भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

११० * कूर्मपुराण *


स तेन तापसोऽत्यर्थं मोहितेनावमानितः।<br>शशापासुरराजानं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ८२ ॥मायासे अत्यन्त मोहित उस तपस्वी प्रह्लादके द्वारा अपमानित होकर क्रोधसे रक्तनेत्रवाले उस तपस्वी ब्राह्मणने असुरराज (प्रह्लाद)-को शाप दे डाला—जिस बलका आश्रय ग्रहणकर तुम ब्राह्मणोंकी अवमानना कर रहे हो, तुम्हारी वह दिव्य वैष्णवी भक्ति विनष्ट हो जायगी ॥ ८२-८३ ॥
यत्तद्वलं समाश्रित्य ब्राह्मणानवमन्यसे।<br>सा भक्तिर्वैष्णवी दिव्या विनाशं ते गमिष्यति ॥ ८३ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ तूर्णं प्रह्लादस्य गृहाद् द्विजः।<br>मुमोह राज्यसंसक्तः सोऽपि शापबलात् ततः ॥ ८४ ॥ऐसा कहकर वह ब्राह्मण प्रह्लादके घरसे शीघ्र ही निकल पड़ा और प्रह्लाद भी शापके प्रभावसे राज्य-संचालनमें लगे रहनेपर भी मोहग्रस्त हो गया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको पीड़ित करने लगा और जनार्दनको भूल-सा गया। पिता (हिरण्यकशिपु)-के वधका स्मरणकर वह हरि (विष्णु)-पर क्रुद्ध हो गया। तब उन दोनों सुरद्रोही प्रह्लाद और नारायणदेवमें अत्यन्त घोर रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ। बड़ा भारी युद्ध करनेके बाद विष्णुने उसे जीत लिया। पहलेके संस्कारके माहात्म्यसे उसे परमपुरुष हरिका वास्तविक ज्ञान उद्बुद्ध हो गया और वह उनकी शरणमें गया। तबसे नारायण पुरुषोत्तममें अनन्य भक्ति रखते हुए उस दैत्येन्द्र प्रह्लादको महायोगकी प्राप्ति हुई ॥ ८४-८८ ॥
बाधयामास विप्रेन्द्रान् न विवेद जनार्दनम्।<br>पितुर्वधमनुस्मृत्य क्रोधं चक्रे हरिं प्रति ॥ ८५ ॥
तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>नारायणस्य देवस्य प्रह्लादस्यामरद्विषः ॥ ८६ ॥
कृत्वा तु सुमहद् युद्धं विष्णुना तेन निर्जितः।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्यात् परस्मिन् पुरुषे हरौ।<br>संजातं तस्य विज्ञानं शरण्यं शरणं ययौ ॥ ८७ ॥
ततः प्रभृति दैत्येन्द्रो ह्यनन्यां भक्तिमुद्वहन्।<br>नारायणे महायोगमवाप पुरुषोत्तमे ॥ ८८ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्रे योगसंसक्तचेतसि।<br>अवाप तन्महद् राज्यमन्धकोऽसुरपुङ्गवः ॥ ८९ ॥हिरण्यकशिपुके पुत्र (प्रह्लाद)-का चित्त योगमें आसक्त हो जानेपर शम्भुके देहसे* उत्पन्न हिरण्याक्षके पुत्र असुर श्रेष्ठ अन्धकने उस विशाल राज्यको प्राप्त किया तथा मन्दर पर्वतपर अवस्थित पर्वत (हिमालय)-की पुत्री उमा देवीको प्राप्त करनेकी इच्छा की ॥ ८९-९० ॥
हिरण्यनेत्रतनयः शम्भोर्देहसमुद्भवः।<br>मन्दरस्थामुमां देवीं चकमे पर्वतात्मजाम् ॥ ९० ॥
पुरा दारुवने पुण्ये मुनयो गृहमेधिनः।<br>ईश्वराराधनार्थाय तपश्चेरुः सहस्रशः ॥ ९१ ॥प्राचीन कालकी बात है, हजारों गृहस्थ मुनि पुण्यदायी दारुवनमें ईश्वरकी आराधना करनेके लिये तप करते थे। तदनन्तर कालयोगसे किसी समय प्राणियोंका विनाश करनेवाली अत्यन्त उग्र तथा भयंकर अनावृष्टि हुई। भूखसे व्याकुल सभी मुनियोंने साथ मिलकर तपोनिधि गौतमसे प्राण धारणके निमित्त भोजनकी याचना की। बुद्धिमान् उन गौतमने उन सभीको अत्यधिक स्वादयुक्त अन्न प्रदान किया। उन सभी ब्राह्मणोंने निःशंक-मनसे भोजन किया ॥ ९१-९४ ॥
ततः कदाचिन्महती कालयोगेन दुस्तरा।<br>अनावृष्टिरतीवोग्रा ह्यासीद् भूतविनाशिनी ॥ ९२ ॥
समेत्य सर्वे मुनयो गौतमं तपसां निधिम्।<br>अयाचन्त क्षुधाविष्टा आहारं प्राणधारणम् ॥ ९३ ॥
स तेभ्यः प्रददावन्नं मृष्टं बहुतरं बुधः।<br>सर्वे बुभुजिरे विप्रा निर्विशङ्केन चेतसा ॥ ९४ ॥
गते तु द्वादशे वर्षे कल्पान्त इव शंकरी।<br>बभूव वृष्टिर्महती यथापूर्वमभूज्जगत् ॥ ९५ ॥बारह वर्ष व्यतीत हो जानेपर कल्पान्तमें होनेवाली कल्याणकारिणी वृष्टिके सदृश महान् वृष्टि हुई। संसार (पुनः) पहलेके समान हो गया ॥ ९५ ॥

* शम्भुकी आराधनासे ही हिरण्याक्षको अन्धक (पुत्र)-की प्राप्ति हुई थी।

संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 120, कुल 506 में से · BharatKosha