भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १४ * १०३

सृजत्येतज्जगत् सर्वं विष्णुस्तत् पश्यतीश्वरः।<br>इत्थं जगत् सर्वमिदं रुद्रनारायणोद्भवम्॥ ९०॥विष्णु इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं और शंकर उसकी देख-रेख करते हैं। इस प्रकार यह सारा संसार रुद्र और नारायणद्वारा ही उत्पन्न होता है॥ ९०॥
तस्मात् त्यक्त्वा हरेर्निन्दां विष्णावपि समाहितः।<br>समाश्रयेन्महादेवं शरण्यं ब्रह्मवादिनाम्॥ ९१॥इसलिये भगवान् शंकरकी निन्दाका परित्याग कर और विष्णुमें भी ध्यान लगाकर ब्रह्मवादियोंके एकमात्र शरण्य महादेवका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ब्रह्माके वचन सुनकर प्रजापति दक्ष चर्माम्बर धारण करनेवाले देव पशुपतिकी शरणमें गये। और जो दूसरे महर्षि दधीचके शापरूपी अग्निसे दग्ध हो गये थे तथा मोहवश शंकरसे द्वेष करनेवाले थे, वे पूर्वजन्मके संस्कारोंके माहात्म्य तथा ब्रह्माके वचनसे सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके कलियुगमें ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे॥ ९१-९४॥
उपश्रुत्याथ वचनं विरिञ्चस्य प्रजापतिः।<br>जगाम शरणं देवं गोपतिं कृत्तिवाससम्॥ ९२॥<br>येऽन्ये शापाग्निानिर्दग्धा दधीचस्य महर्षयः।<br>द्विषन्तो मोहिता देवं सम्बभूवुः कलिष्वथ॥ ९३॥<br><br>त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मणो वचनादिह॥ ९४॥
मुक्तशापास्ततः सर्वे कल्पान्ते रौरवादिषु।<br>निपात्यमानाः कालेन सम्प्राप्यादित्यवर्चसम्।<br>ब्रह्माणं जगतामीशमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा॥ ९५॥रौरव आदि नरकोंमें डाले गये वे सभी (शंकरसे विद्वेष करनेवाले) कल्पान्तमें यथासमय स्वयम्भूकी आज्ञासे आदित्यके समान तेजोमय जगत्के स्वामी ब्रह्मको प्राप्तकर शापसे मुक्त हो जायँगे और तपोयोगद्वारा देवताओंके स्वामी शंकरकी आराधना कर और उनकी कृपासे पुनः जैसे पहले थे वैसे ही (विप्रर्षि) हो जायँगे॥ ९५-९६॥
समाराध्य तपोयोगादीशं त्रिदशाधिपम्।<br>भविष्यन्ति यथा पूर्वं शंकरस्य प्रसादतः॥ ९६॥
एतद् वः कथितं सर्वं दक्षयज्ञनिषूदनम्।<br>शृणुध्वं दक्षपुत्रीणां सर्वासां चैव संततिम्॥ ९७॥प्रसंगवश (मैंने) यह सब दक्ष-यज्ञके विध्वंसकी कथा आप लोगोंसे कही। अब आप लोग प्रजापति दक्षकी सभी कन्याओंकी संतान-परम्पराका वर्णन सुनें॥ ९७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥