संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११२ * कूर्मपुराण *
| तथापि भक्तवात्सल्याद् रक्षितव्या महेश्वर ।<br>अस्माभिः सर्व एवैमे गन्तारो नरकानपि ॥ ११० ॥ | तथापि महेश्वर! भक्तवत्सलताके कारण नरकोंमें जानेवाले इन सभीकी हमारे द्वारा रक्षा की जानी चाहिये ऐसा उचित प्रतीत होता है। इसलिये वृषध्वज! वेदबाह्य पापियोंकी रक्षा करने एवं उन्हें मोहित करनेके लिये मैं शास्त्रोंकी रचना करूँगा। इस प्रकार मुरारि माधवसे प्रेरित किये गये रुद्रने मोहित करनेवाले शास्त्रोंको बनाया और उसी प्रकार शिवसे प्रेरणा प्राप्त केशवने भी ऐसे ही शास्त्रोंकी रचना की। कापाल, नाकुल, वाम, भैरव, पूर्वपश्चिम, पञ्चरात्र, पाशुपत तथा अन्य भी सहस्रों शास्त्रोंकी रचना करके उन देवोंने उन (वेदबाह्य)—से कहा—इन शास्त्रोंमें बताये गये कर्मोंको करनेके कारण बहुत कल्पोंतक आप सब घोर अन्धकारपूर्ण नरकोंमें गिरेंगे और फिर पाप-समूहके क्षीण हो जानेपर मनुष्यलोक प्राप्त करेंगे। पुनः ईश्वरकी आराधनाके बलपर पुण्यवानोंकी गति प्राप्त करेंगे। आप सभी मेरी प्रसन्नताके लिये ऐसा ही करें, आप लोगोंके निस्तारणका अर्थात् दोषमुक्त होनेका इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ११०-११५ ॥ |
| तस्माद् वै वेदबाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम् ।<br>विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यामो वृषध्वज ॥ १११ ॥ | |
| एवं सम्बोधितो रुद्रो माधवेन मुरारिणा ।<br>चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवेरितः ॥ ११२ ॥ | |
| कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम् ।<br>पञ्चरात्रं पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः ॥ ११३ ॥ | |
| सृष्ट्वा तानूचतुर्देवौ कुर्वाणाः शास्त्रचोदितम् ।<br>पतन्तो निरये घोरे बहून् कल्पान् पुनः पुनः ॥ ११४ ॥ | |
| जायन्तो मानुषे लोके क्षीणपापचयस्ततः ।<br>ईश्वराराधनबलाद् गच्छध्वं सुकृतां गतिम् ।<br>वर्तध्वं मत्प्रसादेन नान्यथा निष्कृतिर्हि वः ॥ ११५ ॥ | |
| एवमीश्वरविष्णुभ्यां चोदितास्ते महर्षयः ।<br>आदेशं प्रत्यपद्यन्त शिरसाऽसुरविद्विषोः ॥ ११६ ॥ | इस प्रकार शिव तथा विष्णुके द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर उन महर्षियोंने असुरोंसे द्वेष करनेवाले उन दोनों देवोंकी आज्ञाको सिरसे स्वीकार किया। पुनः उन लोगोंने भी दूसरे शास्त्रोंकी रचना कर उनमें प्रवृत्त होनेवाले शिष्योंको पढ़ाया तथा उन शास्त्रोंके पढ़नेका फल भी बताया ॥ ११६-११७ ॥ |
| चक्रुस्तेऽन्यानि शास्त्राणि तत्र तत्र रताः पुनः ।<br>शिष्यानध्यापयामासुर्दर्शयित्वा फलानि तु ॥ ११७ ॥ | |
| मोहयन्त इमं लोकमवतीर्य महीतले ।<br>चकार शंकरो भिक्षां हितायैषां द्विजैः सह ॥ ११८ ॥ | शिवने इन (ब्राह्मणों)—के कल्याणके लिये पृथ्वीपर अवतार लेकर लोगोंको मोहित करते हुए ब्राह्मणोंके साथ भिक्षावृत्ति ग्रहण की। कपालोंकी मालाका आभूषण धारणकर, चिता-भस्म लगाकर और जटामण्डलसे मण्डित हो इस लोकको मोहित किया। देवी पार्वतीको अमित तेजस्वी विष्णुके समीप रखा और दुष्टोंका निग्रह करनेके लिये अपने अङ्गसे उत्पन्न रुद्र भैरवको नियुक्त किया। देवीको नारायणके समीप रखकर कुलनन्दन नन्दीको वहाँ रखा तथा इन्द्रादि देवों एवं गणपोंको भी वहाँ स्थापित किया ॥ ११८-१२१ ॥ |
| कपालमालाभरणः प्रेतभस्मावगुण्ठितः ।<br>विमोहयँल्लोकमिमं जटामण्डलमण्डितः ॥ ११९ ॥ | |
| निक्षिप्य पार्वतीं देवीं विष्णावमिततेजसि ।<br>नियोज्याङ्गभवं रुद्रं भैरवं दुष्टनिग्रहे ॥ १२० ॥ | |
| दत्त्वा नारायणे देवीं नन्दिनं कुलनन्दनम् ।<br>संस्थाप्य तत्र गणपान् देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ १२१ ॥ | |
| प्रस्थितेऽथ महादेवे विष्णुर्विश्वतनुः स्वयम् ।<br>स्त्रीरूपधारी नियतं सेवते स्म महेश्वरीम् ॥ १२२ ॥ | महादेवके जानेके पश्चात् विश्वतनु साक्षात् विष्णु स्त्री-रूप धारण करके महेश्वरी पार्वतीकी भलीभाँति सेवा करने लगे ॥ १२२ ॥ |
| * अध्याय १५ * | ११३ |
|---|---|
| ब्रह्मा हुताशनः शक्रो यमोऽन्ये सुरपुङ्गवाः ।<br>सिषेविरे महादेवीं स्त्रीवेशं शोभनं गताः ॥ १२३ ॥<br>नन्दीश्वरश्च भगवान् शम्भोरत्यन्तवल्लभः ।<br>द्वारदेशे गणाध्यक्षो यथापूर्वमतिष्ठत ॥ १२४ ॥<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो ह्यन्धको नाम दुर्मतिः ।<br>आहर्तुकामो गिरिजामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १२५ ॥<br>सम्प्राप्तमन्धकं दृष्ट्वा शंकरः कालभैरवः ।<br>न्यषेधयदमयात्मा कालरूपधरो हरः ॥ १२६ ॥<br>तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ।<br>शूलेनोरसि तं दैत्यमाजघान वृषध्वजः ॥ १२७ ॥ | सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, यम तथा अन्य भी श्रेष्ठ देवता महादेवीकी सेवा करने लगे। शम्भुके अत्यन्त प्रिय गणोंके अध्यक्ष भगवान् नन्दीश्वर पूर्वकी भाँति द्वारपर स्थित रहे। इसी बीच अन्धक नामका एक कुबुद्धि दैत्य गिरिजा पार्वतीको हरनेकी इच्छासे उस मन्दर पर्वतपर आया। अन्धकको वहाँ आया देखकर कालरूपधारी शंकर, अमेयात्मा हर कालभैरवने उसे रोका। उन दोनोंका अत्यन्त भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ—॥ १२३-१२७ ॥ |
| ततः सहस्रशो दैत्यः ससर्जान्धकसञ्ज्ञितान् ।<br>नन्दिषेणादयो दैत्यैरन्धकैरभिनिर्जिताः ॥ १२८ ॥<br>घण्टाकर्णो मेघनादश्चण्डेशश्चण्डतापनः ।<br>विनायको मेघवाहः सोमनन्दी च वैद्युतः ॥ १२९ ॥<br>सर्वेऽन्धकं दैत्यवरं सम्प्राप्यातिबलान्विताः ।<br>युयुधुः शूलशक्त्यृष्टिगिरिकूटपरश्वधैः ॥ १३० ॥<br>भ्रामयित्वाथ हस्ताभ्यां गृहीतचरणद्वयाः ।<br>दैत्येन्द्रेणातिबलिना क्षिप्तास्ते शतयोजनम् ॥ १३१ ॥<br>ततोऽन्धकनिसृष्टास्ते शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>कालसूर्यप्रतीकाशा भैरवं त्वभिदुद्रुवुः ॥ १३२ ॥<br>हा हेति शब्दः सुमहान् बभूवातिभयङ्करः ।<br>युयोध भैरवो रुद्रः शूलमादाय भीषणम् ॥ १३३ ॥ | इसके बाद उस दैत्यने अन्धक नामवाले हजारों दैत्योंको उत्पन्न किया। उन अन्धक नामवाले दैत्योंने नन्दिषेण आदि (गणों)-को पराजित कर दिया। घण्टाकर्ण, मेघनाद, चण्डेश, चण्डतापन, विनायक, मेघवाह, सोमनन्दी तथा वैद्युत आदि ये सभी अत्यन्त बलशाली गण दैत्यश्रेष्ठ अन्धकके पास जाकर शूल, शक्ति, ऋष्टि, पर्वतशिखर तथा परशुद्वारा युद्ध करने लगे। अत्यन्त बलवान् दैत्येन्द्रने अपने हाथोंसे उन सभीके दोनों पैरोंको पकड़कर घुमाते हुए उन्हें सौ योजन दूर फेंक दिया। तदनन्तर अन्धकद्वारा उत्पन्न सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें प्रलयकालीन सूर्यके समान वे (दैत्य) भैरवपर टूट पड़े। अत्यन्त भयंकर हाहाकारका शब्द होने लगा। भैरव रुद्र भीषण शूल लेकर युद्ध करने लगे ॥ १२८-१३३ ॥ |
| दृष्ट्वाऽन्धकानां सुबलं दुर्जयं तर्जितो हरः ।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ १३४ ॥<br>सोऽसृजद् भगवान् विष्णुर्देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>देवीपार्श्वस्थितो देवो विनाशायामरद्विषाम् ॥ १३५ ॥ | अन्धकोंकी सेनाको अजेय देखकर भयभीत हर, विभु, अजन्मा देव वासुदेवकी शरणमें गये। तब देवीके समीपमें स्थित उन देव भगवान् विष्णुने देवताओंके द्वेषियोंका विनाश करनेके लिये श्रेष्ठ सौ देवियोंको उत्पन्न किया ॥ १३४-१३५ ॥ |
| तदान्धकसहस्रं तु देवीभिर्यमसादनम् ।<br>नीतं केशवमाहात्म्याल्लीलयैव रणाजिरे ॥ १३६ ॥<br>दृष्ट्वा पराहतं सैन्यमन्धकोऽपि महासुरः ।<br>पराङ्मुखो रणात् तस्मात् पलायत महाजवः ॥ १३७ ॥ | तदनन्तर विष्णुकी महिमासे उन देवियोंने सैकड़ों अन्धकोंको उस युद्धस्थलमें खेल-खेलमें ही यमलोक भेज दिया। अपनी सेनाकी पराजय देखकर महान् असुर अन्धक भी युद्धसे विमुख होकर अत्यन्त वेगसे भाग चला ॥ १३६-१३७ ॥ |
| ततः क्रीडां महादेवः कृत्वा द्वादशवार्षिकीम् ।<br>हिताय लोके भक्तानामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १३८ ॥ | तदनन्तर संसारमें भक्तोंके कल्याणार्थ बारह वर्षतक चलनेवाली लीलाको समाप्तकर महादेव मन्दराचल पर्वतपर चले आये ॥ १३८ ॥ |
११४ * कूर्मपुराण *
| सम्प्राप्तमीश्वरं ज्ञात्वा सर्व एव गणेश्वराः ।<br>समागम्योपतस्थुस्तं भानुमन्तमिव द्विजाः ॥ १३९ ॥<br><br>प्रविश्य भवनं पुण्यमयुक्तानां दुरासदम् ।<br>ददर्श नन्दिनं देवं भैरवं केशवं शिवः ॥ १४० ॥<br><br>प्रणामप्रवणं देवं सोऽनुगृह्याथ नन्दिनम् ।<br>आघ्राय मूर्ध्नीशानः केशवं परिषस्वजे ॥ १४१ ॥<br><br>दृष्ट्वा देवी महादेवं प्रीतिविस्फारितेक्षणा ।<br>ननाम शिरसा तस्य पादयोरीश्वरस्य सा ॥ १४२ ॥<br><br>निवेद्य विजयं तस्मै शंकरायाथ शंकरी ।<br>भैरवो विष्णुमाहात्म्यं प्रणतः पार्श्वगोऽवदत् ॥ १४३ ॥<br><br>श्रुत्वा तद्विजयं शम्भुर्विक्रमं केशवस्य च ।<br>समास्ते भगवानीशो देव्या सह वरासने ॥ १४४ ॥<br><br>ततो देवगणाः सर्वे मरीचिप्रमुखा द्विजाः ।<br>आजग्मुर्मन्दरं द्रष्टुं देवदेवं त्रिलोचनम् ॥ १४५ ॥<br><br>येन तद् विजितं पूर्वं देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>समागतं दैत्यसैन्यमीशदर्शनवाञ्छया ॥ १४६ ॥<br><br>दृष्ट्वा वरासनासीनं देव्या चन्द्रविभूषणम् ।<br>प्रणेमुरादराद् देव्यो गायन्ति स्मातिलालसाः ॥ १४७ ॥<br><br>प्रणेमुर्गिरिजां देवीं वामपार्श्वे पिनाकिनः ।<br>देवासनगतं देवं नारायणमनामयम् ॥ १४८ ॥<br><br>दृष्ट्वा सिंहासनासीनं देव्या नारायणेन च ।<br>प्रणम्य देवमीशानं पृष्टवत्यो वराङ्गनाः ॥ १४९ ॥<br><br>कन्या ऊचुः<br><br>कस्त्वं विभ्राजसे कान्त्या केयं बालरविप्रभा ।<br>कोऽन्वयं भाति वपुषा पङ्कजायतलोचनः ॥ १५० ॥<br><br>निशम्य तासां वचनं वृषेन्द्रवरवाहनः ।<br>व्याजहार महायोगी भूताधिपतिरव्ययः ॥ १५१ ॥<br><br>अहं नारायणो गौरी जगन्माता सनातनी ।<br>विभज्य संस्थितो देवः स्वात्मानं बहुधेश्वरः ॥ १५२ ॥ | ईश्वरको आया हुआ जानकर सभी गणेश्वर उनके पासमें आकर इस प्रकार स्थित हो गये जैसे द्विज सूर्यकी उपासनामें स्थित रहते हैं। अयोगियोंके लिये दुर्गम पुण्यशाली भवनमें प्रवेशकर शिवने नन्दी, भैरवदेव तथा केशवको देखा॥ १३९-१४०॥<br><br>उन देव शंकरने प्रणाम करनेवाले नन्दीके ऊपर कृपा करके उनका सिर सूंघा और केशवका आलिङ्गन किया। महादेवको देखकर प्रीतिसे विकसित आँखोंवाली उन देवीने उन ईश्वरके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया। तदनन्तर शंकरप्रिया पार्वतीने उन्हें विजयका समाचार कहा और (शंकरके) पार्श्वमें स्थित रहनेवाले भैरवने विनयपूर्वक विष्णुके माहात्म्यको भी (उन्हें) बताया। उस विजय (-के समाचार) तथा केशव विष्णुके पराक्रमको सुनकर शम्भु भगवान् शंकर देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए। तदनन्तर मरीचि आदि प्रमुख द्विज तथा सभी देवगण देवाधिदेव त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये मन्दराचलपर आये॥ १४१-१४५॥<br><br>जिन्होंने दैत्य (अन्धक)-की सेनाको पहले जीता था, वे श्रेष्ठ सौ देवियाँ भी ईशके दर्शनोंकी लालसासे वहाँ आयीं। चन्द्रमारूपी आभूषणसे विभूषित शंकरको देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर (उन) देवियोंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अत्यन्त प्रेमसे वे गान करने लगीं। पिनाकी (शंकर)-के वामभागमें स्थित देवी गिरिजा एवं शंकरके आसनपर उनके साथ विराजमान प्रसन्नचित्त नारायणको (उन देवियोंने) प्रणाम किया। देवी पार्वती और नारायणके साथ सिंहासनपर बैठे हुए देव शंकरको प्रणामकर उन श्रेष्ठ स्त्रियोंने पूछा—॥ १४६-१४९॥<br><br>**कन्याओं (देवियों)-ने कहा—**अपनी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले आप कौन हैं? बाल सूर्यके समान आभावाली यह (बाला) कौन है? और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले एवं अपने शरीरके कारण शोभायमान यह कौन पुरुष है?॥ १५०॥<br><br>उनके वचन सुनकर श्रेष्ठ वृषभपर आरूढ़ होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, महायोगी अव्यय (शिव)-ने कहा—मैं अपनेको नारायण तथा सनातन जगन्माता गौरी आदि अनेक रूपोंमें विभक्तकर स्थित रहनेवाला देव ईश्वर हूँ॥ १५१-१५२॥ |
| * अध्याय १५ * | १९५ |
|---|---|
| न मे विदुः परं तत्त्वं देवाद्या न महर्षयः।<br>एकोऽयं वेद विश्वात्मा भवानी विष्णुरेव च॥ १५३॥<br><br>अहं हि निष्क्रियः शान्तः केवलो निष्परिग्रहः।<br>मामेव केशवं देवमाहुर्देवीमथाम्बिकाम्॥ १५४॥<br><br>एष धाता विधाता च कारणं कार्यमेव च।<br>कर्ता कारयिता विष्णुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ १५५॥<br><br>भोक्ता पुमानप्रमेयः संहर्ता कालरूपधृक्।<br>स्रष्टा पाता वासुदेवो विश्वात्मा विश्वतोमुखः॥ १५६॥<br><br>कूटस्थो ह्यक्षरो व्यापी योगी नारायणः स्वयम्।<br>तारकः पुरुषो ह्यात्मा केवलं परमं पदम्॥ १५७॥<br><br>सैषा माहेश्वरी गौरी मम शक्तिर्निरञ्जना।<br>शान्ता सत्या सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥ १५८॥<br><br>अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति।<br>एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥ १५९॥<br><br>तयाहं संगतो देव्या केवलो निष्कलः परः।<br>पश्याम्यशेषमेवेदं यस्तद् वेद स मुच्यते॥ १६०॥<br><br>तस्मादनादिमद्वैतं विष्णुमात्मानमीश्वरम्।<br>एकमेव विजानीध्वं ततो यास्यथ निर्वृतिम्॥ १६१॥<br><br>मन्यन्ते विष्णुमव्यक्तमात्मानं श्रद्धयान्विताः।<br>ये भिन्नदृष्ट्यापीशानं पूजयन्तो न मे प्रियाः॥ १६२॥<br><br>द्विषन्ति ये जगत्सूतिं मोहिता रौरवादिषु।<br>पच्यमाना न मुच्यन्ते कल्पकोटिशतैरपि॥ १६३॥<br><br>तस्मादशेषभूतानां रक्षको विष्णुरव्ययः।<br>यथावदिह विज्ञाय ध्येयः सर्वापदि प्रभुः॥ १६४॥<br><br>श्रुत्वा भगवतो वाक्यं देव्यः सर्वगणेश्वराः।<br>नेमुर्नारायणं देवं देवीं च हिमशैलजाम्॥ १६५॥<br><br>प्रार्थयामासुरीशाने भक्तिं भक्तजनप्रिये।<br>भवानीपादयुगले नारायणपदाम्बुजे॥ १६६॥<br><br>ततो नारायणं देवं गणेशा मातरोऽपि च।<br>न पश्यन्ति जगत्सूतिं तदद्भुतमिवाभवत्॥ १६७॥ | मेरे परम तत्त्वको न तो देवता आदि जानते हैं और न महर्षि। एकमात्र विश्वात्मा ये विष्णु और भवानी ही (मुझे) जानते हैं। मैं ही निष्क्रिय, शान्त, अद्वितीय और परिग्रहशून्य हूँ। मुझे ही केशव, देव तथा देवी अम्बिका कहा जाता है॥ १५३-१५४॥<br><br>ये विष्णु ही स्वयं धाता, विधाता, कारण, कार्य, कर्ता, कारयिता (कार्यके लिये प्रेरित करनेवाले) और भुक्ति तथा मुक्तिस्वरूप फलको प्रदान करनेवाले हैं। (ये ही) भोक्ता, अप्रमेय पुरुष, संहर्ता, कालका रूप धारण करनेवाले, सृष्टि तथा पालन करनेवाले, विश्वात्मा, सर्वव्यापक, वासुदेव, कूटस्थ, अविनाशी, व्यापी, योगी, नारायण, तारक, पुरुष, आत्मा और अद्वितीय परम पद हैं॥ १५५-१५७॥<br><br>ये माहेश्वरी गौरी मेरी निरञ्जन शक्ति हैं। वेद इन्हें ही शान्त, सत्य, सदानन्द और परम पद बतलाते हैं। इन्हींसे यह सब उत्पन्न हुआ है और इन्हींमें लय भी हो जायगा। ये ही सभी प्राणियोंकी गतियोंमें उत्तम गति हैं॥ १५८-१५९॥<br><br>इन्हीं देवीके साथ अद्वितीय, निष्कल तथा परमस्वरूप मैं इस सम्पूर्ण (विश्व)-का साक्षात्कार करता हूँ। जो इस (तत्त्व)-को जानता है, वह मुक्त हो जाता है। इसलिये अनादि, अद्वैत विष्णु और आत्मस्वरूप ईश्वर (शंकर)-को एक ही समझो। इससे तुम लोगोंको शान्ति प्राप्त होगी। जो श्रद्धासम्पन्न व्यक्ति अव्यक्त एवं आत्मरूप विष्णुको भिन्न मानकर शिवकी पूजा करते हैं, वे मुझे प्रिय नहीं हैं। जो लोग जगत्को उत्पन्न करनेवाले (विष्णु)-से द्वेष रखते हैं (वे सभी) मोहित व्यक्ति रौरव आदि नरकोंमें पड़े रहते हैं और सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी मुक्त नहीं होते। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक अव्यय विष्णुको भलीभाँति समझकर समस्त आपत्तियोंमें उन प्रभुका ध्यान करना चाहिये॥ १६०-१६४॥<br><br>सभी देवियों और गणेश्वरोंने भगवान्के वाक्यको सुनकर नारायण देव तथा हिमालयकी पुत्री देवी (पार्वती)-को प्रणाम किया और भक्तजनोंके प्रिय ईशान भगवान् शंकर तथा भवानीके चरणयुगल एवं नारायणके चरणकमलोंमें भक्तिकी प्रार्थना की। तदनन्तर गणेश्वरों और मातृदेवियोंने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नारायण देवको नहीं देखा यह एक आश्चर्य-जैसा ही हुआ॥ १६५-१६७॥ |
११६ * कूर्मपुराण *
| तदन्तरे महादैत्यो ह्यन्धको मन्मथार्दितः।<br>मोहितो गिरिशां देवीमाहर्तुं गिरिमाययौ ॥ १६८ ॥ | इसी बीच कामदेवके द्वारा पीड़ित महादैत्य अन्धक मोहित होता हुआ देवी गिरिजाको हरण करनेके लिये पर्वतपर आया ॥ १६८ ॥ |
| अथानन्तवपुः श्रीमान् योगी नारायणोऽमलः।<br>तत्रैवाविरभूद् दैत्यैर्युद्धाय पुरुषोत्तमः ॥ १६९ ॥<br>कृत्वाथ पार्श्वे भगवन्तमीशो<br>युद्धाय विष्णुं गणदेवमुख्यैः।<br>शिलादपुत्रेण च मातृकाभिः<br>स कालरुद्रोऽभिजगाम देवः ॥ १७० ॥<br>त्रिशूलमादाय कृशानुकल्पं<br>स देवदेवः प्रययौ पुरस्तात्।<br>तमन्वयुस्ते गणराजवर्या<br>जगाम देवोऽपि सहस्रबाहुः ॥ १७१ ॥<br>रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिद्वर्णवर्णः।<br>तदा सुमेरोः शिखराधिरूढ-<br>स्त्रिलोकदृष्टिर्भगवानिवार्कः ॥ १७२ ॥ | इसके बाद विराट्शरीरधारी, श्रीमान्, योगी, निर्मल नारायण पुरुषोत्तम दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये वहीं प्रकट हो गये। तदनन्तर वे कालरुद्रदेव भगवान् विष्णुको अपने पार्श्वमें करके तथा मुख्य गणदेवों, शिलादपुत्र नन्दी और मातृकाओंको साथ लेकर युद्धके लिये स्वयं गये। अग्निके समान त्रिशूलको लेकर वे देवदेव (शंकर) आगे-आगे चले। उन श्रेष्ठ गणराजों तथा हजार बाहुवाले देव (विष्णु)-ने भी उनका अनुगमन किया। देवताओंके बीचमें उस समय मेघके समान वर्णवाले गरुडवाहन भगवान् विष्णु उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जिस प्रकार सुमेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ तीनों लोकोंके नेत्र-स्वरूप भगवान् सूर्य सुशोभित होते हैं ॥ १६९–१७२ ॥ |
| जगत्यनादिर्भगवानमेयो<br>हरः सहस्राकृतिराविरासीत्।<br>त्रिशूलपाणिर्गगने सुघोषः<br>पपात देवोपरि पुष्पवृष्टिः ॥ १७३ ॥<br>समागतं वीक्ष्य गणेशराजं<br>समावृतं देवरिपुर्गणेशैः।<br>युयोध शक्रेण समातृकाभि-<br>र्गणैरशेषैरमरप्रधानैः ॥ १७४ ॥<br>विजित्य सर्वानपि बाहुवीर्यात्<br>स संयुगे शम्भुमनन्तधाम।<br>समाययौ यत्र स कालरुद्रो<br>विमानमारुह्य विहीन सत्त्वः ॥ १७५ ॥<br>दृष्ट्वान्धकं समायान्तं भगवान् गरुडध्वजः।<br>व्याजहार महादेवं भैरवं भूतिभूषणम् ॥ १७६ ॥ | अनादि, अमेय त्रिशूलपाणि भगवान् हर हजारों स्वरूप धारणकर पृथ्वीपर प्रकट हुए। (उस समय) आकाशमें सुन्दर शब्द होने लगा तथा उन देवके ऊपर (आकाशसे) पुष्पवृष्टि होने लगी। गणेश्वरोंके राजा शिवको गणेश्वरोंद्वारा घिरे हुए आते देखकर देवशत्रु अन्धक, इन्द्र तथा मातृकाओं, गणों और सभी प्रधान-प्रधान देवताओंके साथ युद्ध करने लगा। अपने बाहुबलसे युद्धमें सभीको जीतकर वह सत्त्वविहीन (अन्धक) अनन्त तेजस्वी शम्भुके समीप गया, जहाँ वे कालरुद्र विमानपर बैठे हुए थे। अन्धकको आते हुए देखकर भगवान् गरुडध्वजने विभूतिसे सुशोभित भैरव महादेवसे कहा— ॥ १७३–१७६ ॥ |
| हन्तुमर्हसि दैत्येशमन्धकं लोककण्टकम्।<br>त्वामृते भगवान् शक्तो हन्ता नान्योऽस्य विद्यते ॥ १७७ ॥ | (भगवन्!) आप संसारके कण्टकरूप दैत्यपति अन्धकको मारनेमें समर्थ हैं। आपको छोड़कर इसे मारनेमें और कोई दूसरा समर्थ नहीं है। आप सभी लोकोंका संहार करनेवाले ईश्वरके कालमय शरीर हैं। |
| त्वं हर्ता सर्वलोकानां कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः।<br>स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्वेदविद्भिर्विचक्षणैः ॥ १७८ ॥ | वेदोंको जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा विविध मन्त्रोंसे आपकी स्तुति की जाती है ॥ १७७-१७८ ॥ |
| * अध्याय १५ * | ११० |
|---|
| स वासुदेवस्य वचो निशम्य भगवान् हरः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं हनने दैत्येन्द्रस्य मतिं दधौ॥ १७९॥ | वासुदेवका वचन सुनकर उन भगवान् हरने विष्णुकी ओर देखकर दैत्येन्द्र अन्धकको मारनेका विचार किया, गणोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे देवताओंकी सेनामें गये। (तब) अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले लोग भैरवदेवकी (इस प्रकार) स्तुति करने लगे—॥ १७९-१८०॥ |
| जगाम देवतानीकं गणानां हर्षमुत्तमम्।<br>स्तुवन्ति भैरवं देवमन्तरिक्षचरा जनाः॥ १८०॥<br>जयानन्त महादेव कालमूर्ते सनातन।<br>त्वमग्निः सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यशः॥ १८१॥ | अनन्त ! महादेव ! आप सनातन हैं, कालकी मूर्ति हैं, आपकी जय हो। आप अग्निरूप और सभी प्राणियोंके भीतर सदैव निवास करनेवाले हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही धाता अव्यय हरि हैं। आप ही ब्रह्मा, महादेव और आप ही तेजःस्वरूप परमपद हैं। (आप) प्रणवमूर्ति, योगात्मा, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले त्रिलोचन हैं। आप महाविभूतिस्वरूप, देवताओंके स्वामी हैं। हे सम्पूर्ण संसारके स्वामी ! आपकी जय हो ॥ १८१-१८३॥ |
| त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वं धाता हरिरव्ययः।<br>त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्॥ १८२॥ | |
| ओङ्कारमूर्तिर्योगात्मा त्रयीनेत्रस्त्रिलोचनः।<br>महाविभूतिर्देवेशो जयाशेषजगत्पते॥ १८३॥<br>ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ गृहीत्वान्धकमीश्वरः।<br>त्रिशूलाग्रेषु विन्यस्य प्रननर्त सतां गतिः॥ १८४॥ | तदनन्तर सज्जनोंके आश्रयस्थान एवं प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर वे ईश्वर अन्धक दैत्यको पकड़कर अपने त्रिशूलके अग्रभागमें रखकर नाचने लगे। त्रिशूलपर पिरोये हुए अन्धकको देखकर पितामह ब्रह्मा तथा देवगण, संसारसागरसे मुक्त करनेवाले भैरवदेवको प्रणाम करने लगे ॥ १८४-१८५॥ |
| दृष्ट्वान्धकं देवगणाः शूलप्रोतं पितामहः।<br>प्रणेमुरीश्वरं देवं भैरवं भवमोचकम्॥ १८५॥<br>अस्तुवन् मुनयः सिद्धा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>अन्तरिक्षेऽप्सरःसङ्घा नृत्यन्ति स्म मनोरमाः॥ १८६॥ | मुनि तथा सिद्धजन स्तुति करने लगे और गन्धर्व, किन्नर गान करने लगे तथा अन्तरिक्षमें रमणीय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। तदनन्तर त्रिशूलके अग्रभागमें स्थापित उस अन्धकके सभी पाप दग्ध (नष्ट) हो गये, उसे सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया और वह परमेश्वरकी स्तुति करने लगा— ॥ १८६-१८७॥ |
| संस्थापितोऽथ शूलाग्रे सोऽन्धको दग्धकिल्बिषः।<br>उत्पन्नाखिलविज्ञानस्तुष्टाव परमेश्वरम्॥ १८७॥ | |
| अन्धक उवाच<br>नमामि मूर्ध्ना भगवन्तमेकं<br>समाहिता यं विदुरीशतत्त्वम्।<br>पुरातनं पुण्यमनन्तरूपं<br>कालं कविं योगवियोगहेतुम्॥ १८८॥<br>दंष्ट्राकरालं दिवि नृत्यमानं<br>हुताशवक्त्रं ज्वलनार्करूपम्।<br>सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं<br>भवन्तमेकं प्रणमामि रुद्रम्॥ १८९॥ | **अन्धकने (स्तुति करते हुए) कहा—**समाधिमें स्थित रहनेवाले लोग जिस पुरातन, पुण्यदायी, अनन्त-स्वरूप, कालरूप, कवि तथा संयोग एवं वियोगके कारणरूप ईश्वर-तत्त्वको जानते हैं, मैं उन अद्वितीय भगवान्को सिरसे प्रणाम करता हूँ। भयंकर दाढ़ोंवाले, आकाशमें नृत्य करते हुए, अग्निके समान मुखवाले, प्रज्वलित सूर्यके समान स्वरूपवाले, हजारों पैर, आँख तथा सिरोंसे युक्त आप अद्वितीय रुद्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १८८-१८९॥ |
११८ * कूर्मपुराण *
| जयादिदेवामरपूजिताङ्घ्रे<br>विभागहीनामलतत्त्वरूप ।<br>त्वमग्निरेको बहुधाभिपूज्यसे<br>वाय्वादिभेदैरखिलात्मरूप ॥ १९०॥ | हे आदिदेव! देवताओंके द्वारा आपके चरणोंकी पूजा की जाती है, आप विभागरहित, शुद्ध तत्त्वस्वरूप हैं, आपकी जय हो। अद्वितीय अग्निरूप आप वायु आदि भेदोंसे बहुत प्रकारसे पूजित होते हैं और अखिल आत्मरूप हैं। |
| त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>त्वं पश्यसीदं परिपास्यजस्रं<br>त्वमन्तको योगिगणाभिजुष्टः॥ १९१॥<br><br>एकोऽन्तरात्मा बहुधा निविष्टो<br>देहेषु देहादिविशेषहीनः।<br>त्वमात्मशब्दं परमात्मतत्त्वं<br>भवन्तमाहुः शिवमेव केचित्॥ १९२॥ | सूर्यके समान वर्णवाले पुराणपुरुष! एकमात्र आपको ही तम (मायारूप अन्धकार)-से परे कहा जाता है। आप इस (संसार)-के साक्षी हैं, निरन्तर इसका पालन करते हैं और आप ही संहार करनेवाले हैं। आप योगियोंके समूहोंद्वारा सेवित होते रहते हैं। अद्वितीय, अन्तरात्मारूप आप देह आदि विशेष पदार्थोंसे रहित होते हुए (विभिन्न) देहोंमें अनेक प्रकारसे स्थित रहते हैं। आप आत्मशब्द ('आत्मा' शब्दसे बोध्य) और परमात्मतत्त्व हैं। कुछ लोग आपको ही शिव कहते हैं॥ १९०-१९२॥ |
| त्वमक्षरं ब्रह्म परं पवित्र-<br>मानन्दरूपं प्रणवाभिधानम्।<br>त्वमीश्वरो वेदपदेषु सिद्धः<br>स्वयं प्रभोऽशेषविशेषहीनः॥ १९३॥<br><br>त्वमिन्द्ररूपो वरुणाग्निरूपो<br>हंसः प्राणो मृत्युरन्तोऽसि यज्ञः।<br>प्रजापतिर्भगवानेकरुद्रो<br>नीलग्रीवः स्तूयसे वेदविद्भिः॥ १९४॥<br><br>नारायणस्त्वं जगतामथादिः<br>पितामहस्त्वं प्रपितामहश्च।<br>वेदान्तगुह्योपनिषत्सु गीतः<br>सदाशिवस्त्वं परमेश्वरोऽसि॥ १९५॥ | हे प्रभो! स्वयं आप आनन्दस्वरूप, परम पवित्र, ओंकार शब्दसे वाच्य, अविनाशी, पर ब्रह्म हैं। आप स्वयं वेदवाक्योंमें 'ईश्वर'-शब्दसे सिद्ध हैं और समस्त विशेष पदार्थोंसे शून्य हैं। आप इन्द्र, वरुण, अग्नि, हंस, प्राण, मृत्यु, अन्त एवं यज्ञ हैं। वेदको जाननेवालोंके द्वारा आपके नीलकण्ठ, एकरुद्र, प्रजापति और भगवत्स्वरूपकी स्तुति की जाती है। आप संसारके आदि और नारायण हैं, आप ही पितामह और प्रपितामह हैं। वेदान्तशास्त्र तथा गुह्य उपनिषदोंमें आप ही सदाशिव और परमेश्वर इस नामसे वर्णित हैं॥ १९३-१९५॥ |
| नमः परस्तात् तमसः परस्मै<br>परात्मने पञ्चपदान्तराय।<br>त्रिशक्त्यतीताय निरञ्जनाय<br>सहस्रशक्त्यासनसंस्थिताय ॥ १९६॥ | तमोगुणसे परे, परम परमात्मा, पञ्चपदान्तरस्वरूप, ब्राह्मी, वैष्णवी एवं शाक्त—तीनों शक्तियोंसे अतीत, निरञ्जन और सहस्रशक्तिरूप आसनपर विराजमान रहनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है॥ १९६॥ |
| त्रिमूर्तयेऽनन्तपदात्ममूर्ते<br>जगन्निवासाय जगन्मयाय।<br>नमो ललाटार्पितलोचनाय<br>नमो जनानां हृदि संस्थिताय॥ १९७॥<br><br>फणीन्द्रहाराय नमोऽस्तु तुभ्यं<br>मुनीन्द्रसिद्धाचितपादयुग्म । | ब्रह्मा-विष्णु एवं शिव—इन त्रिमूर्तिरूप, अनन्त पदात्मक, आत्ममूर्ति, जगन्निवास और जगन्मयको नमस्कार है। ललाटमें नेत्र धारण करनेवाले तथा लोगोंके हृदयमें स्थित आपको नमस्कार है। मुनीन्द्रों तथा सिद्धोंद्वारा जिनके चरणकमलोंकी पूजा की जाती है, ऐसे नागराजोंकी माला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ १९७½ ॥ |
- अध्याय १५ * | १९१ ---|---
| ऐश्वर्यधर्मासनसंस्थिताय<br> नमः परान्ताय भवोद्भवाय ॥ १९८ ॥<br>सहस्रचन्द्रार्कविलोचनाय<br> नमोऽस्तु ते सोम सुमध्यमाय ।<br>नमोऽस्तु ते देव हिरण्यबाहो<br> नमोऽम्बिकायाः पतये मृडाय ॥ १९९ ॥<br>नमोऽतिगुह्याय गुहान्तराय<br> वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताय ।<br>त्रिकालहीनामलधामधाम्ने<br> नमो महेशाय नमः शिवाय ॥ २०० ॥ | ऐश्वर्यमय धर्मके आसनपर विराजमान रहनेवाले, परमोत्कृष्ट एवं संसारको उत्पन्न करनेवाले आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रमा और सूर्योंके समान नेत्रवाले तथा सुन्दर मध्यभागवाले सोमस्वरूप आपको नमस्कार है। हिरण्यबाहो ! देव ! आपको नमस्कार है। अम्बिकाके पति मृड ! आपको नमस्कार है। अत्यन्त गुह्य, गुहान्तर, वेदान्तरूपी विज्ञानके द्वारा निश्चित किये गये तीनों कालोंके प्रभावसे रहित, शुद्ध तेजोमय स्थानवाले महेशको नमस्कार है, शिवको नमस्कार है॥ १९८–२००॥ |
| एवं स्तुवन्तं भगवान् शूलाग्रादवरोप्य तम् ।<br>तुष्टः प्रोवाच हस्ताभ्यां स्पृष्ट्वाथ परमेश्वरः ॥ २०१ ॥<br><br>प्रीतोऽहं सर्वथा दैत्य स्तवेनानेन साम्प्रतम् ।<br>सम्प्राप्य गाणपत्यं मे संनिधाने वसामरः ॥ २०२ ॥<br><br>अरोगश्छिन्नसंदेहो देवैरपि सुपूजितः ।<br>नन्दीश्वरस्यानुचरः सर्वदुःखविवर्जितः ॥ २०३ ॥ | इस प्रकार स्तुति कर रहे उस (अन्धक)-को प्रसन्न होकर भगवान् परमेश्वरने त्रिशूलके अग्रभागसे उतारा और हाथोंसे स्पर्श करते हुए कहा—दैत्य! इस समय तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम गणपति-पद प्राप्तकर अमर होकर मेरे समीपमें निवास करो। तुम रोगोंसे रहित, संदेहशून्य, सभी दुःखोंसे रहित और नन्दीश्वरके अनुचर होकर देवताओंके द्वारा भलीभाँति पूजित होओगे॥ २०१–२०३ ॥ |
| एवं व्याहृतमात्रे तु देवदेवेन देवताः ।<br>गणेश्वरा महादेवमन्धकं देवसंनिधौ ॥ २०४ ॥<br><br>सहस्रसूर्यसंकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रचिह्नितम् ।<br>नीलकण्ठं जटामौलिं शूलासक्तमहाकरम् ॥ २०५ ॥<br><br>दृष्ट्वा तं तुष्टुवुर्दैत्यमाश्चर्यं परमं गताः ।<br>उवाच भगवान् विष्णुर्देवदेवं स्मयन्निव ॥ २०६ ॥ | देवताओंके भी देव (शंकर)-के इतना कहते ही हजारों सूर्यके समान प्रकाशमान, त्रिनेत्रधारी, चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित, नीलकण्ठ, जटा-मुकुटधारी, विशाल भुजामें त्रिशूल धारण किये तथा महादेवरूपमें विद्यमान उस अन्धक दैत्यको देव शंकरके समीपमें स्थित देखकर देवता तथा गणेश्वर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये और उसकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने हँसते हुए देवाधिदेव शिवसे कहा— ॥ २०४–२०६ ॥ |
| स्थाने तव महादेव प्रभावः पुरुषो महान् ।<br>नेक्षतेऽज्ञानजान् दोषान् गृह्णाति च गुणानपि ॥ २०७॥ | महादेव ! आपने उचित ही प्रभाव दिखलाया। महान् पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न दोषोंको नहीं देखते और गुणोंको ही ग्रहण करते हैं। |
| इतीरितोऽथ भैरवो गणेशदेवपुङ्गवैः ।<br>सकेशवः सहानुधको जगाम शंकरान्तिकम् ॥ २०८ ॥<br>निरीक्ष्य देवमागतं स शंकरः सहानुधकम् ।<br>समाधवं समातृकं जगाम निर्वृतिं हरः ॥ २०९ ॥<br>प्रगृह्य पाणिनेश्वरो हिरण्यलोचनात्मजम् ।<br>जगाम यत्र शैलजा विमानमीशवल्लभा ॥ २१० ॥ | इतना कहे जानेके बाद गणेश्वरों, श्रेष्ठ देवों, केशव तथा अन्धकके साथ भैरव शंकरके पास गये। अन्धक, विष्णु तथा मातृकाओंके साथ देव (भैरव)-को आया देखकर उन कल्याणकारी हरको परम शान्ति प्राप्त हुई। हिरण्याक्षके पुत्र (अन्धक)-का हाथ पकड़कर ईश्वर (शंकर) वहाँ गये, जहाँ शंकरप्रिया पार्वती विमानपर बैठी हुई थीं ॥ २०७–२१० ॥ |
१२० * कूर्मपुराण *
विलोक्य सा समागतं भवं भवार्तिहारिणम्।
अवाप सान्धकं सुखं प्रसादमन्धकं प्रति ॥ २११ ॥
अथान्धको महेश्वरीं ददर्श देवपार्श्वगाम्।
पपात दण्डवत् क्षितौ ननाम पादपद्मयोः ॥ २१२ ॥
संसारके दुःखोंका हरण करनेवाले भव (शंकर)-को अन्धकके साथ आया देखकर उन्हें सुख प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अन्धकपर कृपा की। अन्धक शंकरके पार्श्वभागमें स्थित महेश्वरीको देखा। वह पृथ्वीपर दण्डके समान गिर गया और देवीके चरणकमलोंमें प्रणाम किया॥ २११-२१२॥
नमामि देववल्लभामनादिमद्रिजामिमाम्।
यतः प्रधानपूरुषौ निहन्ति याखिलं जगत् ॥ २१३ ॥
विभाति या शिवासने शिवेन साकमव्यया।
हिरण्मयेऽतिनिर्मले नमामि तामिमामजाम् ॥ २१४ ॥
यदन्तराखिलं जगज्जगन्ति यान्ति संक्षयम्।
नमामि यत्र तामुमामशेषभेदवर्जिताम् ॥ २१५ ॥
न जायते न हीयते न वर्धते च तामुमाम्।
नमामि या गुणातिगा गिरीशपुत्रिकामिमाम् ॥ २१६ ॥
क्षमस्व देवि शैलजे कृतं मया विमोहतः।
सुरासुरैर्यदर्चितं नमामि ते पदाम्बुजम् ॥ २१७ ॥
जिनसे प्रधान (प्रकृति) और पुरुष उत्पन्न हुए हैं और जो सम्पूर्ण विश्वका संहार करनेवाली हैं, उन अनादि शंकरप्रिया अद्रितनया (पर्वतपुत्री)-को मैं प्रणाम करता हूँ। जो अति निर्मल, हिरण्मय, मंगलकारी आसनपर भगवान् शिवके साथ सुशोभित होती हैं, उन अव्यय और अजन्माको मैं नमस्कार करता हूँ। सभी भेदोंसे रहित उन उमाको मैं प्रणाम करता हूँ, जिनके भीतर सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है और विनाशको प्राप्त होता रहता है। जो न उत्पन्न होती हैं, न विनाशको प्राप्त होती हैं और न बढ़ती ही हैं, उन गुणातीत हिमालयकी पुत्री उमाको मैं नमस्कार करता हूँ। देवि! शैलपुत्रि! मैंने मोहित होकर जो किया उसके लिये आप मुझे क्षमा करें। देवताओं तथा असुरोंसे पूजित आपके चरणकमलोंको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २१३-२१७॥
इत्थं भगवती गौरी भक्तिनम्रेण पार्वती।
संस्तुता दैत्यपतिना पुत्रत्वे जगृहेऽन्धकम् ॥ २१८ ॥
भक्तिसे विनम्र हुए दैत्यपतिके इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवती गौरी पार्वती ने उस अन्धकको पुत्ररूपमें स्वीकार किया॥ २१८॥
ततः स मातृभिः सार्धं भैरवो रुद्रसम्भवः।
जगामानुज्ञया शम्भोः पातालं परमेश्वरः ॥ २१९ ॥
यत्र सा तामसी विष्णोर्मूर्तिः संहारकारिका।
समास्ते हरिरव्यक्तो नृसिंहाकृतिरीश्वरः ॥ २२० ॥
ततोऽनन्ताकृतिः शम्भुः शेषेणापि सुपूजितः।
कालाग्निरुद्रो भगवान् युयोजात्मानमात्मनि ॥ २२१ ॥
युञ्जतस्तस्य देवस्य सर्वा एवाथ मातरः।
बुभुक्षिता महादेवं प्रणम्याहुस्त्रिशूलिनम् ॥ २२२ ॥
तदनन्तर रुद्रसे उत्पन्न परमेश्वर भैरव शम्भुकी आज्ञासे मातृकाओंके साथ पाताल गये। जहाँ विष्णुकी संहारकारिणी तामसी मूर्तिके रूपमें नृसिंहाकृति ईश्वर अव्यक्त हरि स्थित हैं। तदनन्तर शेषसे भी पूजित कालाग्नि रुद्र अनन्ताकृति भगवान् शम्भुने स्वयंको परमात्मतत्त्वसे संयुक्त कर दिया। उन देवके (परमात्मासे) संयोग करते समय सभी बुभुक्षित मातृकाओंने त्रिशूलधारी महादेवको प्रणामकर कहा— ॥ २१९-२२२॥
मातर ऊचुः
बुभुक्षिता महादेव अनुज्ञा दीयतां त्वया।
त्रैलोक्यं भक्षयिष्यामो नान्यथा तृप्तिरस्ति नः ॥ २२३ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं मातरो विष्णुसम्भवाः।
भक्षयाञ्चक्रिरे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २२४ ॥
मातृकाओंने कहा— महादेव! हम भूखी हैं। आप आज्ञा दें, हम तीनों लोकोंका भक्षण करेंगी, हमारी और किसी प्रकारसे तृप्ति नहीं होगी। इतनी बात कहकर विष्णुसे उत्पन्न वे मातृकाएँ चराचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीका भक्षण करने लगीं॥ २२३-२२४॥
ततः स भैरवो देवो नृसिंहवपुषं हरिम्।
दध्यौ नारायणं देवं क्षणात् प्रादुरभूद्धरिः ॥ २२५ ॥
तब उन भैरवदेवने नृसिंह-शरीरधारी नारायण-देव हरिका ध्यान किया। हरि क्षणभरमें ही प्रकट हो गये॥ २२५॥
- अध्याय १५ * | १२१ ---|---
विज्ञापयामास च तं भक्षयन्तीह मातरः।
निवारयाशु त्रैलोक्यं त्वदीया भगवन्निति ॥ २२६ ॥
संस्मृता विष्णुना देव्यो नृसिंहवपुषा पुनः।
उपस्थुर्महादेवं नरसिंहाकृतिं च तम् ॥ २२७ ॥
सम्प्राप्य संनिधिं विष्णोः सर्वाः संहारकारिकाः।
प्रददुः शम्भवे शक्तिं भैरवायातितेजसे ॥ २२८ ॥
अपश्यंस्ता जगत्सूतिं नृसिंहमथ भैरवम्।
क्षणादेकत्वमापन्नं शेषाहिं चापि मातरः ॥ २२९ ॥
व्याजहार हृषीकेशो ये भक्ताः शूलपाणिनः।
ये च मां संस्मरन्तीह पालनीयाः प्रयत्नतः ॥ २३० ॥
ममैव मूर्तिरतुला सर्वसंहारकारिका।
महेश्वरांशसम्भूता भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वियम् ॥ २३१ ॥
अनन्तो भगवान् कालो द्विधावस्था ममैव तु।
तामसी राजसी मूर्तिर्देवदेवश्चतुर्मुखः ॥ २३२ ॥
सोऽयं देवो दुराधर्षः कालो लोकप्रकालनः।
भक्षयिष्यति कल्पान्ते रुद्रात्मा निखिलं जगत् ॥ २३३ ॥
या सा विमोहिका मूर्तिर्मम नारायणाह्वया।
सत्त्वोद्रिक्ता जगत् कृत्स्नं संस्थापयति नित्यदा ॥ २३४ ॥
स हि विष्णुः परं ब्रह्म परमात्मा परा गतिः।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सदानन्देति कथ्यते ॥ २३५ ॥
इत्येवं बोधिता देव्यो विष्णुना विश्वमातरः।
प्रपेदिरे महादेवं तमेव शरणं हरिम् ॥ २३६ ॥
एतद्वः कथितं सर्वं मयान्धकनिबर्हणम्।
माहात्म्यं देवदेवस्य भैरवस्यामितौजसः ॥ २३७ ॥
| (भैरवदेवने) उन्हें बतलाते हुए कहा—भगवन्! आपकी ये मातृकाएँ त्रिलोकीका भक्षण कर रही हैं, इन्हें आप शीघ्र ही रोकें॥ २२६॥
| नरसिंह-शरीरधारी विष्णुके द्वारा पुनः उन देवियोंका स्मरण किये जानेपर वे उन नरसंहरूपवाले महादेवके पास आ पहुँचीं। संहार करनेवाली उन सभी शक्तियोंने विष्णुके समीप आकर भैरवरूपधारी अति तेजस्वी शम्भुको शक्ति प्रदान कर दी॥ २२७-२२८॥
| उन मातृकाओँने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नृसिंह, भैरव तथा शेषनागको क्षणभरमें ही एक होते हुए देखा। हृषीकेशने कहा—शूलपाणि भगवान् शंकरके जो भक्त हैं और जो मेरा स्मरण करते हैं, प्रयत्न-पूर्वक उनका यहाँ पालन करना चाहिये। महेश्वरके अंशसे उत्पन्न, सबका संहार करनेवाली यह मेरी ही अतुलनीय मूर्ति है। यह भुक्ति और मुक्तिको प्रदान करनेवाली है॥ २२९—२३१॥
| भगवान् अनन्त और काल मेरी ही दो प्रकारकी तामसी अवस्थाएँ हैं। देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्मा मेरी राजसी मूर्ति हैं। वे ही ये संसारका संहार करनेवाले दुर्धर्ष कालदेव हैं। कल्पका अन्त होनेपर ये रुद्रात्मा सम्पूर्ण विश्वका भक्षण करेंगे। सबको मोहित करनेवाली सत्त्वगुणसम्पन्ना मेरी 'नारायण' इस नामवाली जो मूर्ति है, वह नित्य समस्त संसारकी स्थापना करती है। (मेरी) उस (मूर्ति)-को विष्णु, परम ब्रह्म, परमात्मा, परमगति, मूलप्रकृति, अव्यक्त और सदानन्द—इस प्रकारसे कहा जाता है। विष्णुके द्वारा इस प्रकार समझानेपर देवीरूप उन सभी मातृकाओँने उन्हीं महादेव हरिकी शरण ग्रहण की॥ २३२—२३६॥
| मैंने आप लोगोंसे अन्धकके विनाश और अमित ओजस्वी देवाधिदेव भैरवके माहात्म्यका सम्पूर्ण वर्णन किया॥ २३७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १५॥
१२२ * कूर्मपुराण *
सोलहवाँ अध्याय
सनत्कुमारद्वारा आत्मज्ञान प्राप्तकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचनका योगमें संलग्न होना, विरोचन-पुत्र बलिद्वारा देवताओंको पराजित करना, देवमाता अदितिका दुःखी होना तथा विष्णुसे प्रार्थनाकर पुत्ररूपमें उनके उत्पन्न होनेका वर प्राप्त करना, अदितिके गर्भमें विष्णुका प्रवेश, विष्णुका वामनरूपमें आविर्भाव, बलिके यज्ञमें वामनका प्रवेश तथा तीन पग भूमिकी याचना, तीसरे पगसे नापते समय ब्रह्माण्ड-भेदन, गङ्गाकी उत्पत्ति तथा भक्तिका वर प्राप्तकर बलि आदिका पातालमें प्रवेश
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— प्राचीन कालमें अन्धकके निगृहीत हो जानेपर महात्मा प्रह्लादका विरोचन नामका पुत्र राजा बना। उस महान् असुरने देवेन्द्रसहित देवताओंको जीतकर धर्मपूर्वक चराचर त्रिलोकीका बहुत वर्षोंतक पालन किया। उसके इस प्रकार रहते हुए एक बार कभी विष्णुसे प्रेरित होकर महामुनि भगवान् सनत्कुमार उसके नगरमें आये। सिंहासनपर बैठे हुए उस महान् असुरने ब्रह्माजीके पुत्र (सनत्कुमार)-को देखकर (आसनसे) उठकर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर यह वाक्य कहा—॥ १-४ ॥ |
|---|---|
| अन्धके निगृहीते वै प्रह्लादस्य महात्मनः।<br>विरोचनो नाम सुतो बभूव नृपतिः पुरा॥ १ ॥<br>देवाञ्जित्वा सदेवेन्द्रान् बहून् वर्षान् महासुरः।<br>पालयामास धर्मेण त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ २ ॥<br>तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचिद् विष्णुचोदितः।<br>सनत्कुमारो भगवान् पुरं प्राप महामुनिः॥ ३ ॥<br>दृष्ट्वा सिंहासनगतो ब्रह्मपुत्रं महासुरः।<br>ननामोत्थाय शिरसा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ४ ॥ | |
| धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सम्प्राप्तो मे पुरातनः।<br>योगीश्वरोऽद्य भगवान् यतोऽसौ ब्रह्मवित् स्वयम्॥ ५ ॥ | आज मैं धन्य हुआ, कृतार्थ हुआ जो ये ब्रह्मज्ञानी, पुरातन योगीश्वर भगवान् स्वयं यहाँ आ गये हैं। हे ब्रह्मन्! देवस्वरूप पितामह ब्रह्माजीके पुत्र! आप किस प्रयोजनसे यहाँ आये हैं, मुझे बतलायें। मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ॥ ५-६ ॥ |
| किमर्थमागतो ब्रह्मन् स्वयं देवः पितामहः।<br>ब्रूहि मे ब्रह्मणः पुत्र किं कार्यं करवाण्यहम्॥ ६ ॥ | |
| सोऽब्रवीद् भगवान् देवो धर्मयुक्तं महासुरम्।<br>द्रष्टुमभ्यागतोऽहं वै भवन्तं भाग्यवानसि॥ ७ ॥ | वे भगवान् देव धर्मात्मा महासुर (विरोचन)-से बोले—मैं आपको ही देखने आया हूँ, आप भाग्यशाली हैं। दैत्यश्रेष्ठ! दैत्योंके लिये यह (धार्मिक) नीति अत्यन्त दुर्लभ है। निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान कोई दूसरा धार्मिक नहीं है। ऐसा कहे जानेपर असुरराज (विरोचन)-ने उन महामुनिसे पुनः कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वश्रेष्ठ! आप मुझे धर्मोंमें जो श्रेष्ठ धर्म हो, उसे बतलायें। उन भगवान् योगीने महात्मा दैत्येन्द्रको आत्मज्ञानरूपी और सब प्रकारसे अत्यन्त रहस्यमय श्रेष्ठ धर्म बतलाया॥ ७—१० ॥ |
| सुदुर्लभा नीतिरेषा दैत्यानां दैत्यसत्तम।<br>त्रिलोके धार्मिको नूनं त्वादृशोऽन्यो न विद्यते॥ ८ ॥ | |
| इत्युक्तोऽसुरराजस्तं पुनः प्राह महामुनिम्।<br>धर्माणं परमं धर्मं ब्रूहि मे ब्रह्मवित्तम॥ ९ ॥ | |
| सोऽब्रवीद् भगवान् योगी दैत्येन्द्राय महात्मने।<br>सर्वगुह्यतमं धर्ममात्मज्ञानमनुत्तमम्॥ १०॥ | |
| स लब्ध्वा परमं ज्ञानं दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>निधाय पुत्रे तद्राज्यं योगाभ्यासरतोऽभवत्॥ ११॥ | उन्होंने (महात्मा विरोचनने) परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हें (सनत्कुमारको) गुरुदक्षिणा प्रदान की तथा राज्य अपने पुत्र (बलि)-को सौंपकर वे योगाभ्यासमें निरत हो गये॥ ११॥ |
| * अध्याय १६ * | १२३ |
|---|
| स तस्य पुत्रो मतिमान् बलिर्नाम महासुरः।<br>ब्रह्मण्यो धार्मिकोऽत्यर्थं विजिग्येऽथ पुरंदरम् ॥ १२ ॥<br><br>कृत्वा तेन महद् युद्धं शक्रः सर्व्वामरैर्वृतः।<br>जगाम निर्जितो विष्णुं देवं शरणमच्युतम् ॥ १३ ॥<br><br>तदन्तरेऽदितिर्देवी देवमाता सुदुःखिता।<br>दैत्येन्द्राणां वधार्थाय पुत्रो मे स्यादिति स्वयम् ॥ १४ ॥<br><br>तताप सुमहद् घोरं तपोराशिस्तपः परम्।<br>प्रपन्ना विष्णुमव्यक्तं शरण्यं शरणं हरिम् ॥ १५ ॥<br><br>कृत्वा हृत्पद्मकिञ्जल्के निष्कलं परमं पदम्।<br>वासुदेवमनाद्यन्तमानन्दं व्योम केवलम् ॥ १६ ॥<br><br>प्रसन्नो भगवान् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>आविर्बभूव योगात्मा देवमातुः पुरो हरिः ॥ १७ ॥<br><br>दृष्ट्वा समागतं विष्णुमदितिर्भक्तिसंयुता।<br>मेने कृतार्थमात्मानं तोषयामास केशवम् ॥ १८ ॥ | उनका वह बलि नामक महान् असुर पुत्र बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा अत्यन्त धार्मिक था। महान् अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये उसने इन्द्रको भी जीत लिया था। सभी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उसके साथ महान् युद्ध करते हुए पराजित होकर अच्युत विष्णुदेवकी शरण ग्रहण की ॥ १२-१३ ॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त दुःखी होकर देवताओंकी माता तपोराशि, परम तपोरूप देवी अदितिने दैत्येन्द्रोंके वधके लिये 'स्वयं भगवान् ही मेरे पुत्र हों' इस संकल्पको लेकर अत्यन्त महान् कठोर तप किया। अपने हृदयरूपी कमलकलिकामें निष्कल, परम पद, अनादि, अनन्त, आनन्दस्वरूप, व्योममय, अद्वितीय वासुदेवका ध्यान करती हुई वे शरणागतवत्सल अव्यक्त, हरि विष्णुकी शरणमें गयीं। प्रसन्न होकर शङ्ख-चक्र तथा गदा धारण करनेवाले योगात्मा हरि भगवान् विष्णु देवमाता (अदिति)-के समक्ष प्रकट हो गये। विष्णुको सामने देखकर भक्तिपरायणा अदितिने अपनेको कृतार्थ माना और वे केशवको स्तुतिसे प्रसन्न करने लगीं ॥ १४-१८ ॥ |
| अदितिरुवाच | अदितिने कहा— समस्त दुःखसमूहोंके नाश करनेके लिये एकमात्र कारणरूप आपकी जय हो। अनन्त माहात्म्य-सम्पन्न तथा योगाभियुक्त ! (योगमें प्रतिक्षण निरत) आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तसे रहित विज्ञानमूर्ते ! आपकी जय हो। अशेषकल्प (जिनमें किसी भी प्रकारके विषयका विराम नहीं है) तथा विशुद्ध आनन्दस्वरूप ! आपकी जय हो। कालस्वरूप विष्णु ! आपको नमस्कार है। नरसिंहरूपधारी शेष ! आपको नमस्कार है। संहार करनेवाले कालरुद्रको नमस्कार है। वासुदेव ! आपको बार-बार नमस्कार है। विश्वरूपी मायाका विधान करनेवाले ! आपको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्य सत्यरूप ! आपको नमस्कार है। धर्म एवं ज्ञाननिष्ठ ! आपको नमस्कार है। हे वराहरूप ! आपको बार-बार नमस्कार है। हजारों सूर्य और चन्द्रमाकी आभाके समान प्रकाशयुक्त मूर्तिवाले ! आपको नमस्कार है। वेदोंमें प्रतिपादित विशिष्ट ज्ञान और धर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले ! आपको नमस्कार है। देवदेवादिदेव आदिदेव ! आपको नमस्कार है। प्रभो ! आप विश्वके योनिरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ १९-२२ ॥ |
| जयाशेषदुःखौघनाशैकहेतो<br> जयानन्तमाहात्म्ययोगाभियुक्त ।<br>जयानादिमध्यान्तविज्ञानमूर्ते<br> जयाशेषकल्पामलानन्दरूप ॥ १९ ॥<br><br>नमो विष्णवे कालरूपाय तुभ्यं<br> नमो नारसिंहाय शेषाय तुभ्यम्।<br>नमः कालरुद्राय संहारकर्त्रे<br> नमो वासुदेवाय तुभ्यं नमस्ते ॥ २० ॥<br><br>नमो विश्वमायाविधानाय तुभ्यं<br> नमो योगगम्याय सत्याय तुभ्यम्।<br>नमो धर्मविज्ञाननिष्ठाय तुभ्यं<br> नमस्ते वराहाय भूयो नमस्ते ॥ २१ ॥<br><br>नमस्ते सहस्रार्कचन्द्राभमूर्ते<br> नमो वेदविज्ञानधर्माभिगम्य।<br>नमो देवदेवादिदेवादिदेव<br> प्रभो विश्वयोनेऽथ भूयो नमस्ते ॥ २२ ॥ |
१२४ * कूर्मपुराण *
| नमः शम्भवे सत्यनिष्ठाय तुभ्यं<br>नमो हेतवे विश्वरूपाय तुभ्यम्।<br>नमो योगपीठान्तरस्थाय तुभ्यं<br>शिवायैकरूपाय भूयो नमस्ते ॥ २३ ॥ | सत्यनिष्ठ शम्भो ! आपको नमस्कार है। कारणरूप ! विश्वरूप ! आपको नमस्कार है। योगपीठके मध्यमें विराजमान रहनेवाले ! आपको नमस्कार है। हे एकरूप शिव ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २३ ॥ | | एवं स भगवान् कृष्णो देवमात्रा जगन्मयः।<br>तोषिताश्छन्दयामास वरेण प्रहसन्निव ॥ २४ ॥ | देवमाता (अदिति)-के द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर जगन्मय उन भगवान् कृष्ण-(विष्णु)-ने किंचित् हँसते हुए वर माँगनेके लिये कहा ॥ २४ ॥ | | प्रणम्य शिरसा भूमौ सा वव्रे वरमुत्तमम्।<br>त्वामेव पुत्रं देवानां हिताय वरये वरम् ॥ २५ ॥ | सिरसे भूमिमें प्रणाम करते हुए तथा श्रेष्ठ वर माँगते हुए उसने (अदितिने) कहा—मैं देवताओंके कल्याणके लिये आपको ही पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगती हूँ। शरणागतवत्सल अप्रमेय भगवान् 'ऐसा ही हो' इतना कहकर तथा वरोंको प्रदानकर वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ २५-२६ ॥ | | तथास्त्वित्याह भगवान् प्रपन्नजनवत्सलः।<br>दत्त्वा वरानप्रमेयस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥<br>ततो बहुतिथे काले भगवन्तं जनार्दनम्।<br>दधार गर्भं देवानां माता नारायणं स्वयम् ॥ २७ ॥<br>समाविष्टे हृषीकेशे देवमातुरथोदरम्।<br>उत्पाता जज्ञिरे घोरा बलेर्वैरोचनेः पुरे ॥ २८ ॥<br>निरीक्ष्य सर्वानुत्पातान् दैत्येन्द्रो भयविह्वलः।<br>प्रह्रादमसुरं वृद्धं प्रणम्याह पितामहम् ॥ २९ ॥ | तदनन्तर बहुत समय बीतनेके पश्चात् देवताओंकी माता (अदिति)-ने साक्षात् नारायण भगवान् जनार्दनको गर्भमें धारण किया। देवमाताके उदरमें हृषीकेशके प्रविष्ट होते ही विरोचनपुत्र बलिके नगरमें भयंकर उत्पात होने लगे। सभी उपद्रवोंको देखकर भयसे विह्वल हुआ दैत्यराज (बलि) वृद्ध पितामह असुर प्रह्लादको प्रणामकर कहने लगा— ॥ २७–२९ ॥ | | बलिरुवाच<br>पितामह महाप्राज्ञ जायन्तेऽस्मत्पुरेऽधुना।<br>किमुत्पाता भवेत् कार्यमस्माकं किंनिमित्तकाः ॥ ३० ॥<br>निशम्य तस्य वचनं चिरं ध्यात्वा महासुरः।<br>नमस्कृत्य हृषीकेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३१ ॥ | बलिने कहा—महाप्राज्ञ पितामह ! हमारे नगरमें इस समय ये उत्पात क्यों हो रहे हैं, इनका कारण क्या है? हमें क्या करना चाहिये ? उसकी बात सुनकर महासुर (प्रह्लाद)-ने देरतक ध्यान किया और फिर हृषीकेशको नमस्कार करके यह वचन कहा— ॥ ३०-३१ ॥ | | प्रह्राद उवाच<br>यो यज्ञैरिज्यते विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत्।<br>दधारासुरनाशार्थं माता तं त्रिदिवौकसाम् ॥ ३२ ॥<br>यस्मादभिन्नं सकलं भिद्यते योऽखिलादपि।<br>स वासुदेवो देवानां मातृदेहं समाविशत् ॥ ३३ ॥<br>न यस्य देवा जानन्ति स्वरूपं परमार्थतः।<br>स विष्णुरदितेर्देहं स्वेच्छयाऽद्य समाविशत् ॥ ३४ ॥ | प्रह्लाद बोले—यज्ञोंद्वारा जिन विष्णुका यजन किया जाता है और यह सम्पूर्ण विश्व जिनका (स्वरूप) है, देवताओंकी माता (अदिति)-ने उन्हें ही असुरोंके विनाशके लिये (गर्भमें) धारण किया है। समस्त विश्व जिनसे अभिन्न है और जो समस्त विश्वसे भिन्न भी है, उन वासुदेवने देवताओंकी माताके शरीरमें प्रवेश किया है। देवता भी जिनके स्वरूपको यथार्थतः नहीं जानते वे विष्णु ही इस समय अपनी इच्छासे अदितिके देहमें प्रविष्ट हुए हैं ॥ ३२–३४ ॥ | | यस्माद् भवन्ति भूतानि यत्र संयान्ति संक्षयम्।<br>सोऽवतीर्णो महायोगी पुराणपुरुषो हरिः ॥ ३५ ॥ | जिनसे सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और जहाँ नाशको प्राप्त होते हैं वे महायोगी पुराणपुरुष हरि अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३५ ॥ |
- अध्याय १६ * । १२५
| न यत्र विद्यते नामजात्यादिपरिकल्पना।<br>सत्तामात्रात्मरूपोऽसौ विष्णुरंशेन जायते॥ ३६॥<br><br>यस्य सा जगतां माता शक्तिस्तद्धर्मधारिणी।<br>माया भगवती लक्ष्मीः सोऽवतीर्णो जनार्दनः॥ ३७॥<br><br>यस्य सा तामसी मूर्तिः शंकरो राजसी तनुः।<br>ब्रह्मा संजायते विष्णुरंशेनैकेन सत्त्वभृत्॥ ३८॥ | जिनमें नाम, जाति आदिकी परिकल्पना नहीं होती, सत्तामात्रसे व्याप्त रहनेवाले आत्मरूप वे ही विष्णु अपने अंशरूपसे प्रकट हो रहे हैं। जगत्की मातृरूपा और उसके (जगत्के) धर्मको धारण करनेवाली, भगवती लक्ष्मी जिनकी मायारूपी शक्ति हैं, वे जनार्दन ही अवतीर्ण हुए हैं। जिनकी तामसी मूर्ति शंकर हैं और राजसी मूर्ति ब्रह्मा हैं वे सत्त्वगुणको धारण करनेवाले विष्णु ही अपने एक अंशसे प्रकट हो रहे हैं॥ ३६-३८॥ |
| इत्थं विचिन्त्य गोविन्दं भक्तिनम्रेण चेतसा।<br>तमेव गच्छ शरणं ततो यास्यसि निर्वृतिम्॥ ३९॥<br><br>ततः प्रह्लादवचनाद् बलिवैरोचनिर्हरिम्।<br>जगाम शरणं विश्वं पालयामास धर्मतः॥ ४०॥ | गोविन्दको इस प्रकार समझकर भक्तिसे विनम्र-चित्त हो उन्हींकी शरणमें जाओ, इससे तुम शान्ति प्राप्त करोगे। तब प्रह्लादके वचनसे विरोचनपुत्र बलि हरिकी शरण ग्रहण करता हुआ धर्मपूर्वक विश्वका पालन करने लगा॥ ३९-४०॥ |
| काले प्राप्ते महाविष्णुं देवानां हर्षवर्धनम्।<br>असूत कश्यपाच्चैनं देवमातादितिः स्वयम्॥ ४१॥<br><br>चतुर्भुजं विशालाक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्।<br>नीलमेघप्रतीकाशं भ्राजमानं श्रियावृतम्॥ ४२॥<br><br>उपतस्थुः सुराः सर्वे सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>उपेन्द्रमिन्द्रप्रमुखा ब्रह्मा चर्षिगणैर्वृतः॥ ४३॥<br><br>कृतोपनयनो वेदानध्यैष्ट भगवान् हरिः।<br>समाचारं भरद्वाजात् त्रिलोकाय प्रदर्शयन्॥ ४४॥ | समय आनेपर कश्यपसे स्वयं देवमाता अदितिने देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाले उन महाविष्णुको जन्म दिया। वे (भगवान् विष्णु) चार भुजावाले, विशाल नेत्रवाले, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, नीले मेघके समान, शोभासे व्याप्त एवं प्रकाशमान थे। सभी देवता, सिद्ध, साध्य, चारण तथा प्रधान इन्द्र, उपेन्द्र और ऋषिगणोंसे आवृत्त ब्रह्मा उनके समीपमें गये। उपनयन (यज्ञोपवीत-संस्कार) हो जानेके बाद भगवान् हरिने तीनों लोकोंको प्रदर्शित करते हुए भरद्वाजसे वेदों और सदाचारका अध्ययन किया॥ ४१-४४॥ |
| एवं हि लौकिकं मार्गं दर्शयति स प्रभुः।<br>स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ४५॥<br><br>ततः कालेन मतिमान् बलिवैरोचनिः स्वयम्।<br>यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्चयामास सर्वगम्॥ ४६॥<br><br>ब्राह्मणान् पूजयामास दत्त्वा बहुतरं धनम्।<br>ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाटं महात्मनः॥ ४७॥<br><br>विज्ञाय विष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचोदितः।<br>आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्॥ ४८॥ | इस प्रकार वे प्रभु लौकिक (लोक-कल्याणकारी) मार्ग दिखाते हैं। वे जैसा प्रमाण उपस्थित करते हैं, संसार उसीका अनुवर्तन करता है। तदनन्तर समयानुसार विरोचनके पुत्र बुद्धिमान् बलिने यज्ञोंके द्वारा सर्वव्यापी यज्ञेश्वर विष्णुकी स्वयं अर्चना की। उसने (दक्षिणारूपमें) बहुत-सा धन देकर ब्राह्मणोंकी पूजा की। उस महात्माके यज्ञस्थलमें ब्रह्मर्षि आये। (यज्ञ हो रहा है ऐसा) जानकर भरद्वाजसे प्रेरणा प्राप्तकर भगवान् विष्णु वामनरूप धारणकर यज्ञदेशमें आये॥ ४५-४८॥ |
| कृष्णाजिनोपवीताङ्ग आषाढेन विराजितः।<br>ब्राह्मणो जटिलो वेदानुद्गिरन् भस्ममण्डितः॥ ४९॥<br><br>सम्प्राप्त्यासुरराजस्य समीपं भिक्षुको हरिः।<br>स्वपादैर्विमितं देशमयाचत बलिं त्रिभिः॥ ५०॥ | शरीरपर कृष्णमृगका चर्म तथा उपवीत (यज्ञोपवीत-जनेऊ) धारण किये, पलाशके दण्डसे सुशोभित, जटा धारण किये तथा भस्मसे मण्डित वे ब्राह्मण वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए असुरराज बलिके समीप आये। उन भिक्षुक (वेशधारी) हरिने बलिसे अपने तीन पगोंद्वारा नापी गयी भूमिकी याचना की॥ ४९-५०॥ |
१२६ * कूर्मपुराण *
| प्रक्षाल्य चरणौ विष्णोर्बलिर्भावसमन्वितः।<br>आचामयित्वा भृङ्गारमादाय स्वर्णनिर्मितम्॥ ५१॥<br>दास्ये तवेदं भवते पदत्रयं<br>प्रीणातु देवो हरिरव्ययाकृतिः।<br>विचिन्त्य देवस्य कराग्रपल्लवे<br>निपातयामास जलं सुशीतलम्॥ ५२॥<br>विचक्रमे पृथिवीमेष एता-<br>मथान्तरिक्षं दिवमादिदेवः।<br>व्यपेतरागं दितिजेश्वरं तं<br>प्रकर्तुकामः शरणं प्रपन्नम्॥ ५३॥<br>आक्रम्य लोकत्रयमीशपादः<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकं जगाम।<br>प्रणेमुरादित्यसहस्रकल्पं<br>ये तत्र लोके निवसन्ति सिद्धाः॥ ५४॥ | बलिने भावपूर्वक विष्णुके दोनों चरणोंको धोकर स्वर्णनिर्मित भृङ्गार (टोंटीदार पात्र) लेकर उन्हें आचमन कराया और 'मैं आपको आपके ही तीन पगवाली (भूमि) देता हूँ, इससे अव्यय आकृतिवाले देव हरि प्रसन्न हों' ऐसा संकल्पकर उन देवके कराग्रपल्लवपर सुशीतल जल गिराया। शरणमें आये हुए उस दैत्यराजको आसक्तिरहित बनानेकी इच्छासे उन आदिदेवने पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकमें पाद-विक्षेप किया। तीनों लोकोंको आक्रान्तकर ईश्वरका चरण प्रजापतिके लोकसे ब्रह्मलोकमें पहुँचा। उस लोकमें निवास करनेवाले जो सिद्धजन थे, उन्होंने हजारों आदित्यके समान (प्रकाशमान) उस चरणको प्रणाम किया॥ ५१-५४॥ |
| अथोपतस्थे भगवाननादिः<br>पितामहस्तोषयामास विष्णुम्।<br>भित्त्वा तदण्डस्य कपालमूर्ध्वं<br>जगाम दिव्यावरणानि भूयः॥ ५५॥<br>अथाण्डभेदात्निपपात शीतलं<br>महाजलं तत् पुण्यकृद्भिश्च जुष्टम्।<br>प्रवर्तते चापि सरिद्वरा तदा<br>गङ्गेत्युक्ता ब्रह्मणा व्योमसंस्था॥ ५६॥ | तदनन्तर अनादि भगवान् पितामहने वहाँ उपस्थित होकर विष्णुको प्रसन्न किया। उस ब्रह्माण्डके ऊपरी कपालको भेदकर पुनः वह चरण दिव्य आवरणोंमें चला गया। उस अण्डका भेदन होनेसे पुण्य करनेवालोंद्वारा सेवित वह शीतल महाजल नीचे गिरा। तभीसे आकाशमें स्थित वह नदियोंमें श्रेष्ठ नदी प्रवर्तित हुई जिसे ब्रह्माने 'गङ्गा' नामसे अभिहित किया॥ ५५-५६॥ |
| गत्वा महान्तं प्रकृतिं प्रधानं<br>ब्रह्माणमेकं पुरुषं स्वबीजम्।<br>अतिष्ठदीशस्य पदं तदव्ययं<br>दृष्ट्वा देवास्तत्र तत्र स्तुवन्ति॥ ५७॥<br>आलोक्य तं पुरुषं विश्वकायं<br>महान् बलिर्भक्तियोगेन विष्णुम्।<br>ननाम नारायणमेकमव्ययं<br>स्वचेतसा यं प्रणमन्ति देवाः॥ ५८॥ | ईश्वरका वह चरण महान्, प्रधान, प्रकृति, स्वबीज-स्वरूप अद्वितीय पुरुष ब्रह्मपर्यन्त पहुँचकर स्थित हो गया। उस अव्यय पदका दर्शनकर विभिन्न स्थानोंके देवता स्तुति करने लगे। उन संसाररूपी शरीरवाले पुरुष विष्णुको देखकर महान् बलिने उन अद्वितीय अव्यय नारायणको अपने भक्तिपूरित चित्तसे प्रणाम किया, जिन्हें सभी देवता प्रणाम करते रहते हैं॥ ५७-५८॥ |
| तमब्रवीद् भगवानादिकर्ता<br>भूत्वा पुनर्वामनो वासुदेवः।<br>ममैव दैत्याधिपतेऽधुनेदं<br>लोकत्रयं भवता भावदत्तम्॥ ५९॥ | आदिकर्ता भगवान् वासुदेवने पुनः वामनरूप धारणकर उस (बलि)-से कहा—दैत्याधिपते! इस समय भक्तिपूर्वक आपके द्वारा दिये गये ये तीनों लोक अब मेरे ही हैं॥ ५९॥ |
| प्रणम्य मूर्ध्ना पुनरेव दैत्यो<br>निपातयामास जलं कराग्रे। | दैत्यने पुनः सिरेसे प्रणामकर हाथोंके अग्रभागमें जल गिराया (और कहा—) अनन्तधाम! त्रिविक्रम! |
- अध्याय १६ * १२७
| दास्ये त्वात्मानमनन्तधाम्ने<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय ॥ ६०॥<br>प्रगृह्य सूनोरपि सम्प्रदत्तं<br>प्रह्लादसूनोरथ शङ्खपाणिः ।<br>जगाद दैत्यं जगदन्तरात्मा<br>पातालमूलं प्रविशेति भूयः ॥ ६१ ॥<br>समास्यतां भवता तत्र नित्यं<br>भुक्त्वा भोगान् देवतानामलभ्यान् ।<br>ध्यायस्व मां सततं भक्तियोगात्<br>प्रवेक्ष्यसे कल्पदाहे पुनर्माम् ॥ ६२ ॥ | अमित पराक्रमी ! मैं अपने-आपको तुम्हें प्रदान करता हूँ। प्रह्लादके पुत्रके भी पुत्र अर्थात् बलिके द्वारा भलीभाँति दिया हुआ तीनों लोक ग्रहणकर संसारके अन्तरात्मा शङ्खपाणि (भगवान् विष्णु)-ने दैत्यसे पुनः कहा—(अब आप) पातालमूलमें प्रवेश करें। आप वहाँ नित्य रहते हुए देवताओंको भी प्राप्त न होनेवाले भोगोंका उपभोगकर भक्तियोगद्वारा मेरा निरन्तर ध्यान करते रहें। कल्पान्त होनेपर पुनः मुझमें ही (आप) प्रवेश करेंगे ॥ ६०-६२ ॥ |
|---|---|
| उक्त्वैवं दैत्यसिंहं तं विष्णुः सत्यपराक्रमः ।<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः ॥ ६३ ॥<br><br>संस्तुवन्ति महायोगं सिद्धा देवर्षिकिन्नराः ।<br>ब्रह्मा शक्रोऽथ भगवान् रुद्रादित्यमरुद्गणाः ॥ ६४ ॥ | उस दैत्यश्रेष्ठसे इस प्रकार कहकर सत्यपराक्रम तथा विशाल डगोंवाले विष्णुने तीनों लोक इन्द्रको दे दिये। सिद्ध, देवता, ऋषि, किन्नर, ब्रह्मा, इन्द्र, भगवान् रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण (उन) महायोगीकी स्तुति करने लगे ॥ ६३-६४ ॥ |
| कृत्वैतदद्भुतं कर्म विष्णुर्वामनरूपधृक् ।<br>पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६५ ॥<br><br>सोऽपि दैत्यवरः श्रीमान् पातालं प्राप चोदितः ।<br>प्रह्लादेनासुरवरैर्विष्णुना विष्णुतत्परः ॥ ६६ ॥ | ऐसा अद्भुत कार्य करके वामन-रूप धारण करनेवाले विष्णु सभीके देखते-ही-देखते वहाँ अन्तर्धान हो गये। वह विष्णुपरायण श्रीसम्पन्न दैत्यश्रेष्ठ (बलि) भी विष्णुसे प्रेरित होकर प्रह्लाद एवं अन्य श्रेष्ठ असुरोंके साथ पातालमें चला गया ॥ ६५-६६ ॥ |
| अपृच्छद् विष्णुमाहात्म्यं भक्तियोगमनुत्तमम् ।<br>पूजाविधानं प्रह्लादं तदाहासौ चकार सः ॥ ६७ ॥<br><br>अथ रथचरणासिशङ्खपाणिं<br>सरसिजलोचनमीशमप्रमेयम् ।<br>शरणमुपययौ स भावयोगात्<br>प्रणतगतिं प्रणिधाय कर्मयोगम् ॥ ६८ ॥ | उसने प्रह्लादसे विष्णुका माहात्म्य, श्रेष्ठतम भक्तियोग तथा पूजनका विधान पूछा। तब उनके द्वारा बताये जानेपर उसने वैसा ही किया। तदनन्तर भक्तिपूर्वक कर्मयोगका आचरण कर वह शरणागतोंके आश्रयस्थल, हाथोंमें चक्र, तलवार तथा शंख धारण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले, अप्रमेय ईश्वरकी शरणमें गया ॥ ६७-६८ ॥ |
| एष वः कथितो विप्रा वामनस्य पराक्रमः ।<br>स देवकार्याणि सदा करोति पुरुषोत्तमः ॥ ६९ ॥ | ब्राह्मणो ! इस प्रकार यह (भगवान्) वामनके पराक्रमको मैंने बतलाया। ये पुरुषोत्तम सदा देवताओंके कार्योंको करते रहते हैं ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
१२८ * कूर्मपुराण *
सत्रहवाँ अध्याय
बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि कन्याओंकी संतानोंका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**बलिके महान् बल और पराक्रमवाले सौ पुत्र थे, उनमें प्रधान पुत्रका नाम 'बाण' था, जो द्युतिमान् और अत्यन्त बलवान् था। भगवान् शंकरमें अत्यन्त भक्तिवाले उस राजा (बाण)-ने राज्यका पालन करते हुए त्रिलोकीको अपने वशमें करके इन्द्रको पीड़ित किया। तब इन्द्रादि देवता कृत्तिवासा¹ (शंकर)-के पास जाकर कहने लगे—(भगवन्!) आपका भक्त 'बाण' नामक महान् असुर हमें पीड़ित कर रहा है॥ १-३॥ |
|---|---|
| बलेः पुत्रशतं त्वासीन्महाबलपराक्रमम्।<br>तेषां प्रधानो द्युतिमान् बाणो नाम महाबलः॥ १ ॥<br>सोऽतीव शंकरे भक्तो राजा राज्यमपालयत्।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय बाधयामास वासवम्॥ २ ॥<br>ततः शक्रादयो देवा गत्वोचुः कृत्तिवाससम्।<br>त्वदीयो बाधते ह्यस्मान् बाणो नाम महासुरः॥ ३ ॥ | |
| व्याहृतो दैवतैः सर्वैर्देवदेवो महेश्वरः।<br>ददाह बाणस्य पुरं शरेणैकेन लीलया॥ ४ ॥<br>दह्यमाने पुरे तस्मिन् बाणो रुद्रं त्रिशूलिनम्।<br>ययौ शरणमीशानं गोपतिं नीललोहितम्॥ ५ ॥<br>मूर्ध्न्याधाय तल्लिङ्गं शाम्भवं भीतिवर्जितः।<br>निर्गत्य तु पुरात् तस्मात् तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ६ ॥ | सभी देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने एक बाणसे लीलापूर्वक 'बाण' के नगरको दग्ध कर दिया। उस नगरके जलनेपर बाण त्रिशूलधारी, गोपति (वृषवाहन) नीललोहित ईशान रुद्रकी शरणमें गया॥ ४-५॥<br>शम्भुके लिंगको सिरपर धारणकर वह निर्भयतापूर्वक अपने नगरसे बाहर निकल गया और परमेश्वर (शंकर)-की स्तुति करने लगा। स्तुति करनेपर नीललोहित, शंकर भगवान् ईशने स्नेहवश उस बाणासुरको गणपतिका पद प्रदान किया॥ ६-७॥ |
| संस्तुतो भगवानीशः शंकरो नीललोहितः।<br>गाणपत्येन बाणं तं योजयामास भावतः॥ ७ ॥ | |
| अथाभवन् दनोः पुत्रास्ताराद्या ह्यतिभीषणाः।<br>तारस्तथा शम्बरश्च कपिलः शंकरस्तथा।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च प्राधान्येन प्रकीर्तिताः॥ ८ ॥<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवद् द्विजाः।<br>अनेकExternal/अनेकशिरसां तद्वत् खेचराणां महात्मनाम्॥ ९ ॥<br>अरिष्टा जनयामास गन्धर्वाणां सहस्त्रकम्।<br>अनन्ताद्या महानागाः काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः॥ १०॥ | दनुके² तार आदि अत्यन्त भीषण पुत्र हुए। उनमें तार, शम्बर, कपिल, शंकर, स्वर्भानु तथा वृषपर्वा प्रधान कहे गये हैं। द्विजो! दक्षप्रजापतिकी कन्या सुरसाके अनेक फणोंवाले हजार सर्प पुत्ररूपमें हुए। इसी प्रकार अरिष्टाने हजारों आकाशचारी महात्मा गन्धर्वोंको उत्पन्न किया। अनन्त आदि महानाग कद्रूके पुत्र कहे गये हैं॥ ८-१०॥ |
| ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुंगवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवां गृध्रिकां शुचिम्॥ ११ ॥<br>गास्तथा जनयामास सुरभिर्महिषीस्तथा।<br>इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातींश्च सर्वशः॥ १२॥ | द्विजश्रेष्ठो! ताम्राने छः कन्याओंको जन्म दिया, जो शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवा, गृध्रिका तथा शुचि नामवाली हैं। सुरभिने गौओं तथा महिषियों (भैंसों)-को उत्पन्न किया। इरा ने सभी प्रकारके वृक्ष, लता, वल्ली तथा तृण-जातिवालोंको जन्म दिया। द्विजसत्तमो! खसाने यक्षों तथा राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको और क्रोधवशाने राक्षसोंको उत्पन्न किया॥ ११-१३॥ |
| खसा वै यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।<br>रक्षोगणं क्रोधवशा जनयामास सत्तमाः॥ १३॥ |
१-कृत्ति (व्याघ्रचर्म)-को वसन (वस्त्र)-रूपमें धारण करनेवाले।
२-'दनु' दक्षप्रजापतिकी कन्या है। इसका विवाह कश्यपसे हुआ था।
| * अध्याय १८ * | १२९ |
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| विनतायाश्च पुत्रौ द्वौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ।<br>तयोश्च गरुडो धीमान् तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>प्रसादाच्छूलिनः प्राप्तो वाहनत्वं हरेः स्वयम् ॥ १४॥<br><br>आराध्य तपसा रुद्रं महादेवं तथारुणः।<br>सारथ्ये कल्पितः पूर्वं प्रीतेनार्कस्य शम्भुना ॥ १५॥ | विनताके दो विख्यात पुत्र हुए—गरुड तथा अरुण। उनमेंसे बुद्धिमान् गरुडने दुस्तर तप करके भगवान् शंकरकी कृपासे साक्षात् हरिके वाहन होनेका सौभाग्य प्राप्त किया। इसी प्रकार पूर्वकालमें अरुणने महादेव रुद्रकी तपस्याद्वारा आराधना की, इससे महादेवने प्रसन्न होकर उसे सूर्यका सारथी बना दिया ॥ १४-१५॥ |
| एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे ह्यस्मिञ्छृण्वतां पापनाशनाः ॥ १६॥ | इस वैवस्वत मन्वन्तरमें स्थावर तथा जंगम-रूप ये (महर्षि) कश्यपके वंशज कहे गये हैं। इनका वर्णन सुननेवालोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १६॥ |
| सप्तविंशत् सुताः प्रोक्ताः सोमपत्न्यश्च सुव्रताः।<br>अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ १७॥<br><br>बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः।<br>तद्वदङ्गिरसः पुत्रा ऋषयो ब्रह्मसत्कृताः ॥ १८॥<br><br>कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवप्रहरणाः सुताः।<br>एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।<br>मन्वन्तरेषु नियतं तुल्यैः कार्यैः स्वनामभिः ॥ १९॥ | शोभन व्रतवाले द्विजो ! (दक्षक) सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ कही गयी हैं। अरिष्टनेमिकी पत्नियोंकी सोलह संतानें हुईं। विद्वान् बहुपुत्रके चार विद्युत् नाम-वाले पुत्र कहे गये हैं। इसी प्रकार अङ्गिराके पुत्र ब्रह्मा-द्वारा सम्मान-प्राप्त श्रेष्ठ ऋषि थे। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण अर्थात् देवोंके शस्त्र थे। हजार युगोंका अन्त होनेपर विभिन्न मन्वन्तरोंमें ये अपने नामोंके समान कार्योंके साथ निश्चितरूपसे पुनः उत्पन्न होते हैं ॥ १७—१९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय
महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना
| सूत उवाच<br>एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासंतानकारणात्।<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार सुमहत् तपः ॥ १॥<br>तस्य वै तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ।<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ ॥ २॥<br>वत्सरान्नध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहाद्यशाः।<br>रैभ्यस्य जज्ञिरे रैभ्याः पुत्रा द्युतिमतां वराः ॥ ३॥<br>च्यवनस्य सुता पत्नी नैध्रुवस्य महात्मनः।<br>सुमेधा जनयामास पुत्रान् वै कुण्डपायिनः ॥ ४॥<br>असितस्यैकपर्णायां बर्हिष्ठः समजायत।<br>नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यो महातपाः ॥ ५॥ | सूतजी बोले— प्रजाकी अभिवृद्धिके लिये इन पुत्रोंको उत्पन्न कर पुत्राभिलाषी कश्यप अत्यन्त महान् तप करने लगे। कठोर तप कर रहे उनके 'वत्सर' तथा 'असित' नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे नैध्रुव और रैभ्य नामके महान् यशस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। रैभ्यके तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ रैभ्य नामक पुत्र हुआ। च्यवन ऋषिकी (सुमेधा नामवाली) पुत्री महात्मा नैध्रुवकी पत्नी थी। सुमेधाने 'कुण्डपायी' पुत्रोंको उत्पन्न किया। असितकी एकपर्णा नामक पत्नीने बर्हिष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया जो देवल नामवाले थे, वे योगके आचार्य, |
१३० * कूर्मपुराण *
| शाण्डिल्यानां परः श्रीमान् सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः ।<br>प्रसादात् पार्वतीशस्य योगमुत्तममाप्तवान् ॥ ६ ॥ | महान् तपस्वी शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, श्रीमान्, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले तथा विद्वान् थे। पार्वतीके पति भगवान् शंकरकी कृपासे उन्होंने श्रेष्ठ योग प्राप्त किया ॥ १-६ ॥ |
| शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ।<br>नरप्रकृतयो विप्राः पुलस्त्यस्य वदामि वः ॥ ७ ॥ | शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों शाखाएँ कश्यपवंशीय और मानव प्रकृतिवाली हैं। ब्राह्मणो! आपको अब पुलस्त्य ऋषिके वंशको बताता हूँ। विप्रो! |
| तृणबिन्दोः सुता विप्रा नाम्ना त्विलविला स्मृता ।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ८ ॥ | तृणबिन्दु की एक पुत्री थी जो इलविला नामसे प्रसिद्ध थी। उन राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको प्रदान की। उस |
| ऋषिस्त्वैलविलिस्तस्यां विश्रवाः समपद्यत ।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धिकाः ॥ ९ ॥ | इलविलासे विश्रवा ऋषि उत्पन्न हुए। उनकी पुष्पोत्कटा, राका, कैकसी तथा देववर्णिनी नामकी चार पत्नियाँ थीं, जो पुलस्त्यके वंशको बढ़ानेवाली तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न थीं। अब आप उनकी संतानोंको सुनें— ॥ ७-१० ॥ |
| पुष्पोत्कटा च राका च कैकसी देववर्णिनी ।<br>रूपलावण्यसम्पन्नास्तासां वै शृणुत प्रजाः ॥ १० ॥ | |
| ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्य सुषुवे देवरूपिणी ।<br>कैकसी जनयत् पुत्रं रावणं राक्षसाधिपम् ॥ ११ ॥ | उनकी देवरूपिणी (देववर्णिनी) (नामक पत्नी)-ने ज्येष्ठ वैश्रवण (कुबेर)-को जन्म दिया। कैकसीने राक्षसोंके अधिपति रावण नामक पुत्र और इसी प्रकार |
| कुम्भकर्णं शूर्पणखां तथैव च विभीषणम् ।<br>पुष्पोत्कटा व्यजनयत् पुत्रान् विश्रवसः शुभान् ॥ १२ ॥ | कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषणको जन्म दिया। पुष्पोत्कटाने भी महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व और खर नामक विश्रवाके शुभ पुत्रों और कुम्भीनसी नामक कन्याको जन्म दिया। अब आप राकाकी संतान सुनें— ॥ ११-१३ ॥ |
| महोदरं प्रहस्तं च महापार्श्वं खरं तथा ।<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां राकायां शृणुत प्रजाः ॥ १३ ॥ | |
| त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वो महाबलः ।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा दश ।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टा रुद्रभक्ताः सुभीषणाः ॥ १४ ॥ | त्रिशिरा, दूषण तथा महाबली विद्युज्जिह्व—ये राकाके पुत्र थे। पुलस्त्यके ये सभी दस राक्षस-पुत्र क्रूर कर्म करनेवाले, अत्यन्त भयंकर, उत्कट तपोबलवाले और रुद्रके भक्त थे। मृग, व्याल, दाढ़ोंवाले (प्राणी), भूत, पिशाच, सर्प, शूकर तथा हाथी—ये सभी पुलह (ऋषि)-के पुत्र हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें (महर्षि) क्रतुको संतानहीन कहा गया है। प्रजापति कश्यप मरीचिके पुत्र थे। भृगुके भी शुक्र नामक पुत्र हुए जो दैत्योंके आचार्य, महान् तपस्वी, स्वाध्याय तथा योगपरायण, अत्यन्त तेजस्वी और शंकरके भक्त थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अत्रिकी बहुत-सी पत्नियाँ थीं। वे पतिव्रता तथा आपसमें बहनें थीं। हमने सुना है कि वे घृताचीसे उत्पन्न कृशाश्वकी पुत्रियाँ थीं ॥ १४-१८ ॥ |
| पुलहस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्यालाश्च दंष्ट्रिणः ।<br>भूताः पिशाचाः सर्पाश्च शूकरा हस्तिनस्तथा ॥ १५ ॥ | |
| अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः स्वयमेव प्रजापतिः ॥ १६ ॥ | |
| भृगोरप्यभवच्छुक्रो दैत्याचार्यो महातपाः ।<br>स्वाध्याययोगनिरतो हरभक्तो महाद्युतिः ॥ १७ ॥ | |
| अत्रेः पत्न्योऽभवन् बह्व्यः सोदर्यास्ताः पतिव्रताः ।<br>कृशाश्वस्य तु विप्रेन्द्रा घृताच्यामिति मे श्रुतम् ॥ १८ ॥ | |
| स तासु जनयामास स्वस्त्यात्रेयान् महौजसः ।<br>वेदवेदाङ्गनिरतांस्तपसा हतकिल्बिषान् ॥ १९ ॥ | उन्होंने उन पत्नियोंसे महान् ओजस्वी, वेद-वेदाङ्ग-परायण और तपस्याद्वारा अपने पापोंको नष्ट करनेवाले कल्याणकारी आत्रेयों (स्वस्त्यात्रेयों)-को उत्पन्न किया। नारदने देवी अरुन्धतीको वसिष्ठके लिये प्रदान किया। दक्षके शापसे नारद मुनि ऊर्ध्वरेता हो गये ॥ १९-२० ॥ |
| नारदस्तु वसिष्ठाय ददौ देवीमरुन्धतीम् ।<br>ऊर्ध्वरेतास्तत्र मुनिः शापाद् दक्षस्य नारदः ॥ २० ॥ |
- अध्याय १९ * । १३१
हर्यश्वेषु तु नष्टेषु मायया नारदस्य तु।
शशाप नारदं दक्षः क्रोधसंरक्तलोचनः॥ २१ ॥
नारदकी मायासे हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधसे लाल आँखोंवाले दक्षने नारदको (इस प्रकार) शाप दिया— ॥ २१ ॥
यस्मान्मम सुताः सर्वे भवतो मायया द्विज।
क्षयं नीतास्त्वशेषेण निरपत्यो भविष्यसि॥ २२॥
'द्विज! चूँकि आपकी मायासे मेरे सभी पुत्र सभी प्रकारसे विनाशको प्राप्त हो गये, अतः आप भी संतानरहित होंगे।'
अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत् सुतम्।
शक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्वज्ञस्तपतां वरः॥ २३॥
वसिष्ठने अरुन्धतीसे शक्ति नामक पुत्र उत्पन्न किया। शक्तिके पराशर हुए जो श्रीसम्पन्न, सर्वज्ञ तथा तपस्वियोंमें श्रेष्ठ थे।
आराध्य देवदेवेशमीशानं त्रिपुरान्तकम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्॥ २४॥
उन्होंने त्रिपुरका नाश करनेवाले देवाधिदेव शंकरकी आराधनाकर कृष्णद्वैपायन नामवाले अप्रतिम एवं शक्तिसम्पन्न पुत्रको प्राप्त किया॥ २२—२४॥
द्वैपायनाच्छुको जज्ञे भगवानैव शंकरः।
अंशांशेनावतीर्योर्व्यां स्वं प्राप परमं पदम्॥ २५॥
भगवान् शंकर ही शुक नामसे द्वैपायनके पुत्र हुए। पृथ्वीपर अपने अंशांशरूपसे उत्पन्न होकर (पुनः) अपने परम पदको प्राप्त हुए।
शुकस्याप्यभवन् पुत्राः पञ्चात्यन्ततपस्विनः।
भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरश्च पञ्चमः।
कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता॥ २६॥
शुकके महान् तपस्वी पाँच पुत्र हुए, वे भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवें गौर नामवाले थे। साथ ही कीर्तिमती नामकी एक कन्या भी हुई, जो योगमाता और व्रतपरायणा थी॥ २५-२६॥
एतेऽत्र वंश्याः कथिता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनाम्।
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं कश्यपाद्राजसंततिम्॥ २७॥
इन ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंके वंशजोंका यह वर्णन किया गया, अब आगे कश्यपसे उत्पन्न क्षत्रिय संतानोंका वर्णन सुनो— ॥ २७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवनाश्वको गौतमका उपदेश, महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति
सूत उवाच
सूतजी बोले—
अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपात् प्रभुम्।
तस्यादित्यस्य चैवासीद् भार्याणां तु चतुष्टयम्।
संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां निबोधत॥ १॥
अदितिने कश्यपसे शक्तिशाली 'आदित्य' नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया नामवाली चार पत्नियाँ थीं। उनके पुत्रोंको सुनो—
संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यन्मनुमनुत्तमम्।
यमं च यमुनां चैव राज्ञी रैवतमेव च॥ २॥
त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनु, यम और यमुनाको उत्पन्न किया और राज्ञीने रैवतको उत्पन्न किया।
प्रभा प्रभातमादित्याच्छाया सावर्णिमात्मजम्।
शनिं च तपतीं चैव विष्टिं चैव यथाक्रमम्॥ ३॥
प्रभाने आदित्यसे प्रभातको उत्पन्न किया। छायाने क्रमशः सावर्णि, शनि, तपती और विष्टि नामक संतानोंको जन्म दिया॥ १—३॥