भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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११८ * कूर्मपुराण *


जयादिदेवामरपूजिताङ्घ्रे<br>विभागहीनामलतत्त्वरूप ।<br>त्वमग्निरेको बहुधाभिपूज्यसे<br>वाय्वादिभेदैरखिलात्मरूप ॥ १९०॥हे आदिदेव! देवताओंके द्वारा आपके चरणोंकी पूजा की जाती है, आप विभागरहित, शुद्ध तत्त्वस्वरूप हैं, आपकी जय हो। अद्वितीय अग्निरूप आप वायु आदि भेदोंसे बहुत प्रकारसे पूजित होते हैं और अखिल आत्मरूप हैं।
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>त्वं पश्यसीदं परिपास्यजस्रं<br>त्वमन्तको योगिगणाभिजुष्टः॥ १९१॥<br><br>एकोऽन्तरात्मा बहुधा निविष्टो<br>देहेषु देहादिविशेषहीनः।<br>त्वमात्मशब्दं परमात्मतत्त्वं<br>भवन्तमाहुः शिवमेव केचित्॥ १९२॥सूर्यके समान वर्णवाले पुराणपुरुष! एकमात्र आपको ही तम (मायारूप अन्धकार)-से परे कहा जाता है। आप इस (संसार)-के साक्षी हैं, निरन्तर इसका पालन करते हैं और आप ही संहार करनेवाले हैं। आप योगियोंके समूहोंद्वारा सेवित होते रहते हैं। अद्वितीय, अन्तरात्मारूप आप देह आदि विशेष पदार्थोंसे रहित होते हुए (विभिन्न) देहोंमें अनेक प्रकारसे स्थित रहते हैं। आप आत्मशब्द ('आत्मा' शब्दसे बोध्य) और परमात्मतत्त्व हैं। कुछ लोग आपको ही शिव कहते हैं॥ १९०-१९२॥
त्वमक्षरं ब्रह्म परं पवित्र-<br>मानन्दरूपं प्रणवाभिधानम्।<br>त्वमीश्वरो वेदपदेषु सिद्धः<br>स्वयं प्रभोऽशेषविशेषहीनः॥ १९३॥<br><br>त्वमिन्द्ररूपो वरुणाग्निरूपो<br>हंसः प्राणो मृत्युरन्तोऽसि यज्ञः।<br>प्रजापतिर्भगवानेकरुद्रो<br>नीलग्रीवः स्तूयसे वेदविद्भिः॥ १९४॥<br><br>नारायणस्त्वं जगतामथादिः<br>पितामहस्त्वं प्रपितामहश्च।<br>वेदान्तगुह्योपनिषत्सु गीतः<br>सदाशिवस्त्वं परमेश्वरोऽसि॥ १९५॥हे प्रभो! स्वयं आप आनन्दस्वरूप, परम पवित्र, ओंकार शब्दसे वाच्य, अविनाशी, पर ब्रह्म हैं। आप स्वयं वेदवाक्योंमें 'ईश्वर'-शब्दसे सिद्ध हैं और समस्त विशेष पदार्थोंसे शून्य हैं। आप इन्द्र, वरुण, अग्नि, हंस, प्राण, मृत्यु, अन्त एवं यज्ञ हैं। वेदको जाननेवालोंके द्वारा आपके नीलकण्ठ, एकरुद्र, प्रजापति और भगवत्स्वरूपकी स्तुति की जाती है। आप संसारके आदि और नारायण हैं, आप ही पितामह और प्रपितामह हैं। वेदान्तशास्त्र तथा गुह्य उपनिषदोंमें आप ही सदाशिव और परमेश्वर इस नामसे वर्णित हैं॥ १९३-१९५॥
नमः परस्तात् तमसः परस्मै<br>परात्मने पञ्चपदान्तराय।<br>त्रिशक्त्यतीताय निरञ्जनाय<br>सहस्रशक्त्यासनसंस्थिताय ॥ १९६॥तमोगुणसे परे, परम परमात्मा, पञ्चपदान्तरस्वरूप, ब्राह्मी, वैष्णवी एवं शाक्त—तीनों शक्तियोंसे अतीत, निरञ्जन और सहस्रशक्तिरूप आसनपर विराजमान रहनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है॥ १९६॥
त्रिमूर्तयेऽनन्तपदात्ममूर्ते<br>जगन्निवासाय जगन्मयाय।<br>नमो ललाटार्पितलोचनाय<br>नमो जनानां हृदि संस्थिताय॥ १९७॥<br><br>फणीन्द्रहाराय नमोऽस्तु तुभ्यं<br>मुनीन्द्रसिद्धाचितपादयुग्म ।ब्रह्मा-विष्णु एवं शिव—इन त्रिमूर्तिरूप, अनन्त पदात्मक, आत्ममूर्ति, जगन्निवास और जगन्मयको नमस्कार है। ललाटमें नेत्र धारण करनेवाले तथा लोगोंके हृदयमें स्थित आपको नमस्कार है। मुनीन्द्रों तथा सिद्धोंद्वारा जिनके चरणकमलोंकी पूजा की जाती है, ऐसे नागराजोंकी माला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ १९७½ ॥