कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७० हिन्दी कुलार्णव भुक्ति-मुक्ति देने से ‘प्रभु’, देवताओं से भी पूजा प्राप्त करने से ‘योगी’, सुखदुःख को छोड़कर आत्मानुसन्धान में लगे रहने से ‘संयमी’ और तत्त्व का मनन करने तथा शुभ कार्यों के स्वीकार करने से ‘तपस्वी’ कहा जाता है। अक्षर अर्थात् अविनाशी होने से, संस्कार के बन्धनों से मुक्त रहने से और आत्मबोध होने से ‘अवधूत’ नाम पड़ता है। राग, मद, क्लेश, कोप, मात्सर्य, मोह से रहित होने से और रज, तमोगुण से परे रहने के कारण ‘वीर’ कहा जाता है। शक्ति और शिव से उद्भूत जो कुल और गोत्र प्रसिद्ध हैं, उनसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका ज्ञान रखनेवाला ‘कौलिक’ कहलाता है। सार वस्तु का संग्रह करने और धर्म-कर्म में लगे रहने तथा इन्द्रियों का नियमन करने से ‘साधक’ कहा जाता है। मन, वचन और कर्म से परम भक्तिपूर्वक भजन करनेवाला समस्त कठिनाइयों को पार कर जाता है। अतः वह ‘भक्त’ कहलाता है। जो अपने शरीर और प्राणों को सद्गुरु को अर्पित कर योग की शिक्षा ग्रहण करता है, वह ‘शिष्य’ कहा जाता है। योनिमुद्रा का अनुसन्धान करने से और गिरिजा के चरणों की सेवा करने से ‘योगिनी’ कहलाती है। तीव्र स्फूर्ति प्रदान करने से ‘शक्ति’ कही जाती है। स्तुति द्वारा मन को प्रसन्न करने से ‘स्तोत्र’ कहलाता है। अपने हृदय में अभीष्ट देवता का चिन्तन करना ही ‘ध्यान’ कहा जाता है। अखिल धर्मों का निरूपण करने से और सभी दर्शनों का प्रमाण-स्वरूप होने से ‘वेद’ कहलाता है।