भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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बारहवां उल्लास पादुका-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पादुका की भक्ति के लक्षण और उससे सम्बन्धित आचार के विषय में सुनना चाहती हूँ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। असंख्य महादानों, महाव्रतों और महाज्ञानों से अधिक फलदायिका श्रीपादुका है। कोटि मन्त्रजप से, पुण्यतीर्थों के स्नान से और कोटि देवपूजन से बढ़कर पुण्यदा श्रीपादुका है। विषम रोग, विकट उपद्रव, महान् भय और बड़ी से बड़ी आपत्ति में स्मरण करने से श्रीपादुका रक्षा करती है। श्रीनाथ के चरणकमल जिस दिशा में विराजते हों, उस दिशा को प्रतिदिन नमस्कार करे। ध्यान का मूल श्री गुरुदेव का स्वरूप है, पूजा का मूल श्रीगुरुदेव के चरण हैं, मन्त्र का मूल श्रीगुरुदेव के वचन हैं और मोक्ष का मूल श्रीगुरुदेव की कृपा है। हे कुलनायिके ! इस संसार में सभी क्रियाओं के मूलाधार श्रीगुरु- देव ही हैं। अतः उनकी नित्य भक्तिपूर्वक सेवा करे। गुरु को मनुष्य, मन्त्र को अक्षर और प्रतिमा को पत्थर जो समझता है, वह नरक को प्राप्त करता है। गुरु को मरणशील समझनेवाला कभी मन्त्रसाधना या देवार्चन में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। जन्म देने के कारण माता-पिता पूज्य होते हैं और श्रीगुरुदेव धर्माधर्म के प्रदर्शक होने से और भी अधिक पूज्य हैं। शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा कर सकते हैं किन्तु गुरु