भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ६५ शान्त, पवित्र, अल्पाहारी, भूमि पर शयन करनेवाला, भक्ति- मान्, अनुशासनपूर्ण, स्थिरचित्त और मौनी होकर जप करे । साथ ही विश्वास, आस्तिकता, करुणा, श्रद्धा, सन्तोषादि गुणों से युक्त रहे । सुगन्धि, पुष्प, आभूषण और वस्त्रों से अपने शरीर को अलंकृत किये रहे । जप करते-करते यदि थकावट प्रतीत हो, तो पुनः ध्यान करे । ध्यान करने से थकावट आने पर पुनः जप करे । इस प्रकार पुरश्चरण करने से निश्चय ही सिद्धि मिलती है । इस प्रकार मैंने पुरश्चरण के कुछ लक्षण संक्षेप में तुमसे कहे । अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ? ५