कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ हिन्दी कुलार्णव मन में स्तोत्र का स्मरण करना और वाणी से मन्त्र का उच्चारण करना—इन दोनों का कोई फल नहीं होता। जात- सूतक और मृतसूतक—इन दो सूतकों से युक्त मन्त्र से सिद्धि नहीं मिलती। मन्त्रार्थ, मन्त्र चैतन्य और योनिमुद्रा को जो नहीं जानता, वह कितना ही जप क्यों न करे, सफल-मनोरथ नहीं होता। बहुकूटाक्षर, मुग्ध, बद्ध, क्रुद्ध, स्तम्भित, मूर्छित, खण्डित, पराङ्मुख, बधिर, अन्ध, क्षुधित, स्थानदुष्ट, निर्जीव, शप्त आदि अनेक दोष मन्त्र में होते हैं। इन्हें दूर करने के लिए १ जनन, २ जीवन, ३ ताड़न, ४ बोधन, ५ अभिषेक, ६ विमलीकरण, ७ आप्यायन, ८ तर्पण, ६ दीपन और १० गुप्ति ये दस मन्त्र संस्कार बताये गये हैं। इन संस्कारों के करने से मन्त्र स्फूर्तियुक्त हो उठते हैं। पुरश्चरण-काल में हविष्य, विहित शाक और विहित फल खाये। जिसका अन्नादि पुरश्चरणकर्ता खाता है, वह आधे फल का अधिकारी होता है। अतः पुरश्चरण-काल में दूसरे के अन्न को न ग्रहण करे। कहा भी है कि 'दूसरे के अन्न से जिसकी जीभ जली हुई है, दान लेने से जिसके दोनों हाथ जले हुये हैं और पराई स्त्री का चिन्तन करने से जिसका मन जला हुआ है, उसे कार्य में कैसे सफलता मिल सकती है!' मन्त्र के सम्बन्ध में यह विचार पहले कर ले कि वह अरि है या मित्र, ऋणी है या धनी। हाँ, स्त्री के द्वारा प्रदत्त या स्वप्न में प्राप्त मन्त्र के सम्बन्ध में इस विचार के करने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार सिद्ध पुरुष के द्वारा उपदिष्ट और माला- मन्त्रों के लिये भी विचार नहीं किया जाता।