संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ * कूर्मपुराण *
त्वं चापि शृणु मे दक्ष वचनं सर्वरक्षणम्। त्यक्त्वा लोकैषणानेतां मद्भक्तो भव यत्नतः ॥ ७६ ॥
भविष्यसि गणेशानः कल्पान्तेऽनुग्रहान्मम । तावत् तिष्ठ ममादेशात् स्वाधिकारेषु निर्वृतः ॥ ७७ ॥
एवमुक्त्वा स भगवान् सपत्नीकः सहानुगः। अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामिततेजसः ॥ ७८ ॥
अन्तर्हिते महादेवे शंकरे पद्मसंभवः। व्याजहार स्वयं दक्षमशेषजगतो हितम् ॥ ७९ ॥
ब्रह्मोवाच
किं तवापगतो मोहः प्रसन्ने वृषभध्वजे । यदाचष्ट स्वयं देवः पालयैतदतन्द्रितः ॥ ८० ॥
सर्वेषामेव भूतानां हृद्येष वसतीश्वरः । पश्यन्त्येनं ब्रह्मभूता विद्वांसो वेदवादिनः ॥ ८१ ॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बीजं परमा गतिः । स्तूयते वैदिकैर्मन्त्रैर्देवदेवो महेश्वरः ॥ ८२ ॥
तमर्चयति यो रुद्रं स्वात्मन्येकं सनातनम् । चेतसा भावयुक्तेन स याति परमं पदम् ॥ ८३ ॥
तस्मादनादिमध्यान्तं विज्ञाय परमेश्वरम् । कर्मणा मनसा वाचा समाराधय यत्नतः ॥ ८४ ॥
यत्नात् परिहरेशस्य निन्दाम आत्मविनाशिनीम् । भवन्ति सर्वदोषाय निन्दकस्य क्रिया यतः ॥ ८५ ॥
यस्त्वैष महायोगी रक्षको विष्णुरव्ययः । स देवदेवो भगवान् महादेवो न संशयः ॥ ८६ ॥
मन्यन्ते ये जगद्योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात् । मोहाद्वेदवनिष्ठत्वात् ते यान्ति नरकं नराः ॥ ८७ ॥
वेदानुवर्तिनो रुद्रं देवं नारायणं तथा । एकीभावेन पश्यन्ति मुक्तिभाजो भवन्ति ते ॥ ८८ ॥
यो विष्णुः स स्वयं रुद्रो यो रुद्रः स जनार्दनः । इति मत्वा यजेद् देवं स याति परमां गतिम् ॥ ८९ ॥
हे दक्ष! तुम भी सभीकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरे वचनको सुनो- तुम 'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ' इस लोकैषणा (यशकी इच्छा)-का परित्यागकर प्रयत्नपूर्वक मेरे भक्त बनो। इस कल्पके बीत जानेपर मेरी कृपासे तुम गणोंके अधिपति बनोगे। मेरे आदेशसे उस समयतक तुम अपने अधिकारपर शान्तिसे बने रहो॥ ७६-७७॥
ऐसा कहकर वे भगवान् शंकर पत्नी पार्वती तथा अपने अनुचरोंसहित अमित तेजस्वी दक्षके लिये अन्तर्धान (अदृश्य) हो गये। महादेव शंकरके अन्तर्धान हो जानेपर साक्षात् पद्मोद्भव ब्रह्माने समस्त संसारके लिये कल्याणकारी वचन कहे- ॥ ७८-७९॥
ब्रह्माजीने कहा-(दक्ष!) वृषभध्वज शंकरके प्रसन्न हो जानेपर क्या तुम्हारा मोह दूर हुआ? साक्षात् भगवान्ने जो तुमसे कहा है, आलस्यरहित होकर उसका पालन करो। ये परमेश्वर सभी प्राणियोंके हृदयमें निवास करते हैं। वेदवादी ब्रह्मस्वरूप विद्वान् लोग इनका दर्शन करते हैं। वे सभी प्राणियोंके आत्मा, वे ही बीजरूप तथा परम गति हैं। वैदिक मन्त्रोंके द्वारा देवदेव महेश्वरकी स्तुति की जाती है। जो उस अद्वितीय सनातन रुद्रकी अपनी आत्मामें श्रद्धायुक्त मनसे आराधना करता है, वह परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित परमेश्वरको जानकर मन, वाणी तथा कर्मसे प्रयत्नपूर्वक उनकी आराधना करो॥ ८०-८४॥
अपना ही विनाश कर डालनेवाली शंकरकी निन्दा करना प्रयत्नपूर्वक छोड़ दो, क्योंकि (भगवान् शंकरकी) निन्दा करनेवालेकी सारी क्रियाएँ दोषयुक्त ही होती हैं। जो आपके ये अव्यय तथा महायोगी विष्णु रक्षक हैं, वे भी देवताओंके देव भगवान् महादेव ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो अज्ञानसे तथा वेदमें निष्ठा न रखनेके कारण संसारके मूल कारण भगवान् विष्णुको शंकरसे पृथक् मानते हैं, वे मनुष्य नरकमें जाते हैं। वेदमार्गका अनुवर्तन करनेवाले लोग रुद्रदेव तथा नारायणको एकीभावसे देखते हैं, अतः वे मुक्तिपदके भागी होते हैं॥ ८५-८८॥
जो विष्णु हैं वे ही साक्षात् रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही जनार्दन विष्णु हैं-इस प्रकार समझकर जो देवका पूजन करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है ॥ ८९ ॥