संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १५ * | ११० |
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| स वासुदेवस्य वचो निशम्य भगवान् हरः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं हनने दैत्येन्द्रस्य मतिं दधौ॥ १७९॥ | वासुदेवका वचन सुनकर उन भगवान् हरने विष्णुकी ओर देखकर दैत्येन्द्र अन्धकको मारनेका विचार किया, गणोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे देवताओंकी सेनामें गये। (तब) अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले लोग भैरवदेवकी (इस प्रकार) स्तुति करने लगे—॥ १७९-१८०॥ |
| जगाम देवतानीकं गणानां हर्षमुत्तमम्।<br>स्तुवन्ति भैरवं देवमन्तरिक्षचरा जनाः॥ १८०॥<br>जयानन्त महादेव कालमूर्ते सनातन।<br>त्वमग्निः सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यशः॥ १८१॥ | अनन्त ! महादेव ! आप सनातन हैं, कालकी मूर्ति हैं, आपकी जय हो। आप अग्निरूप और सभी प्राणियोंके भीतर सदैव निवास करनेवाले हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही धाता अव्यय हरि हैं। आप ही ब्रह्मा, महादेव और आप ही तेजःस्वरूप परमपद हैं। (आप) प्रणवमूर्ति, योगात्मा, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले त्रिलोचन हैं। आप महाविभूतिस्वरूप, देवताओंके स्वामी हैं। हे सम्पूर्ण संसारके स्वामी ! आपकी जय हो ॥ १८१-१८३॥ |
| त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वं धाता हरिरव्ययः।<br>त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्॥ १८२॥ | |
| ओङ्कारमूर्तिर्योगात्मा त्रयीनेत्रस्त्रिलोचनः।<br>महाविभूतिर्देवेशो जयाशेषजगत्पते॥ १८३॥<br>ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ गृहीत्वान्धकमीश्वरः।<br>त्रिशूलाग्रेषु विन्यस्य प्रननर्त सतां गतिः॥ १८४॥ | तदनन्तर सज्जनोंके आश्रयस्थान एवं प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर वे ईश्वर अन्धक दैत्यको पकड़कर अपने त्रिशूलके अग्रभागमें रखकर नाचने लगे। त्रिशूलपर पिरोये हुए अन्धकको देखकर पितामह ब्रह्मा तथा देवगण, संसारसागरसे मुक्त करनेवाले भैरवदेवको प्रणाम करने लगे ॥ १८४-१८५॥ |
| दृष्ट्वान्धकं देवगणाः शूलप्रोतं पितामहः।<br>प्रणेमुरीश्वरं देवं भैरवं भवमोचकम्॥ १८५॥<br>अस्तुवन् मुनयः सिद्धा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>अन्तरिक्षेऽप्सरःसङ्घा नृत्यन्ति स्म मनोरमाः॥ १८६॥ | मुनि तथा सिद्धजन स्तुति करने लगे और गन्धर्व, किन्नर गान करने लगे तथा अन्तरिक्षमें रमणीय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। तदनन्तर त्रिशूलके अग्रभागमें स्थापित उस अन्धकके सभी पाप दग्ध (नष्ट) हो गये, उसे सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया और वह परमेश्वरकी स्तुति करने लगा— ॥ १८६-१८७॥ |
| संस्थापितोऽथ शूलाग्रे सोऽन्धको दग्धकिल्बिषः।<br>उत्पन्नाखिलविज्ञानस्तुष्टाव परमेश्वरम्॥ १८७॥ | |
| अन्धक उवाच<br>नमामि मूर्ध्ना भगवन्तमेकं<br>समाहिता यं विदुरीशतत्त्वम्।<br>पुरातनं पुण्यमनन्तरूपं<br>कालं कविं योगवियोगहेतुम्॥ १८८॥<br>दंष्ट्राकरालं दिवि नृत्यमानं<br>हुताशवक्त्रं ज्वलनार्करूपम्।<br>सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं<br>भवन्तमेकं प्रणमामि रुद्रम्॥ १८९॥ | **अन्धकने (स्तुति करते हुए) कहा—**समाधिमें स्थित रहनेवाले लोग जिस पुरातन, पुण्यदायी, अनन्त-स्वरूप, कालरूप, कवि तथा संयोग एवं वियोगके कारणरूप ईश्वर-तत्त्वको जानते हैं, मैं उन अद्वितीय भगवान्को सिरसे प्रणाम करता हूँ। भयंकर दाढ़ोंवाले, आकाशमें नृत्य करते हुए, अग्निके समान मुखवाले, प्रज्वलित सूर्यके समान स्वरूपवाले, हजारों पैर, आँख तथा सिरोंसे युक्त आप अद्वितीय रुद्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १८८-१८९॥ |