कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७२ हिन्दी कुलार्णव आत्मसिद्धि देने से, सब रोगों को दूर करने से और नव- सिद्धियाँ प्रदान करने से ‘आसन’ कहलाता है। मायाजाल का शमन करने से, मोक्षमार्ग का निरूपण करने से और आठों प्रकार के दुःखों को दूर करने से ‘मद्य’ कहा जाता है। मङ्गलकारी होने से, संविदानन्द देने से और सब देवताओं का प्रिय होने से ‘मांस’ कहलाता है। पूर्वजन्म के पापों का शमन करने से, अपमृत्यु का निवारण करने से और सभी प्रकार का फल देने से ‘पूजा’ कही जाती है। अभीष्ट फल प्रदान करने से, चतुर्वर्ग-फलों का आश्रय होने से और सब देवताओं की वन्दना होने से ‘अर्चन’ कहलाता है। तत्त्वात्मक देवता को उसके परिवार-सहित आनन्द प्रदान करने से ‘तर्पण’ कहलाता है। गम्भीर पापों, दुर्भाग्य, क्लेशादि का नाश करने से और धर्म का ज्ञान प्रदान करने से ‘गन्ध’ कहा जाता है। आत्मज्ञान देने से, पापों का क्षय करने से और तादात्म्य करने से ‘अक्षत’ कहलाता है। पुण्य की वृद्धि करने से और पुष्कल अर्थदान करने से ‘पुष्प’ कहा जाता है। बड़े से बड़े दोष को दूर करने से और परमानन्द उत्पन्न करने से ‘धूप’ कहलाता है। अज्ञान और अहङ्कार को दूर करने से और परातत्त्व का प्रकाशन करने से ‘दीप’ कहा जाता है। मोह को शान्त करने से और क्षय आदि दुःखों का निवारण करने से तथा दिव्यरूप प्रदान कर परतत्त्व का प्रकाशन करने से ‘मोक्षदीप’ कहलाता है, जो मोक्षमार्ग का अचूक साधन है।