कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ हिन्दी कुलार्णव धेनुमुद्रा को दिखाकर 'अमृतीकरण' किया जाता है। 'क्षमस्व' के साथ अंगुलि-प्रदर्शन 'परमीकरण' कहलाता है। देवता का स्वागत कर उससे कुशल-प्रश्न करना चाहिए। श्यामाक, दूर्वा, कमल-पुष्प और विष्णुक्रान्ता-युक्त 'पाद्य' रुचिकर होता है। 'आचमनीय' में जाती, लवङ्ग और कङ्कोल का मिश्रण निर्दिष्ट किया गया है। 'अर्घ्य' के अष्टाङ्ग ये बताये गये हैं— १ सिद्धार्थ (सरसों), २ अक्षत, ३ कुश का अग्रभाग, ४ तिल, ५ जौ, ६ गन्ध, ७ फल और ८ पुष्प। मधु, घृत और दधि से 'मधुपर्क' प्रस्तुत होता है। श्वेत चन्दन, कस्तूरी, कालागुरु आदि से सुगन्धित जल से देह को धोना ही 'स्नान' है। आठों अङ्गों से भूमि को स्पर्श करते हुए प्रणाम करना 'वन्दन' कहलाता है। यह सारा चराचर जगत् 'क्षेत्र' कहा गया है। इस क्षेत्र का जो पालन करता है, वह 'क्षेत्रपाल' कहलाता है।