संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १५ * | १९१ ---|---
| ऐश्वर्यधर्मासनसंस्थिताय<br> नमः परान्ताय भवोद्भवाय ॥ १९८ ॥<br>सहस्रचन्द्रार्कविलोचनाय<br> नमोऽस्तु ते सोम सुमध्यमाय ।<br>नमोऽस्तु ते देव हिरण्यबाहो<br> नमोऽम्बिकायाः पतये मृडाय ॥ १९९ ॥<br>नमोऽतिगुह्याय गुहान्तराय<br> वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताय ।<br>त्रिकालहीनामलधामधाम्ने<br> नमो महेशाय नमः शिवाय ॥ २०० ॥ | ऐश्वर्यमय धर्मके आसनपर विराजमान रहनेवाले, परमोत्कृष्ट एवं संसारको उत्पन्न करनेवाले आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रमा और सूर्योंके समान नेत्रवाले तथा सुन्दर मध्यभागवाले सोमस्वरूप आपको नमस्कार है। हिरण्यबाहो ! देव ! आपको नमस्कार है। अम्बिकाके पति मृड ! आपको नमस्कार है। अत्यन्त गुह्य, गुहान्तर, वेदान्तरूपी विज्ञानके द्वारा निश्चित किये गये तीनों कालोंके प्रभावसे रहित, शुद्ध तेजोमय स्थानवाले महेशको नमस्कार है, शिवको नमस्कार है॥ १९८–२००॥ |
| एवं स्तुवन्तं भगवान् शूलाग्रादवरोप्य तम् ।<br>तुष्टः प्रोवाच हस्ताभ्यां स्पृष्ट्वाथ परमेश्वरः ॥ २०१ ॥<br><br>प्रीतोऽहं सर्वथा दैत्य स्तवेनानेन साम्प्रतम् ।<br>सम्प्राप्य गाणपत्यं मे संनिधाने वसामरः ॥ २०२ ॥<br><br>अरोगश्छिन्नसंदेहो देवैरपि सुपूजितः ।<br>नन्दीश्वरस्यानुचरः सर्वदुःखविवर्जितः ॥ २०३ ॥ | इस प्रकार स्तुति कर रहे उस (अन्धक)-को प्रसन्न होकर भगवान् परमेश्वरने त्रिशूलके अग्रभागसे उतारा और हाथोंसे स्पर्श करते हुए कहा—दैत्य! इस समय तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम गणपति-पद प्राप्तकर अमर होकर मेरे समीपमें निवास करो। तुम रोगोंसे रहित, संदेहशून्य, सभी दुःखोंसे रहित और नन्दीश्वरके अनुचर होकर देवताओंके द्वारा भलीभाँति पूजित होओगे॥ २०१–२०३ ॥ |
| एवं व्याहृतमात्रे तु देवदेवेन देवताः ।<br>गणेश्वरा महादेवमन्धकं देवसंनिधौ ॥ २०४ ॥<br><br>सहस्रसूर्यसंकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रचिह्नितम् ।<br>नीलकण्ठं जटामौलिं शूलासक्तमहाकरम् ॥ २०५ ॥<br><br>दृष्ट्वा तं तुष्टुवुर्दैत्यमाश्चर्यं परमं गताः ।<br>उवाच भगवान् विष्णुर्देवदेवं स्मयन्निव ॥ २०६ ॥ | देवताओंके भी देव (शंकर)-के इतना कहते ही हजारों सूर्यके समान प्रकाशमान, त्रिनेत्रधारी, चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित, नीलकण्ठ, जटा-मुकुटधारी, विशाल भुजामें त्रिशूल धारण किये तथा महादेवरूपमें विद्यमान उस अन्धक दैत्यको देव शंकरके समीपमें स्थित देखकर देवता तथा गणेश्वर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये और उसकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने हँसते हुए देवाधिदेव शिवसे कहा— ॥ २०४–२०६ ॥ |
| स्थाने तव महादेव प्रभावः पुरुषो महान् ।<br>नेक्षतेऽज्ञानजान् दोषान् गृह्णाति च गुणानपि ॥ २०७॥ | महादेव ! आपने उचित ही प्रभाव दिखलाया। महान् पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न दोषोंको नहीं देखते और गुणोंको ही ग्रहण करते हैं। |
| इतीरितोऽथ भैरवो गणेशदेवपुङ्गवैः ।<br>सकेशवः सहानुधको जगाम शंकरान्तिकम् ॥ २०८ ॥<br>निरीक्ष्य देवमागतं स शंकरः सहानुधकम् ।<br>समाधवं समातृकं जगाम निर्वृतिं हरः ॥ २०९ ॥<br>प्रगृह्य पाणिनेश्वरो हिरण्यलोचनात्मजम् ।<br>जगाम यत्र शैलजा विमानमीशवल्लभा ॥ २१० ॥ | इतना कहे जानेके बाद गणेश्वरों, श्रेष्ठ देवों, केशव तथा अन्धकके साथ भैरव शंकरके पास गये। अन्धक, विष्णु तथा मातृकाओंके साथ देव (भैरव)-को आया देखकर उन कल्याणकारी हरको परम शान्ति प्राप्त हुई। हिरण्याक्षके पुत्र (अन्धक)-का हाथ पकड़कर ईश्वर (शंकर) वहाँ गये, जहाँ शंकरप्रिया पार्वती विमानपर बैठी हुई थीं ॥ २०७–२१० ॥ |