भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०४ * कूर्मपुराण *


पंद्रहवाँ अध्याय

दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन, पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धक-द्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें ग्रहण करना तथा विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन

सूत उवाचसूतजी बोले—
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>ससर्ज देवान् गन्धर्वान् ऋषींश्चैवासुरोरगान्॥ १ ॥पूर्वकालमें 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारकी स्वयम्भू—ब्रह्माकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, असुरों तथा नागोंकी सृष्टि की।
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।<br>तदा ससर्ज भूतानि मैथुनेनैव धर्मतः॥ २ ॥जब सृष्टि करनेवाले उन दक्षकी वे प्रजाएँ नहीं बढ़ीं, तब उन्होंने मर्यादापूर्वक मिथुन-धर्म (स्त्री-पुरुष-संयोग)-से प्राणियोंकी सृष्टि की।
असिक्न्यां जनयामास वीरणस्य प्रजापतेः।<br>सुतायां धर्मयुक्तायां पुत्राणां तु सहस्रकम्॥ ३ ॥उन्होंने वीरण प्रजापतिकी धर्मपरायणा असिक्नी नामकी कन्यासे एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया।
तेषु पुत्रेषु नष्टेषु मायया नारदस्य सः।<br>षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वैरिण्यां वै प्रजापतिः॥ ४ ॥देवर्षि नारदकी मायासे उन पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर पुनः उन दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीसे ही साठ कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १—४॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत् सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ ५ ॥(उन साठ कन्याओंमेंसे) उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको,
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत् तासां वक्ष्येऽथ विस्तरम्॥ ६ ॥दो बहुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और इसी प्रकार दो कन्याएँ अंगिराको प्रदान कीं। अब मैं उनके वंश-विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥
अरुन्धती वसुर्जाभी लम्बा भानुर्मरुत्वती।<br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी॥ ७ ॥अरुन्धती, वसु, जामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा भामिनी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ हैं।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तासां पुत्रान् निबोधत।<br>विश्वाया विश्वेदेवास्तु साध्या साध्यान्जीजनत्॥ ८ ॥इनके पुत्रोंके नाम सुनो। विश्वाके विश्वेदेव हुए और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको जन्म दिया।
मरुत्वन्तो मरुत्वत्यां वसवोऽष्टौ वसोः सुताः।<br>भानोस्तु भानवश्चैव मुहूर्ता वै मुहूर्तजाः॥ ९ ॥मरुत्वतीसे मरुद्गण हुए और वसुसे वसु नामक आठ पुत्र हुए। भानुसे भानुओं और मुहूर्तासे मुहूर्तोंकी उत्पत्ति हुई।
लम्बायाश्चाथ घोषो वै नागवीथी तु जामिजा।<br>पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो धर्मपुत्रा दश स्मृताः॥ १०॥लम्बासे घोष और जामिसे नागवीथी नामक पुत्र उत्पन्न हुए। अरुन्धतीसे सम्पूर्ण पृथ्वीसे सम्बद्ध प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और संकल्पासे संकल्प नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार धर्मके (ये) दस पुत्र कहे गये हैं॥ ७—१०॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ ११॥आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये अष्ट वसु कहे गये हैं।
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः श्रान्तो धुनिरस्तथा।<br>ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः॥ १२॥आपके वैतण्ड्य, श्रम, श्रान्त तथा धुनि नामक पुत्र हुए और ध्रुवके पुत्र संसारके संहारक भगवान् काल हैं॥ ११-१२॥