कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ६३ और अपना घर—मन्त्र-साधक के लिये ये स्थान प्रशस्त हैं। अथवा जहाँ प्रसन्नता अनुभव हो, वहीं बैठे। सूर्य, अग्नि, गुरु, चन्द्रमा, दीपक, रथ, गो और कुलवृक्ष के समीप जप करना श्रेयस्कर है। घर में सौ गुना, गोष्ठ में लाख गुना, देवमन्दिर में करोड़ गुना और शिव के निकट जप करने का अनन्त फल होता है। तूल, कम्बल वस्त्र या सिंह-व्याघ्र-मृगचर्म का आसन बनाये, जो सौभाग्य तथा ज्ञान की वृद्धि कराये। पद्म, स्वस्तिक, वीरादि आसनों से बैठकर जपर्चन आदि करे। अन्यथा फल नहीं मिलता। पूरक, कुम्भक और रेचक-युक्त प्राणायामत्रय से मानस, वाचिक और कायिक सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। आग- मोक्त विधि से जो नित्य न्यास करता है, वह देवभाव को पाकर मन्त्रसिद्धि को प्राप्त करता है। न्यास, कवच और छन्द से युक्त मन्त्र का जो जप करता है, उसके सभी विघ्न दूर हो जाते हैं। अक्षमाला दो प्रकार की होती है—कल्पित और अकल्पित। कल्पित अनेक प्रकार की मालाओं से है और अकल्पित मातृकाओं से है। 'अ' से 'क्ष' तक के अक्षरों से निर्मित होने के कारण इसे 'अक्षमाला' कहते हैं। अनुलोम-विलोम से गणना करे। अंगुष्ठ से मोक्ष, तर्जनी से शत्रुनाश, मध्यमा से धनप्राप्ति, अनामिका से शान्तिकर्म, कनिष्ठा से स्तम्भन और अँगुलियों से आकर्षण होता है। 'इतना जप करूँगा' इस प्रकार पहले सङ्कल्प कर स्थिर आसन से बैठकर जपपूर्वक देवी को जल-सहित समर्पण करे। जप तीन प्रकार का है--उच्च स्वर से अधम, उपांशु मध्यम और मानस उत्तम। बहुत धीमे जप करने से रोग होता है और बहुत तेज जप करने से तप का नाश होता है।