संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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११६ * कूर्मपुराण *
| तदन्तरे महादैत्यो ह्यन्धको मन्मथार्दितः।<br>मोहितो गिरिशां देवीमाहर्तुं गिरिमाययौ ॥ १६८ ॥ | इसी बीच कामदेवके द्वारा पीड़ित महादैत्य अन्धक मोहित होता हुआ देवी गिरिजाको हरण करनेके लिये पर्वतपर आया ॥ १६८ ॥ |
| अथानन्तवपुः श्रीमान् योगी नारायणोऽमलः।<br>तत्रैवाविरभूद् दैत्यैर्युद्धाय पुरुषोत्तमः ॥ १६९ ॥<br>कृत्वाथ पार्श्वे भगवन्तमीशो<br>युद्धाय विष्णुं गणदेवमुख्यैः।<br>शिलादपुत्रेण च मातृकाभिः<br>स कालरुद्रोऽभिजगाम देवः ॥ १७० ॥<br>त्रिशूलमादाय कृशानुकल्पं<br>स देवदेवः प्रययौ पुरस्तात्।<br>तमन्वयुस्ते गणराजवर्या<br>जगाम देवोऽपि सहस्रबाहुः ॥ १७१ ॥<br>रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिद्वर्णवर्णः।<br>तदा सुमेरोः शिखराधिरूढ-<br>स्त्रिलोकदृष्टिर्भगवानिवार्कः ॥ १७२ ॥ | इसके बाद विराट्शरीरधारी, श्रीमान्, योगी, निर्मल नारायण पुरुषोत्तम दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये वहीं प्रकट हो गये। तदनन्तर वे कालरुद्रदेव भगवान् विष्णुको अपने पार्श्वमें करके तथा मुख्य गणदेवों, शिलादपुत्र नन्दी और मातृकाओंको साथ लेकर युद्धके लिये स्वयं गये। अग्निके समान त्रिशूलको लेकर वे देवदेव (शंकर) आगे-आगे चले। उन श्रेष्ठ गणराजों तथा हजार बाहुवाले देव (विष्णु)-ने भी उनका अनुगमन किया। देवताओंके बीचमें उस समय मेघके समान वर्णवाले गरुडवाहन भगवान् विष्णु उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जिस प्रकार सुमेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ तीनों लोकोंके नेत्र-स्वरूप भगवान् सूर्य सुशोभित होते हैं ॥ १६९–१७२ ॥ |
| जगत्यनादिर्भगवानमेयो<br>हरः सहस्राकृतिराविरासीत्।<br>त्रिशूलपाणिर्गगने सुघोषः<br>पपात देवोपरि पुष्पवृष्टिः ॥ १७३ ॥<br>समागतं वीक्ष्य गणेशराजं<br>समावृतं देवरिपुर्गणेशैः।<br>युयोध शक्रेण समातृकाभि-<br>र्गणैरशेषैरमरप्रधानैः ॥ १७४ ॥<br>विजित्य सर्वानपि बाहुवीर्यात्<br>स संयुगे शम्भुमनन्तधाम।<br>समाययौ यत्र स कालरुद्रो<br>विमानमारुह्य विहीन सत्त्वः ॥ १७५ ॥<br>दृष्ट्वान्धकं समायान्तं भगवान् गरुडध्वजः।<br>व्याजहार महादेवं भैरवं भूतिभूषणम् ॥ १७६ ॥ | अनादि, अमेय त्रिशूलपाणि भगवान् हर हजारों स्वरूप धारणकर पृथ्वीपर प्रकट हुए। (उस समय) आकाशमें सुन्दर शब्द होने लगा तथा उन देवके ऊपर (आकाशसे) पुष्पवृष्टि होने लगी। गणेश्वरोंके राजा शिवको गणेश्वरोंद्वारा घिरे हुए आते देखकर देवशत्रु अन्धक, इन्द्र तथा मातृकाओं, गणों और सभी प्रधान-प्रधान देवताओंके साथ युद्ध करने लगा। अपने बाहुबलसे युद्धमें सभीको जीतकर वह सत्त्वविहीन (अन्धक) अनन्त तेजस्वी शम्भुके समीप गया, जहाँ वे कालरुद्र विमानपर बैठे हुए थे। अन्धकको आते हुए देखकर भगवान् गरुडध्वजने विभूतिसे सुशोभित भैरव महादेवसे कहा— ॥ १७३–१७६ ॥ |
| हन्तुमर्हसि दैत्येशमन्धकं लोककण्टकम्।<br>त्वामृते भगवान् शक्तो हन्ता नान्योऽस्य विद्यते ॥ १७७ ॥ | (भगवन्!) आप संसारके कण्टकरूप दैत्यपति अन्धकको मारनेमें समर्थ हैं। आपको छोड़कर इसे मारनेमें और कोई दूसरा समर्थ नहीं है। आप सभी लोकोंका संहार करनेवाले ईश्वरके कालमय शरीर हैं। |
| त्वं हर्ता सर्वलोकानां कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः।<br>स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्वेदविद्भिर्विचक्षणैः ॥ १७८ ॥ | वेदोंको जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा विविध मन्त्रोंसे आपकी स्तुति की जाती है ॥ १७७-१७८ ॥ |