कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८ हिन्दी कुलार्णव वेद और शास्त्रादि के जाननेवाले गुरु तो बहुत हैं किन्तु परम- तत्त्व के ज्ञाता गुरु कठिनाई से मिलते हैं। निगम और आगम शास्त्रों में कथित मन्त्रों को जो जानते हैं, ऐसे गुरु दुर्लभ हैं। शिष्य से धन लेनेवाले गुरु बहुत मिलते हैं, किन्तु शिष्य के दुःख को दूर करनेवाले गुरु कम मिलते हैं। गुरु वही है, जिसके स्पर्श- मात्र से परम आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे ही महापुरुष को गुरु बनाना चाहिए। प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक, शिक्षक और बोधक—ये छहः प्रकार के गुरु कहे गये हैं। इनमें से पाँच तो कार्यभूत होते हैं, छठा 'बोधक' गुरु कारण होता है। जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, उसी की पादुका हे महेशानि ! पूजनीया है। संशय को दूर करने- वाले, ज्ञानदायक सद्गुरु को पाकर दूसरे गुरु का आश्रय नहीं लेना चाहिये। यदि गुरु अनभिज्ञ हो, उसके द्वारा संशय का निरा- करण न होता हो, तो दूसरे गुरु के पास जाने में दोष नहीं है। जिस प्रकार शहद का लोभी भौंरा एक फूल से दूसरे फूल को जाता रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के लोभी शिष्य को एक गुरु से दूसरे गुरु के पास जाना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे गुरु-शिष्य के लक्षण कहे। अब हे कुलेशानि ! क्या सुनना चाहती हो ?