भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123
* अध्याय १५ *११३
ब्रह्मा हुताशनः शक्रो यमोऽन्ये सुरपुङ्गवाः ।<br>सिषेविरे महादेवीं स्त्रीवेशं शोभनं गताः ॥ १२३ ॥<br>नन्दीश्वरश्च भगवान् शम्भोरत्यन्तवल्लभः ।<br>द्वारदेशे गणाध्यक्षो यथापूर्वमतिष्ठत ॥ १२४ ॥<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो ह्यन्धको नाम दुर्मतिः ।<br>आहर्तुकामो गिरिजामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १२५ ॥<br>सम्प्राप्तमन्धकं दृष्ट्वा शंकरः कालभैरवः ।<br>न्यषेधयदमयात्मा कालरूपधरो हरः ॥ १२६ ॥<br>तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ।<br>शूलेनोरसि तं दैत्यमाजघान वृषध्वजः ॥ १२७ ॥सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, यम तथा अन्य भी श्रेष्ठ देवता महादेवीकी सेवा करने लगे। शम्भुके अत्यन्त प्रिय गणोंके अध्यक्ष भगवान् नन्दीश्वर पूर्वकी भाँति द्वारपर स्थित रहे। इसी बीच अन्धक नामका एक कुबुद्धि दैत्य गिरिजा पार्वतीको हरनेकी इच्छासे उस मन्दर पर्वतपर आया। अन्धकको वहाँ आया देखकर कालरूपधारी शंकर, अमेयात्मा हर कालभैरवने उसे रोका। उन दोनोंका अत्यन्त भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ—॥ १२३-१२७ ॥
ततः सहस्रशो दैत्यः ससर्जान्धकसञ्ज्ञितान् ।<br>नन्दिषेणादयो दैत्यैरन्धकैरभिनिर्जिताः ॥ १२८ ॥<br>घण्टाकर्णो मेघनादश्चण्डेशश्चण्डतापनः ।<br>विनायको मेघवाहः सोमनन्दी च वैद्युतः ॥ १२९ ॥<br>सर्वेऽन्धकं दैत्यवरं सम्प्राप्यातिबलान्विताः ।<br>युयुधुः शूलशक्त्यृष्टिगिरिकूटपरश्वधैः ॥ १३० ॥<br>भ्रामयित्वाथ हस्ताभ्यां गृहीतचरणद्वयाः ।<br>दैत्येन्द्रेणातिबलिना क्षिप्तास्ते शतयोजनम् ॥ १३१ ॥<br>ततोऽन्धकनिसृष्टास्ते शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>कालसूर्यप्रतीकाशा भैरवं त्वभिदुद्रुवुः ॥ १३२ ॥<br>हा हेति शब्दः सुमहान् बभूवातिभयङ्करः ।<br>युयोध भैरवो रुद्रः शूलमादाय भीषणम् ॥ १३३ ॥इसके बाद उस दैत्यने अन्धक नामवाले हजारों दैत्योंको उत्पन्न किया। उन अन्धक नामवाले दैत्योंने नन्दिषेण आदि (गणों)-को पराजित कर दिया। घण्टाकर्ण, मेघनाद, चण्डेश, चण्डतापन, विनायक, मेघवाह, सोमनन्दी तथा वैद्युत आदि ये सभी अत्यन्त बलशाली गण दैत्यश्रेष्ठ अन्धकके पास जाकर शूल, शक्ति, ऋष्टि, पर्वतशिखर तथा परशुद्वारा युद्ध करने लगे। अत्यन्त बलवान् दैत्येन्द्रने अपने हाथोंसे उन सभीके दोनों पैरोंको पकड़कर घुमाते हुए उन्हें सौ योजन दूर फेंक दिया। तदनन्तर अन्धकद्वारा उत्पन्न सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें प्रलयकालीन सूर्यके समान वे (दैत्य) भैरवपर टूट पड़े। अत्यन्त भयंकर हाहाकारका शब्द होने लगा। भैरव रुद्र भीषण शूल लेकर युद्ध करने लगे ॥ १२८-१३३ ॥
दृष्ट्वाऽन्धकानां सुबलं दुर्जयं तर्जितो हरः ।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ १३४ ॥<br>सोऽसृजद् भगवान् विष्णुर्देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>देवीपार्श्वस्थितो देवो विनाशायामरद्विषाम् ॥ १३५ ॥अन्धकोंकी सेनाको अजेय देखकर भयभीत हर, विभु, अजन्मा देव वासुदेवकी शरणमें गये। तब देवीके समीपमें स्थित उन देव भगवान् विष्णुने देवताओंके द्वेषियोंका विनाश करनेके लिये श्रेष्ठ सौ देवियोंको उत्पन्न किया ॥ १३४-१३५ ॥
तदान्धकसहस्रं तु देवीभिर्यमसादनम् ।<br>नीतं केशवमाहात्म्याल्लीलयैव रणाजिरे ॥ १३६ ॥<br>दृष्ट्वा पराहतं सैन्यमन्धकोऽपि महासुरः ।<br>पराङ्मुखो रणात् तस्मात् पलायत महाजवः ॥ १३७ ॥तदनन्तर विष्णुकी महिमासे उन देवियोंने सैकड़ों अन्धकोंको उस युद्धस्थलमें खेल-खेलमें ही यमलोक भेज दिया। अपनी सेनाकी पराजय देखकर महान् असुर अन्धक भी युद्धसे विमुख होकर अत्यन्त वेगसे भाग चला ॥ १३६-१३७ ॥
ततः क्रीडां महादेवः कृत्वा द्वादशवार्षिकीम् ।<br>हिताय लोके भक्तानामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १३८ ॥तदनन्तर संसारमें भक्तोंके कल्याणार्थ बारह वर्षतक चलनेवाली लीलाको समाप्तकर महादेव मन्दराचल पर्वतपर चले आये ॥ १३८ ॥
संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 123, कुल 506 में से · BharatKosha