संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय १५ * | १९५ |
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| न मे विदुः परं तत्त्वं देवाद्या न महर्षयः।<br>एकोऽयं वेद विश्वात्मा भवानी विष्णुरेव च॥ १५३॥<br><br>अहं हि निष्क्रियः शान्तः केवलो निष्परिग्रहः।<br>मामेव केशवं देवमाहुर्देवीमथाम्बिकाम्॥ १५४॥<br><br>एष धाता विधाता च कारणं कार्यमेव च।<br>कर्ता कारयिता विष्णुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ १५५॥<br><br>भोक्ता पुमानप्रमेयः संहर्ता कालरूपधृक्।<br>स्रष्टा पाता वासुदेवो विश्वात्मा विश्वतोमुखः॥ १५६॥<br><br>कूटस्थो ह्यक्षरो व्यापी योगी नारायणः स्वयम्।<br>तारकः पुरुषो ह्यात्मा केवलं परमं पदम्॥ १५७॥<br><br>सैषा माहेश्वरी गौरी मम शक्तिर्निरञ्जना।<br>शान्ता सत्या सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥ १५८॥<br><br>अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति।<br>एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥ १५९॥<br><br>तयाहं संगतो देव्या केवलो निष्कलः परः।<br>पश्याम्यशेषमेवेदं यस्तद् वेद स मुच्यते॥ १६०॥<br><br>तस्मादनादिमद्वैतं विष्णुमात्मानमीश्वरम्।<br>एकमेव विजानीध्वं ततो यास्यथ निर्वृतिम्॥ १६१॥<br><br>मन्यन्ते विष्णुमव्यक्तमात्मानं श्रद्धयान्विताः।<br>ये भिन्नदृष्ट्यापीशानं पूजयन्तो न मे प्रियाः॥ १६२॥<br><br>द्विषन्ति ये जगत्सूतिं मोहिता रौरवादिषु।<br>पच्यमाना न मुच्यन्ते कल्पकोटिशतैरपि॥ १६३॥<br><br>तस्मादशेषभूतानां रक्षको विष्णुरव्ययः।<br>यथावदिह विज्ञाय ध्येयः सर्वापदि प्रभुः॥ १६४॥<br><br>श्रुत्वा भगवतो वाक्यं देव्यः सर्वगणेश्वराः।<br>नेमुर्नारायणं देवं देवीं च हिमशैलजाम्॥ १६५॥<br><br>प्रार्थयामासुरीशाने भक्तिं भक्तजनप्रिये।<br>भवानीपादयुगले नारायणपदाम्बुजे॥ १६६॥<br><br>ततो नारायणं देवं गणेशा मातरोऽपि च।<br>न पश्यन्ति जगत्सूतिं तदद्भुतमिवाभवत्॥ १६७॥ | मेरे परम तत्त्वको न तो देवता आदि जानते हैं और न महर्षि। एकमात्र विश्वात्मा ये विष्णु और भवानी ही (मुझे) जानते हैं। मैं ही निष्क्रिय, शान्त, अद्वितीय और परिग्रहशून्य हूँ। मुझे ही केशव, देव तथा देवी अम्बिका कहा जाता है॥ १५३-१५४॥<br><br>ये विष्णु ही स्वयं धाता, विधाता, कारण, कार्य, कर्ता, कारयिता (कार्यके लिये प्रेरित करनेवाले) और भुक्ति तथा मुक्तिस्वरूप फलको प्रदान करनेवाले हैं। (ये ही) भोक्ता, अप्रमेय पुरुष, संहर्ता, कालका रूप धारण करनेवाले, सृष्टि तथा पालन करनेवाले, विश्वात्मा, सर्वव्यापक, वासुदेव, कूटस्थ, अविनाशी, व्यापी, योगी, नारायण, तारक, पुरुष, आत्मा और अद्वितीय परम पद हैं॥ १५५-१५७॥<br><br>ये माहेश्वरी गौरी मेरी निरञ्जन शक्ति हैं। वेद इन्हें ही शान्त, सत्य, सदानन्द और परम पद बतलाते हैं। इन्हींसे यह सब उत्पन्न हुआ है और इन्हींमें लय भी हो जायगा। ये ही सभी प्राणियोंकी गतियोंमें उत्तम गति हैं॥ १५८-१५९॥<br><br>इन्हीं देवीके साथ अद्वितीय, निष्कल तथा परमस्वरूप मैं इस सम्पूर्ण (विश्व)-का साक्षात्कार करता हूँ। जो इस (तत्त्व)-को जानता है, वह मुक्त हो जाता है। इसलिये अनादि, अद्वैत विष्णु और आत्मस्वरूप ईश्वर (शंकर)-को एक ही समझो। इससे तुम लोगोंको शान्ति प्राप्त होगी। जो श्रद्धासम्पन्न व्यक्ति अव्यक्त एवं आत्मरूप विष्णुको भिन्न मानकर शिवकी पूजा करते हैं, वे मुझे प्रिय नहीं हैं। जो लोग जगत्को उत्पन्न करनेवाले (विष्णु)-से द्वेष रखते हैं (वे सभी) मोहित व्यक्ति रौरव आदि नरकोंमें पड़े रहते हैं और सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी मुक्त नहीं होते। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक अव्यय विष्णुको भलीभाँति समझकर समस्त आपत्तियोंमें उन प्रभुका ध्यान करना चाहिये॥ १६०-१६४॥<br><br>सभी देवियों और गणेश्वरोंने भगवान्के वाक्यको सुनकर नारायण देव तथा हिमालयकी पुत्री देवी (पार्वती)-को प्रणाम किया और भक्तजनोंके प्रिय ईशान भगवान् शंकर तथा भवानीके चरणयुगल एवं नारायणके चरणकमलोंमें भक्तिकी प्रार्थना की। तदनन्तर गणेश्वरों और मातृदेवियोंने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नारायण देवको नहीं देखा यह एक आश्चर्य-जैसा ही हुआ॥ १६५-१६७॥ |