कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ हिन्दी कुलार्णव के रुष्ट होने पर कोई भी नहीं बचा सकता। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु को जो प्रिय हो, वैसा ही आचरण करना चाहिये। गुरु यदि निकट हों, तो उन्हें मन ही में नमस्कार न करे, अपितु यदि गुरु-शिष्य एक ही स्थान में निवास करते हों, तो शिष्य को तीनों सन्ध्याओं में प्रतिदिन गुरु को प्रणाम करना चाहिये। आधे योजन की दूरी पर रहनेवाला शिष्य पाँचों पर्वों में आकर गुरु को प्रणाम करे। एक योजन से बारह योजन तक की दूरी पर रहनेवाला शिष्य अपनी इच्छानुसार आकर उन्हें प्रणाम करे। खाली हाथ राजा, देवता और गुरु के पास न जाये। यथा- शक्ति फल, फूल, वस्त्रादि से उनका अभिनन्दन करे। गुरुशक्ति, गुरुपुत्र और गुरु के ज्येष्ठभ्राता का गुरुवत् आदर करे। छोटों को अपने पुत्रवत् समझे। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे पादुका-भक्ति के लक्षण और आचार बताये। अब क्या सुनना चाहती हो ?