कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ७१ पुण्य-पाप का कथन करने से, राक्षसों का निवारण करने से और नवतत्त्वादि का वर्णन करने से 'पुराण' कहा जाता है। वर्णाश्रम के नियमों को सदैव सूचित करने से और सब पापों से तारने के कारण 'शास्त्र' कहलाता है। निमित्तों का स्मरण कराने से और धर्म-अधर्म का निरूपण करने से तथा अज्ञान-तिमिर को दूर करने से 'स्मृति' कही जाती है। दिव्य गति को प्राप्त करने का विधान बताने से और आचार- वर्णन करने से 'आगम' कहलाता है। परादिशक्ति का सान्निध्य प्राप्त करने से 'शाक्त' कहा जाता है। सब मार्गों का आदि होने से और यज्ञादि धर्म का कारण होने से 'आम्नाय' कहलाता है। दिव्य भाव प्रदान करने से, पाप का क्षय करने से और भव- बन्धन से मुक्ति दिलाने से 'दीक्षा' कही जाती है। अलङ्कार के समान शोभायमान होने से और कम्प, आनन्दादि की अनुभूति कराने से 'अभिषेक' कहलाता है। देवता के अमित तेज के तत्त्वरूप का मनन होने से और सभी प्रकार के भयों से रक्षा होने से 'मन्त्र' कहा जाता है। भक्तों के देह में विराजमान होने से और वरदान से तापत्रयादि का शमन करने से 'देवता' नाम पड़ा। न्याय से उपार्जित धन का शरीर में उपयोग करने से और सर्वंरक्षाकारी होने से 'न्यास' कहा जाता है। देवताओं को प्रसन्न करता है और मुक्ति दिलाता है। अतः 'तन्त्र' कहलाता है। अनन्त फल देने से और सभी पापों का क्षय करने से 'अक्ष- माला' कही जाती है।