भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०८ * कूर्मपुराण *

तत्संनियोगादसुरः प्रह्लादो विष्णुमव्ययम्।<br>युयुधे सर्वयत्नेन नरसिंहेन निर्जितः ॥ ५४ ॥<br><br>ततः संचोदितो दैत्यो हिरण्याक्षस्तदानुजः।<br>ध्यात्वा पशुपतेरस्त्रं ससर्ज च ननाद च ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>न हानिमकरोदस्त्रं यथा देवस्य शूलिनः ॥ ५६ ॥उसकी आज्ञा पाकर असुर प्रह्लादने सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा अव्यय विष्णुके साथ युद्ध किया, किंतु वह नरसिंहद्वारा पराजित हो गया। तदनन्तर उस (हिरण्यकशिपु)-की आज्ञा प्राप्तकर उसके छोटे भाई हिरण्याक्षने पाशुपतास्त्रका ध्यान करके उसे चलाया और गर्जना की। वह अस्त्र देवाधिदेव अमित तेजस्वी उन विष्णुकी, कोई हानि न कर सका जैसे कोई अस्त्र त्रिशूलधारी देव (शंकर)-की हानि नहीं करता ॥ ५४-५६ ॥
दृष्ट्वा पराहतं त्वस्त्रं प्रह्लादो भाग्यगौरवात्।<br>मेने सर्वात्मकं देवं वासुदेवं सनातनम् ॥ ५७ ॥<br><br>संत्यज्य सर्वशस्त्राणि सत्त्वयुक्तेन चेतसा।<br>ननाम शिरसा देवं योगिनां हृदयेशयम् ॥ ५८ ॥<br><br>स्तुत्वा नारायणैः स्तोत्रैः ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>निवार्य पितरं भ्रातॄन् हिरण्याक्षं तदाब्रवीत् ॥ ५९ ॥अस्त्रको विफल होते देखकर भाग्यशाली होनेके कारण प्रह्लादने उन देवको सर्वात्मक सनातन वासुदेव ही समझा। उसने सभी शस्त्रोंका परित्याग कर दिया और सत्त्वगुणसम्पन्न चित्तसे योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले देवको सिरसे प्रणाम किया तथा ऋक्, यजुष् तथा सामवेदमें प्राप्त वैष्णव स्तुतियोंके द्वारा स्तुतिकर अपने पिता (हिरण्यकशिपु), भाइयों एवं हिरण्याक्षको युद्ध करनेसे रोकते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ५७-५९ ॥
अयं नारायणोऽनन्तः शाश्वतो भगवानजः।<br>पुराणपुरुषो देवो महायोगी जगन्मयः ॥ ६० ॥<br>अयं धाता विधाता च स्वयंज्योतिर्निरञ्जनः।<br>प्रधानपुरुषस्तत्त्वं मूलप्रकृतिरव्ययः ॥ ६१ ॥<br>ईश्वरः सर्वभूतानामन्तर्यामी गुणातिगः।<br>गच्छध्वमेनं शरणं विष्णुमव्यक्तमव्ययम् ॥ ६२ ॥ये अनन्त, सनातन, अजन्मा, महायोगी, जगन्मय पुराणपुरुष भगवान् नारायण देव हैं। ये धाता, विधाता, स्वयंज्योति, निरञ्जन, प्रधानपुरुषरूप, तत्त्व, मूलप्रकृति, अव्यय, ईश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तर्यामी तथा गुणातीत हैं। इन अव्यक्त, अव्यय विष्णुकी आप लोग शरण ग्रहण करें ॥ ६०-६२ ॥
एवमुक्ते सुदुर्बुद्धिर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>प्रोवाच पुत्रमत्यर्थं मोहितो विष्णुमायया ॥ ६३ ॥<br><br>अयं सर्वात्मना वध्यो नृसिंहोऽल्पपराक्रमः।<br>समागतोऽस्मद्भवनमिदानीं कालचोदितः ॥ ६४ ॥(प्रह्लादके) इस प्रकार कहनेपर विष्णुकी मायासे अत्यन्त मोहित दुर्बुद्धि हिरण्यकशिपुने स्वयं पुत्रसे कहा—यह थोड़े पराक्रमवाला नरसिंह सभी प्रकारसे वध करने योग्य है। कालके द्वारा प्रेरित होकर इस समय यह हमारे घरमें ही आ गया है ॥ ६३-६४ ॥
विहस्य पितरं पुत्रो वचः प्राह महामतिः।<br>मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम् ॥ ६५ ॥<br><br>कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः।<br>कालेन हन्यते विष्णुः कालात्मा कालरूपधृक् ॥ ६६ ॥<br><br>ततः सुवर्णकशिपुर्दुरात्मा विधिचोदितः।<br>निवारितोऽपि पुत्रेण युयोध हरिमव्ययम् ॥ ६७ ॥<br><br>संरक्तनयनोऽनन्तो हिरण्यनयनाग्रजम्।<br>नखैर्विदारयामास प्रह्लादस्यैव पश्यतः ॥ ६८ ॥पिताका वचन सुनकर महामति प्रह्लादने हँसकर कहा—प्राणियोंके एकमात्र स्वामी इन अव्ययकी निन्दा मत करो। सनातन, कालवर्जित, कालात्मा, कालका रूप धारण करनेवाले, महादेव विष्णु देवको काल कैसे मार सकता है। तदनन्तर भाग्यसे प्रेरित हिरण्यकशिपु पुत्रके द्वारा रोके जानेपर भी अव्यय हरिसे लड़ने लगा। (क्रोधसे) अत्यन्त लाल नेत्रोंवाले अनन्त विष्णुने प्रह्लादके देखते-ही-देखते हिरण्य (स्वर्ण)-के समान नयन हैं जिसके, उस हिरण्यनयन (हिरण्याक्ष)-के बड़े भाई हिरण्यकशिपुको अपने नखोंद्वारा विदीर्ण कर डाला ॥ ६५-६८ ॥