कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ४१ सत्यं चेद्गुरुवाक्यमेव चतुरो वेदागमा योगिनी मन्त्राश्चेत् परदेवता यदि भवेद्ब्रह्मप्रमाणं हि चेत् । शाक्तीयं यदि दर्शनं भवति चेदाज्ञाप्यमायान्ति चेत् सत्यञ्चापि च कौलधर्मपरमं स्यान्मे जयः सर्वदा ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः पिबन्तु कुलसत्तमाः । पिबन्तु भैरवाः सर्वे मम देहे व्यवस्थिताः ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः समुद्राः स गणाधिपाः । योगिन्यः क्षेत्रपालाश्च मम देहे व्यवस्थिताः ॥ शिवाद्यवनिपर्यन्तं ब्रह्मादिस्तम्बसंयुक्तम् । कालाग्न्यादिशिवान्तश्च जगद् यज्ञेन तृप्यतु ॥ अब पूजापात्र को उठाकर गुरुदेव शिष्य को प्रसाद दे । अपनी अभीष्ट चेष्टा का करना 'प्रौढान्त' उल्लास है । इस उल्लास के होने पर वीरों में कार्याकार्य का विचार नहीं रहता । इच्छा ही शास्त्र-सम्पत्ति है अतः उक्त अवस्था में जो भी शुभ या अशुभ कर्म होते हैं, वे सब देवता-प्रीति के लिए होते हैं । उस समय का वार्तालाप ( जल्पं ) जप होता है, विक्रियायें पूजा होती हैं, शक्ति-संयोग मोक्ष और भाषण स्तोत्र होता है । अंगों का स्पर्श न्यास, भोजन हवन की क्रिया, वीक्षण ध्यान और शयन वन्दना के समान होता है । इस प्रकार उक्त उल्लास से युक्त साधक की सभी चेष्टायें सत्क्रियायें ही होती हैं । उनमें कार्याकार्य का विचार जो करता है, वह पापभागी होता है । इस सम्बन्ध की वार्ता का चक्र के बाहर वर्णन करने से भी पाप लगता है । चक्र में सदाकुल साधकों को देखकर देवता-बुद्धि से ध्यान करे और प्रसन्न होकर भक्ति- पूर्वक वन्दना करे । इस प्रकार जो चक्र का दर्शन करता है, वह करोड़ों व्रत-तीर्थ-तपदान-यज्ञादि का फल प्राप्त करता है ।