भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ६१ को प्राप्त होकर वह सर्वज्ञ हो जाता है। यही भवबन्धमोचिनी और शिवभावप्रदायिनी तीव्रतरा दीक्षा है। वेध की छः अवस्थायें मानी गई हैं—१ आनन्द, २ कम्प, ३ उद्भव, ४ घूर्णा, ५ निद्रा और ६ मूर्च्छा। वेधदीक्षा होने पर शिष्य में ये छः गुण दिखाई पड़ते हैं। कुलद्रव्यों से सविधि पूजन कर शिष्य को उनका दर्शन कराये, यह 'कौलिकी दीक्षा' है। मुख में पञ्चगव्यामृत से युक्त शिवद्रव्य को भरकर गुरुदेव शिष्य का गण्डूष के द्वारा अभिषेक करें। तब सजीव मीन से युक्त और सुरा अथवा पञ्चामृत से पूर्ण शंख या कलश के द्वारा बाह्य अभिषेक करें। इस प्रकार 'पूर्णाभिषेक' से जो पवित्र होते हैं, वे शिव के सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार दीक्षा के दो मुख्य भेद हैं—१ बाह्य और २ आभ्यन्तर। क्रियादीक्षा बाह्य है और वेध आभ्यन्तरी। शरीर का न तो संस्कार होता है, न उसकी कोई जाति है और न कोई कर्म। 'आत्मा' की ही दीक्षा होती है, जो अनादि कुलकुण्डली है। हे देवि ! मन्त्रौषधि के द्वारा जिस प्रकार विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मन्त्रज्ञ गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य के पशुपश को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। सविधि दीक्षा के होने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और ज्ञान की प्राप्ति होकर शिष्य शिवरूप हो जाता है। दीक्षा होने से आत्मा शिवत्व को प्राप्त करती है। शूद्र की शूद्रता चली जाती है और विप्र की विप्रता। दीक्षा संस्कार से युक्त होने पर जाति की भिन्नता नहीं रह जाती। दीक्षा के बिना जो भी जपपूजादि क्रिया की जाती है, वह निष्फल होती है। अतः प्रयत्न करके गुरु से दीक्षा प्राप्त करे। —:❀:—