संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १५ * १११
ततः सर्वे मुनिवराः समामन्त्र्य परस्परम्।
महर्षिं गौतमं प्रोचुर्गच्छाम इति वेगतः॥ ९६ ॥
तब सभी मुनिवरोंने आपसमें मन्त्रणा कर महर्षि गौतमसे पूछा—क्या हमलोग शीघ्र यहाँसे चले जायें?
निवारयामास च तान् कञ्चित् कालं यथासुखम्।
उषित्वा मद्गृहेऽवश्यं गच्छध्वमिति पण्डिताः॥ ९७ ॥
तब गौतमने उन लोगोंको रोकते हुए कहा—पण्डितजनो! कुछ समय और यहाँ मेरे घरमें सुखपूर्वक रहें, इसके बाद आप सभी जायें।
ततो मायामयीं सृष्ट्वा कृशां गां सर्व एव ते।
समीपं प्रापयामासुर्गौतमस्य महात्मनः॥ ९८ ॥
तत्पश्चात् उन सभीने मायामयी एक कमजोर गाय बनाकर उसे महात्मा गौतमके समीप पहुँचा दिया।
सोऽनुवीक्ष्य कृपाविष्टस्तस्याः संरक्षणोत्सुकः।
गोष्ठे तां बन्धयामास स्पृष्टमात्रा ममार सा॥ ९९ ॥
गायको देखकर उसकी रक्षाके लिये उत्सुक दयालु मुनिने अपनी गोशालामें उसे बाँध दिया, किंतु वह गाय छूते ही मर गयी॥ ९६—९९॥
स शोकेनाभिसंतप्तः कार्याकार्यं महामुनिः।
न पश्यति स्म सहसा तादृशं मुनयोऽब्रुवन्॥ १००॥
शोकसे अत्यन्त दुःखी वे महामुनि उस समय किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये। तब शीघ्र ही मुनियोंने ऐसे उन (गौतम मुनि)-से कहा—॥ १००॥
गोवध्येयं द्विजश्रेष्ठ यावत् तव शरीरगा।
तावत् तेऽन्नं न भोक्तव्यं गच्छामो वयमेव हि॥ १०१॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! जबतक यह गोहत्या आपके शरीरमें (व्याप्त) रहेगी, तबतक आपके यहाँ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये, इसलिये हमलोग जा रहे हैं॥ १०१॥
तेन ते मुदिताः सन्तो देवदारुवनं शुभम्।
जग्मुः पापवशं नीतास्तपश्कर्तुं यथा पुरा॥ १०२॥
इस प्रकार पापके वशीभूत हुए वे (मुनिजन) प्रसन्न होकर पहलेके ही समान तप करनेके लिये शुभ देवदारु वनमें चले गये।
स तेषां मायया जातां गोवध्यां गौतमो मुनिः।
केनापि हेतुना ज्ञात्वा शशापातीवकोपनः॥ १०३॥
उन गौतम मुनिने उन मुनियोंकी मायाद्वारा करायी गयी गोहत्याको किसी प्रकारसे जान लिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर (इस प्रकार) शाप दिया॥ १०२-१०३॥
भविष्यन्ति त्रयीबाह्या महापातकिभिः समाः।
बभूवुस्ते तथा शापाज्जायमानाः पुनः पुनः॥ १०४॥
महापातकियोंके समान ये लोग वेदसे बहिष्कृत हो जायँगे और शापके कारण बार-बार जन्म लेनेवाले होंगे।
सर्वे सम्प्राप्य देवेशं शंकरं विष्णुमव्ययम्।
अस्तुवन् लौकिकैः स्तोत्रैरुच्छिष्टा इव सर्वगौ॥ १०५॥
भोजनसे बची हुई जूठनके समान वे सभी (शापसे भयभीत होकर) सर्वव्यापक देवेश शंकर तथा अव्यय विष्णुके पास पहुँचकर उनकी लौकिक स्तुतियोंसे स्तुति करने लगे—॥ १०४-१०५॥
देवदेवौ महादेवौ भक्तानामार्तिनाशनौ।
कामवृत्त्या महायोगौ पापान्नस्त्रातुमर्हथः॥ १०६॥
हे देवदेव (विष्णु) ! हे महादेव ! (शंकर) आप दोनों भक्तोंका कष्ट दूर करनेवाले हैं और इच्छानुसार योगका अवलम्बन करनेवाले हैं। आप हम लोगोंकी पापसे रक्षा करें।
तदा पार्श्वस्थितं विष्णुं सम्प्रेक्ष्य वृषभध्वजः।
किमेतेषां भवेत् कार्यं प्राह पुण्यैषिणामिति॥ १०७॥
तब समीपमें स्थित विष्णुकी ओर देखकर वृषभध्वज शंकरने कहा—बताइये कि ये पुण्यकी इच्छा करनेवाले लोग क्या चाहते हैं?
ततः स भगवान् विष्णुः शरण्यो भक्तवत्सलः।
गोपतिं प्राह विप्रेन्द्रान्नालोक्य प्रणतान् हरिः॥ १०८॥
तब भक्तवत्सल, शरण्य हरि उन भगवान् विष्णुने विनीत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी ओर देखकर शंकरजीसे कहा—॥ १०६-१०८॥
न वेदबाह्ये पुरुषे पुण्यलेशोऽपि शंकर।
संगच्छते महादेव धर्मो वेदाद् विनिर्बभौ॥ १०९॥
शंकर! वेदबाह्य पुरुषमें पुण्यका लेशमात्र भी नहीं रहता। हे महादेव! वेदसे ही धर्म उत्पन्न हुआ है॥ १०९॥