भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२० * कूर्मपुराण *


विलोक्य सा समागतं भवं भवार्तिहारिणम्।
अवाप सान्धकं सुखं प्रसादमन्धकं प्रति ॥ २११ ॥

अथान्धको महेश्वरीं ददर्श देवपार्श्वगाम्।
पपात दण्डवत् क्षितौ ननाम पादपद्मयोः ॥ २१२ ॥

संसारके दुःखोंका हरण करनेवाले भव (शंकर)-को अन्धकके साथ आया देखकर उन्हें सुख प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अन्धकपर कृपा की। अन्धक शंकरके पार्श्वभागमें स्थित महेश्वरीको देखा। वह पृथ्वीपर दण्डके समान गिर गया और देवीके चरणकमलोंमें प्रणाम किया॥ २११-२१२॥


नमामि देववल्लभामनादिमद्रिजामिमाम्।
यतः प्रधानपूरुषौ निहन्ति याखिलं जगत् ॥ २१३ ॥

विभाति या शिवासने शिवेन साकमव्यया।
हिरण्मयेऽतिनिर्मले नमामि तामिमामजाम् ॥ २१४ ॥

यदन्तराखिलं जगज्जगन्ति यान्ति संक्षयम्।
नमामि यत्र तामुमामशेषभेदवर्जिताम् ॥ २१५ ॥

न जायते न हीयते न वर्धते च तामुमाम्।
नमामि या गुणातिगा गिरीशपुत्रिकामिमाम् ॥ २१६ ॥

क्षमस्व देवि शैलजे कृतं मया विमोहतः।
सुरासुरैर्यदर्चितं नमामि ते पदाम्बुजम् ॥ २१७ ॥

जिनसे प्रधान (प्रकृति) और पुरुष उत्पन्न हुए हैं और जो सम्पूर्ण विश्वका संहार करनेवाली हैं, उन अनादि शंकरप्रिया अद्रितनया (पर्वतपुत्री)-को मैं प्रणाम करता हूँ। जो अति निर्मल, हिरण्मय, मंगलकारी आसनपर भगवान् शिवके साथ सुशोभित होती हैं, उन अव्यय और अजन्माको मैं नमस्कार करता हूँ। सभी भेदोंसे रहित उन उमाको मैं प्रणाम करता हूँ, जिनके भीतर सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है और विनाशको प्राप्त होता रहता है। जो न उत्पन्न होती हैं, न विनाशको प्राप्त होती हैं और न बढ़ती ही हैं, उन गुणातीत हिमालयकी पुत्री उमाको मैं नमस्कार करता हूँ। देवि! शैलपुत्रि! मैंने मोहित होकर जो किया उसके लिये आप मुझे क्षमा करें। देवताओं तथा असुरोंसे पूजित आपके चरणकमलोंको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २१३-२१७॥


इत्थं भगवती गौरी भक्तिनम्रेण पार्वती।
संस्तुता दैत्यपतिना पुत्रत्वे जगृहेऽन्धकम् ॥ २१८ ॥

भक्तिसे विनम्र हुए दैत्यपतिके इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवती गौरी पार्वती ने उस अन्धकको पुत्ररूपमें स्वीकार किया॥ २१८॥


ततः स मातृभिः सार्धं भैरवो रुद्रसम्भवः।
जगामानुज्ञया शम्भोः पातालं परमेश्वरः ॥ २१९ ॥

यत्र सा तामसी विष्णोर्मूर्तिः संहारकारिका।
समास्ते हरिरव्यक्तो नृसिंहाकृतिरीश्वरः ॥ २२० ॥

ततोऽनन्ताकृतिः शम्भुः शेषेणापि सुपूजितः।
कालाग्निरुद्रो भगवान् युयोजात्मानमात्मनि ॥ २२१ ॥

युञ्जतस्तस्य देवस्य सर्वा एवाथ मातरः।
बुभुक्षिता महादेवं प्रणम्याहुस्त्रिशूलिनम् ॥ २२२ ॥

तदनन्तर रुद्रसे उत्पन्न परमेश्वर भैरव शम्भुकी आज्ञासे मातृकाओंके साथ पाताल गये। जहाँ विष्णुकी संहारकारिणी तामसी मूर्तिके रूपमें नृसिंहाकृति ईश्वर अव्यक्त हरि स्थित हैं। तदनन्तर शेषसे भी पूजित कालाग्नि रुद्र अनन्ताकृति भगवान् शम्भुने स्वयंको परमात्मतत्त्वसे संयुक्त कर दिया। उन देवके (परमात्मासे) संयोग करते समय सभी बुभुक्षित मातृकाओंने त्रिशूलधारी महादेवको प्रणामकर कहा— ॥ २१९-२२२॥


मातर ऊचुः
बुभुक्षिता महादेव अनुज्ञा दीयतां त्वया।
त्रैलोक्यं भक्षयिष्यामो नान्यथा तृप्तिरस्ति नः ॥ २२३ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं मातरो विष्णुसम्भवाः।
भक्षयाञ्चक्रिरे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २२४ ॥

मातृकाओंने कहा— महादेव! हम भूखी हैं। आप आज्ञा दें, हम तीनों लोकोंका भक्षण करेंगी, हमारी और किसी प्रकारसे तृप्ति नहीं होगी। इतनी बात कहकर विष्णुसे उत्पन्न वे मातृकाएँ चराचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीका भक्षण करने लगीं॥ २२३-२२४॥


ततः स भैरवो देवो नृसिंहवपुषं हरिम्।
दध्यौ नारायणं देवं क्षणात् प्रादुरभूद्धरिः ॥ २२५ ॥

तब उन भैरवदेवने नृसिंह-शरीरधारी नारायण-देव हरिका ध्यान किया। हरि क्षणभरमें ही प्रकट हो गये॥ २२५॥

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