कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसोलहवां उल्लास काम्यकर्म का विधान देवी ने कहा—हे दयासागर कुलेश ! मैं काम्य कर्म के विधान को सुनना चाहती हूँ । उसे बताइये । ईश्वर ने कहा—तुम जो पूछती हो, उसे मैं कहूँगा । विशुद्ध हृदय से मन्त्र-साधक श्रीप्रासाद परामन्त्र का पाँच लाख जप करे । जप की दशांश संख्या का हवन करे, दशांश तर्पण करे और उत्तम भोजन, दक्षिणा आदि से यथाशक्ति योगिनियों को सन्तुष्ट करे । इस प्रकार न्यास, जप, ध्यानपूर्वक होमार्चन और तर्पण से मन्त्र- सिद्ध होकर साधक साक्षात् शिवरूप हो जाता है । तब वह अभीष्ट प्रयोगों का साधन करे । मन्त्रसिद्ध साधक के सभी प्रकार के षट्कर्मादि प्रयोग निश्चय ही सफल होते हैं । काम्य प्रयोग करनेवालों का मोक्ष नहीं होता । उन्हें अपने प्रयोगों में सिद्धि मिलती है; यही उनकी सफलता है । एक विधान से दो फल कहीं भी नहीं मिलते । हे देवेशि ! इसी से देवता का यजन निष्काम भाव से करना चाहिए । षट्कर्मों के प्रयाग अपने और दूसरों के लिये किये जाते हैं । प्रयोग के दोषों की शान्ति के लिये और अपनी रक्षा के लिए न्यास- ध्यानपूर्वक एक लाख जप मन्त्र का कर लेना चाहिए । नहीं तो, सफलता के स्थान पर हानि की संभावना रहती है । ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कीलक, देवता, अङ्गन्यास, ध्यान और पूजाविधि का ज्ञान प्राप्त कर मन्त्रों को साधना करनी