कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ हिन्दी कुलार्णव कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, मनोहरा, युवती कुमारी की देवता- रूप में पूजा करे । स्त्रियों का समूह, रक्तवस्त्रा नारी, गुरुदेव की शक्ति, गुरुपुत्र, ज्येष्ठ या कनिष्ठ कौल साधक यदि दिखाई पड़ें, तो उन्हें नमस्कार करे । नग्न या पागल स्त्री का कभी उपहास न करे । अप्रिय और असत्य बात न कहे । दिन में स्त्री-सङ्ग कभी न करे । सौ अपराध करने पर भी स्त्री को पुष्प तक से न मारे । स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों के प्रति ही सदा ध्यान दे । कुलवृक्षों में कुलयोगिनियों का निवास रहता है। अतः उनके पत्तों में विशेषतः अर्कपत्र में भोजन नहीं करना चाहिये । कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे, अपितु उसे देख या सुनकर नमस्कार करे । कभी भी उसे काटे या तोड़े नहीं । श्लेष्मान्तक, करञ्ज, निम्ब, अश्वत्थ, कदम्ब, विल्व, वट, उडुम्बुर- ये कुलवृक्ष माने गये हैं । एकाक्षर के देनेवाले गुरुदेव की जो अवमानना करता है, वह सौ योनियों में घूमता-फिरता हुआ चाण्डाल होता है । श्रीचक्र के वृत्तान्त को, चाहे वह शुभ हो या अशुभ, कभी प्रकट नहीं करना चाहिए । गुरुदेव का नाम तो प्रकट करे किन्तु अपना मन्त्र कभी किसी को न बताना चाहिये । सभी पापों का प्रायश्चित्त श्री गुरुदेव के नाम का जप करने से हो जाता है । हे कुलेश्वरि ! गुरु को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिये । उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता । इस प्रकार संक्षेप में मैंने कुलाचार की विधि कही । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?