद है। इस संसार में देववत् सभी सुखों का उपभोग कर वह परमपद को पाता है, इसमें सन्देह नहीं। कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्नान-उपासना के द्वारा विशुद्धात्मा हो पूर्वोक्त न्यासों को करे। फिर जीवलोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर पाँच रङ्गों के चूर्ण से चित्रित अष्टदलकमल बनावे। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भरकर स्थापित करे। कलश पर घृत का दीपक जलाकर स्थापित करे। दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हो। उत्तर की ओर मुखकर साधक कलश के सामने बैठे और उक्त दीपक की ज्योति में आवरण- सहित देवी का ध्यान कर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्थ देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १०८ बार जप करे। इस प्रकार कृष्ण चतुर्दशी

साधनमाला ५१ के दिन तक पूजा करे । अमावास्या के दिन भक्ति-पूर्वक कुलशक्तियों का पूजन करे । ऐसा करने से साधक देवता का प्रीतिपात्र होता है और सब प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त होकर सबसे सम्मानित होता है । आगमोक्त विधि से विशेष दिवसों में जो पूजन करता है, वह हम दोनों का प्रियपात्र होता है और सद्गति को प्राप्त करता है । अतः प्रयत्नपूर्वक सब दशाओं में कुलपूजा करनी चाहिये क्योंकि कुलपूजा से अभीष्ट फल मिलता है । विशेष दिवसों में साधकों को देखकर सभी लोग हर्षित होते हैं और सोचते हैं कि क्या ही अच्छा होता, यदि वे स्वयं भी पूजा कर सकते । इसलिये चाहे अपने कल्याण के लिये या दूसरे के हित के लिए पवित्र द्रव्यों से युक्त होकर चक्रपूजा-पूर्वक विशेष दिवसों का अर्चन किया करे । इस प्रकार हे कुलेशानि ! विशेष दिवसों का कुछ अर्चन-विधान मैंने संक्षेप में कहा । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?

ग्यारहवां उल्लास कुलाचार-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं कुलाचार-क्रम को सुनना चाहती हूँ । कृपया उसे कहिए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। स्नान किये बिना या गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से अलंकृत हुए बिना या शरीर में न्यास किये बिना कुलपूजा नहीं करनी चाहिये । मांस के बिना पूजा, मद्य के बिना तर्पण और शक्ति के बिना जो पान किया जाता है, वह निष्फल होता है । चक्रपूजा अकेले न करे और न एक पात्र में पूजन करे । न एक हाथ से पूजा करे और न एक हाथ से पान करे । पशु के निकट मत्स्य-मांस और आसव के द्वारा पूजन न करे । प्रणाम कर चक्र में प्रवेश करे और प्रणाम करके ही उससे बाहर जाय । हे देवि ! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं । कुलाचारी के गृह में पहुँचने पर माँग कर अमृतान्न ग्रहण करे । उसके अभाव में जल पिये । कुलाचारी के द्वारा दिये हुए पात्र को नमस्कार कर ग्रहण करे । यदि गुरुदेव या उनके पुत्र या अपने से ज्येष्ठ कौलिक उसी ग्राम या नगर में निवास करते हैं, जहाँ कि साधक रहता है, तो उनकी अनुमति से ही कुलद्रव्यों का सेवन करना चाहिये । अन्यथा पाप होता है । चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाथ आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है। जो इस अवसर पर मल-मूत्र- अधोवायु का विसर्जन करता है, उसे पातक लगता है। चक्र के बीच में घट के टूट जाने या पात्र के गिर जाने या दीपक के बुझ जाने से जो दोष होता है, उसकी शान्ति के लिए पुनः श्रीचक्र-

उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता

साधनमाला ५३ पूजा करनी चाहिये। परिहास, प्रलाप, अति वार्तालाप, उदासीनता, भय, क्रोध आदि से चक्र के समय में बचना चाहिये। हाथ में पात्र लेकर चक्र में घूमना-फिरना नहीं चाहिये। पूर्णपात्र ग्रहण कर अधिक देर तक न बैठे। हाथ में पात्र हो, तो बातचीत न करे। एक हाथ से बिना मुद्रा के पात्र न दे। न उसे स्थान से हटावे और न अन्य पात्रों में उसे मिलने दे। शब्द करते हुए द्रव्य का पान न करे और न ही पात्र को पूर्ण करते समय शब्द करे। एक दूसरे के पात्रों को टकराना नहीं चाहिये। आधार के सहित पात्र को न उठाये और न आधार से वह गिरने पाये। पात्र को सर्वथा खाली न करे। उसे धोकर छिपाकर रखे। उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता है या पश्वाचार-परायण होता है, तो उसके धर्म, अर्थ, आयु, यश, पुण्य, ज्ञान, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। श्रीचक्र-स्थित कुलद्रव्य को जो अपनी इच्छा से या लोभ से या भय से पशुओं को देता है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है। चक्र के बीच में शत्रु के भी साथ वाद-विवाद न करे। उसके कठोर वचनों को भी सह ले। अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिक को देखकर जिसे होती है, वह योगिनी का प्रियपात्र होता है। श्री गुरुदेव, कुलशास्त्र और पूज्य स्थानों को भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनका माहात्म्य-वर्णन करना चाहिये। जपकाल को छोड़कर गुरुदेव के नाम का उच्चारण न करे। ‘श्रीनाथदेव स्वामी’ इस नाम से उनका उल्लेख करे। श्रीगुरु- पादुका, मूलमन्त्र और अपनी पादुका शिष्य को छोड़कर अन्य किसी को न बताये। मन्त्रादि गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल होते हैं। अपनी पत्नी के समान कुलशास्त्रों का सेवन करे, पशु- शास्त्रों को पराई स्त्री के समान समझे।

५४ हिन्दी कुलार्णव कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, मनोहरा, युवती कुमारी की देवता- रूप में पूजा करे । स्त्रियों का समूह, रक्तवस्त्रा नारी, गुरुदेव की शक्ति, गुरुपुत्र, ज्येष्ठ या कनिष्ठ कौल साधक यदि दिखाई पड़ें, तो उन्हें नमस्कार करे । नग्न या पागल स्त्री का कभी उपहास न करे । अप्रिय और असत्य बात न कहे । दिन में स्त्री-सङ्ग कभी न करे । सौ अपराध करने पर भी स्त्री को पुष्प तक से न मारे । स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों के प्रति ही सदा ध्यान दे । कुलवृक्षों में कुलयोगिनियों का निवास रहता है। अतः उनके पत्तों में विशेषतः अर्कपत्र में भोजन नहीं करना चाहिये । कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे, अपितु उसे देख या सुनकर नमस्कार करे । कभी भी उसे काटे या तोड़े नहीं । श्लेष्मान्तक, करञ्ज, निम्ब, अश्वत्थ, कदम्ब, विल्व, वट, उडुम्बुर- ये कुलवृक्ष माने गये हैं । एकाक्षर के देनेवाले गुरुदेव की जो अवमानना करता है, वह सौ योनियों में घूमता-फिरता हुआ चाण्डाल होता है । श्रीचक्र के वृत्तान्त को, चाहे वह शुभ हो या अशुभ, कभी प्रकट नहीं करना चाहिए । गुरुदेव का नाम तो प्रकट करे किन्तु अपना मन्त्र कभी किसी को न बताना चाहिये । सभी पापों का प्रायश्चित्त श्री गुरुदेव के नाम का जप करने से हो जाता है । हे कुलेश्वरि ! गुरु को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिये । उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता । इस प्रकार संक्षेप में मैंने कुलाचार की विधि कही । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?

बारहवां उल्लास पादुका-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पादुका की भक्ति के लक्षण और उससे सम्बन्धित आचार के विषय में सुनना चाहती हूँ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। असंख्य महादानों, महाव्रतों और महाज्ञानों से अधिक फलदायिका श्रीपादुका है। कोटि मन्त्रजप से, पुण्यतीर्थों के स्नान से और कोटि देवपूजन से बढ़कर पुण्यदा श्रीपादुका है। विषम रोग, विकट उपद्रव, महान् भय और बड़ी से बड़ी आपत्ति में स्मरण करने से श्रीपादुका रक्षा करती है। श्रीनाथ के चरणकमल जिस दिशा में विराजते हों, उस दिशा को प्रतिदिन नमस्कार करे। ध्यान का मूल श्री गुरुदेव का स्वरूप है, पूजा का मूल श्रीगुरुदेव के चरण हैं, मन्त्र का मूल श्रीगुरुदेव के वचन हैं और मोक्ष का मूल श्रीगुरुदेव की कृपा है। हे कुलनायिके ! इस संसार में सभी क्रियाओं के मूलाधार श्रीगुरु- देव ही हैं। अतः उनकी नित्य भक्तिपूर्वक सेवा करे। गुरु को मनुष्य, मन्त्र को अक्षर और प्रतिमा को पत्थर जो समझता है, वह नरक को प्राप्त करता है। गुरु को मरणशील समझनेवाला कभी मन्त्रसाधना या देवार्चन में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। जन्म देने के कारण माता-पिता पूज्य होते हैं और श्रीगुरुदेव धर्माधर्म के प्रदर्शक होने से और भी अधिक पूज्य हैं। शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा कर सकते हैं किन्तु गुरु