कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ७३ छः रसों से युक्त चतुर्विध द्रव्यों को निवेदित करने से तृप्ति होती है। अतः 'नैवेद्य' कहलाता है। तत्त्वों का प्रकाश करने से 'तत्त्वत्रय' कहे जाते हैं। चतुर्वर्ग का फल देने से और अज्ञानबन्धन से छुटकारा दिलाने से तथा कल्याणकारी धर्म का मूल होने से 'चरुक' कहलाता है। प्रकाशानन्द को उत्पन्न करने से और सामरस्य प्रदान करने से तथा परतत्त्व का दर्शन होने से 'आनन्द' कहा जाता है। पाश को काटने से, नव तत्त्वों को धारण करने से और पवित्र करने के कारण 'स्नान' कहा जाता है। कर्म, मन और वाणी से सभी अवस्था में सदैव समीप रह- कर विधिपूर्वक सेवा करने से 'उपास्ति' कही जाती है। पञ्चाङ्ग उपासना से इष्टदेवता की प्रसन्नता मिलती है। उसे भक्त पहले करता है। अतः 'पुरश्चरण' कहलाता है। इस प्रकार 'गुरु' आदि नामों का रहस्य मैंने हे महेशानि ! संक्षेप में कहा। जो यह सब जानता है, वह कौलिक है। ऊर्ध्वाम्नाय का संक्षेप में वर्णन इस कुलार्णव शास्त्र में हुआ है। इसे गुरुमुख से समझना चाहिये। आवाहनादि सोलह या बारह कर्मों को विधिपूर्वक सम्पन्न करना 'उपहार' कहलाता है। सोलह उपचारों से देवता का पूजन कर उसे अपने स्थान को प्रेषित करना 'मृद्धासन' कहा जाता है। आसन पर सन्निवेशन करना ही 'स्थापन' है। देवता के शरीर में षडङ्गों का न्यास करना 'सकलीकरण' कहलाता है। देवता को आच्छादित करना (ढँकना) 'अवगुण्ठन' कहा जाता है।