संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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११२ * कूर्मपुराण *
| तथापि भक्तवात्सल्याद् रक्षितव्या महेश्वर ।<br>अस्माभिः सर्व एवैमे गन्तारो नरकानपि ॥ ११० ॥ | तथापि महेश्वर! भक्तवत्सलताके कारण नरकोंमें जानेवाले इन सभीकी हमारे द्वारा रक्षा की जानी चाहिये ऐसा उचित प्रतीत होता है। इसलिये वृषध्वज! वेदबाह्य पापियोंकी रक्षा करने एवं उन्हें मोहित करनेके लिये मैं शास्त्रोंकी रचना करूँगा। इस प्रकार मुरारि माधवसे प्रेरित किये गये रुद्रने मोहित करनेवाले शास्त्रोंको बनाया और उसी प्रकार शिवसे प्रेरणा प्राप्त केशवने भी ऐसे ही शास्त्रोंकी रचना की। कापाल, नाकुल, वाम, भैरव, पूर्वपश्चिम, पञ्चरात्र, पाशुपत तथा अन्य भी सहस्रों शास्त्रोंकी रचना करके उन देवोंने उन (वेदबाह्य)—से कहा—इन शास्त्रोंमें बताये गये कर्मोंको करनेके कारण बहुत कल्पोंतक आप सब घोर अन्धकारपूर्ण नरकोंमें गिरेंगे और फिर पाप-समूहके क्षीण हो जानेपर मनुष्यलोक प्राप्त करेंगे। पुनः ईश्वरकी आराधनाके बलपर पुण्यवानोंकी गति प्राप्त करेंगे। आप सभी मेरी प्रसन्नताके लिये ऐसा ही करें, आप लोगोंके निस्तारणका अर्थात् दोषमुक्त होनेका इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ११०-११५ ॥ |
| तस्माद् वै वेदबाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम् ।<br>विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यामो वृषध्वज ॥ १११ ॥ | |
| एवं सम्बोधितो रुद्रो माधवेन मुरारिणा ।<br>चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवेरितः ॥ ११२ ॥ | |
| कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम् ।<br>पञ्चरात्रं पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः ॥ ११३ ॥ | |
| सृष्ट्वा तानूचतुर्देवौ कुर्वाणाः शास्त्रचोदितम् ।<br>पतन्तो निरये घोरे बहून् कल्पान् पुनः पुनः ॥ ११४ ॥ | |
| जायन्तो मानुषे लोके क्षीणपापचयस्ततः ।<br>ईश्वराराधनबलाद् गच्छध्वं सुकृतां गतिम् ।<br>वर्तध्वं मत्प्रसादेन नान्यथा निष्कृतिर्हि वः ॥ ११५ ॥ | |
| एवमीश्वरविष्णुभ्यां चोदितास्ते महर्षयः ।<br>आदेशं प्रत्यपद्यन्त शिरसाऽसुरविद्विषोः ॥ ११६ ॥ | इस प्रकार शिव तथा विष्णुके द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर उन महर्षियोंने असुरोंसे द्वेष करनेवाले उन दोनों देवोंकी आज्ञाको सिरसे स्वीकार किया। पुनः उन लोगोंने भी दूसरे शास्त्रोंकी रचना कर उनमें प्रवृत्त होनेवाले शिष्योंको पढ़ाया तथा उन शास्त्रोंके पढ़नेका फल भी बताया ॥ ११६-११७ ॥ |
| चक्रुस्तेऽन्यानि शास्त्राणि तत्र तत्र रताः पुनः ।<br>शिष्यानध्यापयामासुर्दर्शयित्वा फलानि तु ॥ ११७ ॥ | |
| मोहयन्त इमं लोकमवतीर्य महीतले ।<br>चकार शंकरो भिक्षां हितायैषां द्विजैः सह ॥ ११८ ॥ | शिवने इन (ब्राह्मणों)—के कल्याणके लिये पृथ्वीपर अवतार लेकर लोगोंको मोहित करते हुए ब्राह्मणोंके साथ भिक्षावृत्ति ग्रहण की। कपालोंकी मालाका आभूषण धारणकर, चिता-भस्म लगाकर और जटामण्डलसे मण्डित हो इस लोकको मोहित किया। देवी पार्वतीको अमित तेजस्वी विष्णुके समीप रखा और दुष्टोंका निग्रह करनेके लिये अपने अङ्गसे उत्पन्न रुद्र भैरवको नियुक्त किया। देवीको नारायणके समीप रखकर कुलनन्दन नन्दीको वहाँ रखा तथा इन्द्रादि देवों एवं गणपोंको भी वहाँ स्थापित किया ॥ ११८-१२१ ॥ |
| कपालमालाभरणः प्रेतभस्मावगुण्ठितः ।<br>विमोहयँल्लोकमिमं जटामण्डलमण्डितः ॥ ११९ ॥ | |
| निक्षिप्य पार्वतीं देवीं विष्णावमिततेजसि ।<br>नियोज्याङ्गभवं रुद्रं भैरवं दुष्टनिग्रहे ॥ १२० ॥ | |
| दत्त्वा नारायणे देवीं नन्दिनं कुलनन्दनम् ।<br>संस्थाप्य तत्र गणपान् देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ १२१ ॥ | |
| प्रस्थितेऽथ महादेवे विष्णुर्विश्वतनुः स्वयम् ।<br>स्त्रीरूपधारी नियतं सेवते स्म महेश्वरीम् ॥ १२२ ॥ | महादेवके जानेके पश्चात् विश्वतनु साक्षात् विष्णु स्त्री-रूप धारण करके महेश्वरी पार्वतीकी भलीभाँति सेवा करने लगे ॥ १२२ ॥ |