भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १५ *१०९
हते हिरण्यकशिपौ हिरण्याक्षो महाबलः।<br>विसृज्य पुत्रं प्रह्लादं दुद्रुवे भयविह्वलः॥ ६९॥<br><br>अनुह्लादादयः पुत्रा अन्ये च शतशोऽसुराः।<br>नृसिंहदेहसम्भूतैः सिंहैर्नीता यमालयम्॥ ७०॥<br><br>ततः संहृत्य तद्रूपं हरिर्नारायणः प्रभुः।<br>स्वमेव परमं रूपं ययौ नारायणाह्वयम्॥ ७१॥हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर भयसे विह्वल महाबली हिरण्याक्ष पुत्र प्रह्लादको छोड़कर भाग चला। नरसिंहकी देहसे उत्पन्न सिंहोंने (हिरण्यकशिपुके) अनुह्लाद आदि पुत्रों तथा अन्य सैकड़ों असुरोंको यमलोक पहुँचा दिया। तदनन्तर प्रभु नारायण हरिने उस (नरसिंह) रूपको समेटकर अपने ही नारायण नामवाले श्रेष्ठ रूपको धारण कर लिया तथा अपने धामके लिये प्रस्थान किया॥ ६९—७१॥
गते नारायणे दैत्यः प्रह्लादोऽसुरसत्तमः।<br>अभिषेकेण युक्तेन हिरण्याक्षमयोजयत्॥ ७२॥<br><br>स बाधयामास सुरान् रणे जित्वा मुनीनपि।<br>लब्ध्वान्धकं महापुत्रं तपसाराध्य शंकरम्॥ ७३॥<br><br>देवाञ्जित्वा सदेवेन्द्रान् बध्वा च धरणीमिमाम्।<br>नीत्वा रसातलं चक्रे वन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥ ७४॥नारायणके चले जानेपर असुरश्रेष्ठ दैत्य प्रह्लादने (अपने चाचा) हिरण्याक्षका यथोचित अभिषेक किया। उस (हिरण्याक्ष)-ने युद्धमें देवताओं और मुनियोंको जीतकर उन्हें पीड़ा पहुँचायी और तपस्याके द्वारा शंकरकी आराधना करके अन्धक नामक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त किया। उसने देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओंको जीत लिया तथा कमलके समान कान्तिवाली इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर बंदी बना लिया॥ ७२—७४॥
ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।<br>गत्वा विज्ञापयामासुर्विष्णवे हरिमन्दिरम्॥ ७५॥तब मुरझायी हुई मुखकी शोभावाले सभी देवता ब्रह्मासहित हरिके निवासमें गये और उन्हें (सारा वृत्तान्त) बतलाया॥ ७५॥
स चिन्तयित्वा विश्वात्मा तद्वधोपायमव्ययः।<br>सर्वदेवमयं शुभ्रं वाराहं वपुरादधे॥ ७६॥<br><br>गत्वा हिरणयनयनं हत्वा तं पुरुषोत्तमः।<br>दंष्ट्रयोद्धारयामास कल्पादौ धरणीमिमाम्॥ ७७॥<br><br>त्यक्त्वा वराहसंस्थानं संस्थाप्य च सुरद्विजान्।<br>स्वामेव प्रकृतिं दिव्यां ययौ विष्णुः परं पदम्॥ ७८॥अव्यय उन विश्वात्माने उस हिरण्याक्षके वधका उपाय सोचते हुए सर्वदेवमय स्वच्छ वराहके शरीरको धारण किया। हिरण्याक्षके समीप जाकर पुरुषोत्तमने उसे मार डाला और कल्पके आदिमें (हिरण्याक्षके द्वारा रसातल ले जायी गयी) इस पृथ्वीका अपने दाढ़ोंद्वारा (उठाकर) उद्धार किया। वराह-रूपका परित्याग कर तथा देवताओं और ब्राह्मणोंको यथास्थान प्रतिष्ठित कर विष्णुने अपने ही दिव्य (चतुर्भुज)-स्वरूपको धारण किया और वे अपने परम पदकी ओर चले गये॥ ७६—७८॥
तस्मिन् हतेऽमररिपौ प्रह्लादो विष्णुतत्परः।<br>अपालयत् स्वकं राज्यं भावं त्यक्त्वा तदासुरम्॥ ७९॥<br><br>इयाज विधिवद् देवान् विष्णोराराधने रतः।<br>निःसपत्नं तदा राज्यं तस्यासीद् विष्णुवैभवात्॥ ८०॥देवताओंके शत्रु उस (हिरण्याक्ष)-के मारे जानेपर विष्णुपरायण प्रह्लाद आसुर भावका परित्याग कर अपने राज्यका पालन करने लगा। विष्णुकी आराधनामें निरत रहते हुए उसने विधिपूर्वक देवोंका यज्ञ आदिद्वारा पूजन किया। विष्णुके प्रतापसे उसका राज्य किसी प्रतिद्वन्द्वी (शत्रु) आदिसे रहित था॥ ७९-८०॥
ततः कदाचिदसुरो ब्राह्मणं गृहमागतम्।<br>तापसं नार्चयामास देवानां चैव मायया॥ ८१॥एक बारकी बात है—देवताओंकी मायाके वशीभूत असुर प्रह्लादने घरमें आये हुए तपस्वी ब्राह्मणकी पूजा नहीं की॥ ८१॥