भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ६७ चाहिए। पञ्चशुद्धि, आसन, प्राणायाम, माला, दोष-संस्कार- शोधनादि का भी ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए ! हे देवि ! किसी मनोहर स्थान में स्थिर मन होकर साधक सुखासन पर बैठे। फिर गुरु-वन्दनापूर्वक अपने मस्तक में स्थित पूर्णचन्द्र के उज्ज्वल मण्डल का ध्यान करे। उस चन्द्रबिम्ब से निकलती हुई सुधा से अपने शरीर को आप्लावित होता हुआ अनुभव करे। साथ ही षोडशस्वर-युक्त श्रीप्रासाद पर बीज का चिन्तन करता रहे। इस प्रकार १०८ बार श्रीप्रासाद परामन्त्र का जप कर तरुणोल्लास के सहित मण्डल-पूजा करे। इस विधान के फलस्वरूप अकाल मृत्यु, महारोग, वृद्धावस्था एवं मृत्यु-जनित भय, ग्रह, अपस्मार, वेताल, भूत, उन्मादादि के संकट दूर होकर आधि- व्याधि से रहित होकर साधक पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न हो सब लोगों से सम्मानित होता हुआ शतंजीवी होता है। ज्वरोन्मादादि रोगों में शिर में चिन्तन करता हुआ जप करे। शूल, वात, व्रत, ग्रन्थि, मूत्रकृच्छादि के होने पर उन-उन स्थानों का स्पर्श कर पूर्ववत् चिन्तन करता हुआ जप करे। महारोगों के उत्पन्न होने पर सभी अंगों में चिन्तन करे। सिद्धमन्त्री के इस प्रकार ध्यानपूर्वक जप करने पर सभी रोग शान्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। शरीर की इन्द्रियों में जो उक्त प्रकार का ध्यान करता है, उसकी इन्द्रियाँ सुगठित और सुपुष्ट होती हैं। सदैव मूर्ध्नि में ध्यान करने से साधक अजर-अमर होता है। यह फल उक्त सात्विक ध्यान करने से साधक को प्राप्त होता है। सभी शान्ति कर्मों को इसी विधि से सम्पन्न करे। द्वादश आधार पद्मों में द्वादश स्वरों से युक्त बीज का ध्यान करने से साधक अजर-अमर होता है। अथवा षडाधारों में दीर्घस्वरों से युक्त बीज का ध्यान करे। हृदय-कमल की कर्णिका