संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ * कूर्मपुराण *
| सम्प्राप्तमीश्वरं ज्ञात्वा सर्व एव गणेश्वराः ।<br>समागम्योपतस्थुस्तं भानुमन्तमिव द्विजाः ॥ १३९ ॥<br><br>प्रविश्य भवनं पुण्यमयुक्तानां दुरासदम् ।<br>ददर्श नन्दिनं देवं भैरवं केशवं शिवः ॥ १४० ॥<br><br>प्रणामप्रवणं देवं सोऽनुगृह्याथ नन्दिनम् ।<br>आघ्राय मूर्ध्नीशानः केशवं परिषस्वजे ॥ १४१ ॥<br><br>दृष्ट्वा देवी महादेवं प्रीतिविस्फारितेक्षणा ।<br>ननाम शिरसा तस्य पादयोरीश्वरस्य सा ॥ १४२ ॥<br><br>निवेद्य विजयं तस्मै शंकरायाथ शंकरी ।<br>भैरवो विष्णुमाहात्म्यं प्रणतः पार्श्वगोऽवदत् ॥ १४३ ॥<br><br>श्रुत्वा तद्विजयं शम्भुर्विक्रमं केशवस्य च ।<br>समास्ते भगवानीशो देव्या सह वरासने ॥ १४४ ॥<br><br>ततो देवगणाः सर्वे मरीचिप्रमुखा द्विजाः ।<br>आजग्मुर्मन्दरं द्रष्टुं देवदेवं त्रिलोचनम् ॥ १४५ ॥<br><br>येन तद् विजितं पूर्वं देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>समागतं दैत्यसैन्यमीशदर्शनवाञ्छया ॥ १४६ ॥<br><br>दृष्ट्वा वरासनासीनं देव्या चन्द्रविभूषणम् ।<br>प्रणेमुरादराद् देव्यो गायन्ति स्मातिलालसाः ॥ १४७ ॥<br><br>प्रणेमुर्गिरिजां देवीं वामपार्श्वे पिनाकिनः ।<br>देवासनगतं देवं नारायणमनामयम् ॥ १४८ ॥<br><br>दृष्ट्वा सिंहासनासीनं देव्या नारायणेन च ।<br>प्रणम्य देवमीशानं पृष्टवत्यो वराङ्गनाः ॥ १४९ ॥<br><br>कन्या ऊचुः<br><br>कस्त्वं विभ्राजसे कान्त्या केयं बालरविप्रभा ।<br>कोऽन्वयं भाति वपुषा पङ्कजायतलोचनः ॥ १५० ॥<br><br>निशम्य तासां वचनं वृषेन्द्रवरवाहनः ।<br>व्याजहार महायोगी भूताधिपतिरव्ययः ॥ १५१ ॥<br><br>अहं नारायणो गौरी जगन्माता सनातनी ।<br>विभज्य संस्थितो देवः स्वात्मानं बहुधेश्वरः ॥ १५२ ॥ | ईश्वरको आया हुआ जानकर सभी गणेश्वर उनके पासमें आकर इस प्रकार स्थित हो गये जैसे द्विज सूर्यकी उपासनामें स्थित रहते हैं। अयोगियोंके लिये दुर्गम पुण्यशाली भवनमें प्रवेशकर शिवने नन्दी, भैरवदेव तथा केशवको देखा॥ १३९-१४०॥<br><br>उन देव शंकरने प्रणाम करनेवाले नन्दीके ऊपर कृपा करके उनका सिर सूंघा और केशवका आलिङ्गन किया। महादेवको देखकर प्रीतिसे विकसित आँखोंवाली उन देवीने उन ईश्वरके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया। तदनन्तर शंकरप्रिया पार्वतीने उन्हें विजयका समाचार कहा और (शंकरके) पार्श्वमें स्थित रहनेवाले भैरवने विनयपूर्वक विष्णुके माहात्म्यको भी (उन्हें) बताया। उस विजय (-के समाचार) तथा केशव विष्णुके पराक्रमको सुनकर शम्भु भगवान् शंकर देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए। तदनन्तर मरीचि आदि प्रमुख द्विज तथा सभी देवगण देवाधिदेव त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये मन्दराचलपर आये॥ १४१-१४५॥<br><br>जिन्होंने दैत्य (अन्धक)-की सेनाको पहले जीता था, वे श्रेष्ठ सौ देवियाँ भी ईशके दर्शनोंकी लालसासे वहाँ आयीं। चन्द्रमारूपी आभूषणसे विभूषित शंकरको देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर (उन) देवियोंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अत्यन्त प्रेमसे वे गान करने लगीं। पिनाकी (शंकर)-के वामभागमें स्थित देवी गिरिजा एवं शंकरके आसनपर उनके साथ विराजमान प्रसन्नचित्त नारायणको (उन देवियोंने) प्रणाम किया। देवी पार्वती और नारायणके साथ सिंहासनपर बैठे हुए देव शंकरको प्रणामकर उन श्रेष्ठ स्त्रियोंने पूछा—॥ १४६-१४९॥<br><br>**कन्याओं (देवियों)-ने कहा—**अपनी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले आप कौन हैं? बाल सूर्यके समान आभावाली यह (बाला) कौन है? और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले एवं अपने शरीरके कारण शोभायमान यह कौन पुरुष है?॥ १५०॥<br><br>उनके वचन सुनकर श्रेष्ठ वृषभपर आरूढ़ होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, महायोगी अव्यय (शिव)-ने कहा—मैं अपनेको नारायण तथा सनातन जगन्माता गौरी आदि अनेक रूपोंमें विभक्तकर स्थित रहनेवाला देव ईश्वर हूँ॥ १५१-१५२॥ |