भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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६० हिन्दी कुलार्णव कर्मकाण्ड से रहित दीक्षा-विधि तीन प्रकार की कही गई है—१ स्पर्शदीक्षा, २ दृग्दीक्षा, ३ वेधदीक्षा। मोक्षदायिनी दीक्षा के सात प्रकार बताए गये हैं—१ समया, २ साधिका, ३ पुत्रिका, ४ वेधिका, ५ पूर्णा, ६ चर्या, ७ निर्वाण। कलश, मण्डपादि से युक्त क्रियादीक्षा गुरुदेव को बाह्य विधानानुसार करनी चाहिए। यह क्रियादीक्षा आठ प्रकार की मानी गई है। पापहरी वर्णदीक्षा बयालीस, पचास या बासठ अक्षरों के न्यास के भेद से तीन प्रकार की है। इसमें शिष्य के शरीर में वर्णों का न्यास कर उसमें देवत्व का भाव जाग्रत् किया जाता है। कलादीक्षा में पैरों के तलवे से लेकर घुटनों तक निवृत्ति, घुटनों से नाभि तक प्रतिष्ठा, नाभि से कण्ठ तक विद्या, कण्ठ से ललाट तक शान्ति और ललाट से शिर तक शान्त्यतीता इन पाँच कलाओं का, फिर पुनः संहारक्रम से इन्हीं कलाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान तक न्यास किया जाता है, जिससे शिष्य को दिव्यभाव प्राप्त होता है। श्रीगुरुदेव अपने हाथ में शिव का ध्यान कर मूल अङ्गमालिनी का जप कर अपने शिष्य को छुयें। इस प्रकार 'स्पर्शदीक्षा' होती है। अपने चित्त को तत्त्व में स्थित कर परतत्त्व से उत्प्रेरित होकर मन्त्रज्ञाता गुरु मन्त्रोपदेश करें। इसे 'वाग्दीक्षा' कहते हैं। आँखों को बन्द कर परतत्त्व का ध्यान करते हुए प्रसन्न-बुद्धि से यदि गुरुदेव शिष्य को देखें, तो इससे 'दृग्दीक्षा' होती है। गुरु के दर्शन, भाषण, स्पर्शमात्र से जब तुरन्त ज्ञान होता है, तो वह 'शाम्भवी' दीक्षा कहलाती है। 'मनोदीक्षा' तीव्रा और तीव्रतमा दो प्रकार की है। शिष्य के देह में छः अध्वानों का स्मरण करते हुए गुरुदेव जब वेध करते हैं, तब शिष्य पापों से मुक्त और छिन्नपाश होकर बाह्य क्रिया-व्यापार से शून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है। दिव्यभाव