भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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तेरहवां उल्लास गुरु-शिष्य-लक्षण देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु-शिष्य दोनों के लक्षण सुनना चाहती हूँ । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो । परशिष्य, पाखण्डी, घमण्डी, विकृताङ्ग, मलिन, रोगी, आलसी, द्यूतादिव्यसनी, देश- द्रोही, नीरस, धूर्त, छिद्रान्वेषी, कृतघ्न, विश्वासघाती, आततायी, मिथ्यावादी, गँवार, बहुभाषी, कुतर्की, झगड़ालू, मूर्ख, आत्म- प्रशंसक आदि दोषयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' न बनाये । कुलधर्मप्रेमी, कुलार्चनकारी, जपध्यानादिकर्ता और कुलशास्त्र के जिज्ञासु आदि गुणयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' बनाये । शुद्धवेशधारी, मनोहर, आगमज्ञाता, तन्त्रशास्त्रज्ञ, भ्रम- संशयनाशक, अन्तर्मुखी होते हुए भी बहिर्दृष्टि रखनेवाले, सर्वज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, शान्तस्वभाववाले, दयालु, जितेन्द्रिय, अग्रगण्य, गम्भीर, सन्तुष्ट, धैर्यवान्, प्रसन्नमुख, नित्य-नैमित्तिक- काम्य कर्मों में तत्पर रहनेवाले, स्त्रीधनादि में अनासक्त आदि गुणयुक्त महानुभाव को 'गुरु' बनाये । घृणा, लज्जा, भय, शोक, जुगुप्सा, कुलशील और जाति— ये आठ पाश कहे गये हैं । इनसे बँधा हुआ व्यक्ति 'पशु' माना जाता है । इन पाशों से छूटकर वह महेश्वरवत् हो जाता है । अतः उक्त पाशों को जो दूर करता है, वही गुरु है । जो सच्चिदानन्द को जानता है और इन्द्रियजन्य सुख से जो छुटकारा दिलाता है, वह गुरु है । ऐसे ही गुरु की शिष्यों को सेवा करनी चाहिये ।