संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय १४ * | १०१ |
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| तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>धर्षयामास बलवान् स्मयमानो गणेश्वरः॥ ६२॥<br><br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन मुनीनपि मुनीश्वराः॥ ६३॥<br><br>तथा विष्णुं सगरुडं समायान्तं महाबलः।<br>विव्याध निशितैर्बाणैः स्तम्भयित्वा सुदर्शनम्॥ ६४॥<br>समालोक्य महाबाहुरगत्य गरुडो गणम्।<br>जघान पक्षैः सहसा ननादाम्बुनिधिर्यथा॥ ६५॥<br><br>ततः सहस्त्रशो भद्रः ससर्ज गरुडान् स्वयम्।<br>वैनतेयादभ्यधिकान् गरुडं ते प्रदुद्रुवुः॥ ६६॥<br><br>तान् दृष्ट्वा गरुडो धीमान् पलायत महाजवः।<br>विसृज्य माधवं वेगात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७॥<br><br>अन्तर्हिते वैनतेये भगवान् पद्मसम्भवः।<br>आगत्य वारयामास वीरभद्रं च केशवम्॥ ६८॥<br>प्रसादयामास च तं गौरवात् परमेष्ठिनः।<br>संस्तूय भगवानीशः साम्बस्तत्रागमत् स्वयम्॥ ६९॥<br><br>वीक्ष्य देवाधिदेवं तं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।<br>तुष्टाव भगवान् ब्रह्मा दक्षः सर्वे दिवौकसः॥ ७०॥<br><br>विशेषात् पार्वतीं देवीमीश्वरार्धशरीरिणीम्।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दक्षः प्रणम्य च कृताञ्जलिः॥ ७१॥<br><br>ततो भगवती देवी प्रहसन्ती महेश्वरम्।<br>प्रसन्नमानसा रुद्रं वचः प्राह घृणानिधिः॥ ७२॥<br>त्वमेव जगतः स्रष्टा शासिता चैव रक्षकः।<br>अनुग्राह्यो भगवता दक्षश्चापि दिवौकसः॥ ७३॥<br><br>ततः प्रहस्य भगवान् कपर्दी नीललोहितः।<br>उवाच प्रणतान् देवान् प्राचेतसमथो हरः॥ ७४॥<br><br>गच्छध्वं देवताः सर्वाः प्रसन्नो भवतामहम्।<br>सम्पूज्यः सर्वयज्ञेषु न निन्द्योऽहं विशेषतः॥ ७५॥ | इसी प्रकार लीला करते हुए बलशाली गणेश्वर वीरभद्रने हँसकर पैरके अँगूठेसे चन्द्रमाको धर्षित कर (रौंद) दिया। अग्नि (देवता)-के दोनों हाथोंको काटकर लीलासे ही उनकी जीभ उखाड़ दी। मुनीश्वरो! उन्होंने पैरसे मुनियोंके मस्तकपर भी प्रहार किया। साथ ही (उस) महाबली (वीरभद्र)-ने सुदर्शनचक्रको स्तम्भित कर गरुडपर बैठकर आते हुए विष्णुको भी तीक्ष्ण बाणोंसे विद्ध (चोटिल) कर दिया॥ ६२-६४॥<br><br>महाबाहु गरुडने वहाँ आकर गण (वीरभद्र)-को देखकर अचानक उन्हें अपने पंखोंसे मारा और समुद्रके समान गर्जन किया। तदनन्तर उन वीरभद्रने भी स्वयं हजारों गरुडोंको उत्पन्न कर डाला, जो विनतापुत्र गरुडसे भी अधिक बलशाली थे, वे सभी गरुडके ऊपर टूट पड़े। उन (वीरभद्रद्वारा उत्पन्न) गरुडोंको देखकर बुद्धिमान् वे गरुड विष्णुको छोड़कर बड़े ही वेगसे भाग उठे, यह एक आश्चर्यकी बात थी। विनताके पुत्र गरुडके अन्तर्धान हो जानेपर कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माने वहाँ उपस्थित होकर वीरभद्र तथा केशवको (युद्ध करनेसे) रोका॥ ६५-६८॥<br><br>परमेष्ठी ब्रह्माकी महत्ताको समझकर (वीरभद्रने उनकी) स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। (उस समय) पार्वतीसहित साक्षात् भगवान् शंकर भी वहाँ आये। सभी गणोंसे घिरे हुए पार्वतीसहित उन देवाधिदेव शंकरको देखकर भगवान् ब्रह्मा, दक्ष तथा द्युलोकमें रहनेवाले सभी देवता उनकी (भगवान् शंकरकी) स्तुति करने लगे। दक्षने विशेषरूपसे शंकरकी अर्धाङ्गिनी देवी पार्वतीको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे प्रसन्न किया। तदनन्तर दयाकी निधि देवी भगवतीने हँसते हुए प्रसन्न-मनसे महेश्वर रुद्रसे यह वचन कहा- ॥ ६९-७२॥<br><br>आप ही संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा आप ही शासन करनेवाले एवं रक्षक हैं। आप भगवान्को दक्ष तथा देवताओंपर कृपा करनी चाहिये। तदनन्तर जटा धारण करनेवाले नीललोहित भगवान् हरने हँसकर देवताओं तथा प्रचेतापुत्र दक्षसे कहा-॥ ७३-७४॥<br><br>देवताओ! आप सभी लोग जायें। मैं आपपर प्रसन्न हूँ। सभी यज्ञोंमें विशेषरूपसे मेरी पूजा करनी चाहिये और मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ७५॥ |