संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १५ * | १२१ ---|---
विज्ञापयामास च तं भक्षयन्तीह मातरः।
निवारयाशु त्रैलोक्यं त्वदीया भगवन्निति ॥ २२६ ॥
संस्मृता विष्णुना देव्यो नृसिंहवपुषा पुनः।
उपस्थुर्महादेवं नरसिंहाकृतिं च तम् ॥ २२७ ॥
सम्प्राप्य संनिधिं विष्णोः सर्वाः संहारकारिकाः।
प्रददुः शम्भवे शक्तिं भैरवायातितेजसे ॥ २२८ ॥
अपश्यंस्ता जगत्सूतिं नृसिंहमथ भैरवम्।
क्षणादेकत्वमापन्नं शेषाहिं चापि मातरः ॥ २२९ ॥
व्याजहार हृषीकेशो ये भक्ताः शूलपाणिनः।
ये च मां संस्मरन्तीह पालनीयाः प्रयत्नतः ॥ २३० ॥
ममैव मूर्तिरतुला सर्वसंहारकारिका।
महेश्वरांशसम्भूता भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वियम् ॥ २३१ ॥
अनन्तो भगवान् कालो द्विधावस्था ममैव तु।
तामसी राजसी मूर्तिर्देवदेवश्चतुर्मुखः ॥ २३२ ॥
सोऽयं देवो दुराधर्षः कालो लोकप्रकालनः।
भक्षयिष्यति कल्पान्ते रुद्रात्मा निखिलं जगत् ॥ २३३ ॥
या सा विमोहिका मूर्तिर्मम नारायणाह्वया।
सत्त्वोद्रिक्ता जगत् कृत्स्नं संस्थापयति नित्यदा ॥ २३४ ॥
स हि विष्णुः परं ब्रह्म परमात्मा परा गतिः।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सदानन्देति कथ्यते ॥ २३५ ॥
इत्येवं बोधिता देव्यो विष्णुना विश्वमातरः।
प्रपेदिरे महादेवं तमेव शरणं हरिम् ॥ २३६ ॥
एतद्वः कथितं सर्वं मयान्धकनिबर्हणम्।
माहात्म्यं देवदेवस्य भैरवस्यामितौजसः ॥ २३७ ॥
| (भैरवदेवने) उन्हें बतलाते हुए कहा—भगवन्! आपकी ये मातृकाएँ त्रिलोकीका भक्षण कर रही हैं, इन्हें आप शीघ्र ही रोकें॥ २२६॥
| नरसिंह-शरीरधारी विष्णुके द्वारा पुनः उन देवियोंका स्मरण किये जानेपर वे उन नरसंहरूपवाले महादेवके पास आ पहुँचीं। संहार करनेवाली उन सभी शक्तियोंने विष्णुके समीप आकर भैरवरूपधारी अति तेजस्वी शम्भुको शक्ति प्रदान कर दी॥ २२७-२२८॥
| उन मातृकाओँने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नृसिंह, भैरव तथा शेषनागको क्षणभरमें ही एक होते हुए देखा। हृषीकेशने कहा—शूलपाणि भगवान् शंकरके जो भक्त हैं और जो मेरा स्मरण करते हैं, प्रयत्न-पूर्वक उनका यहाँ पालन करना चाहिये। महेश्वरके अंशसे उत्पन्न, सबका संहार करनेवाली यह मेरी ही अतुलनीय मूर्ति है। यह भुक्ति और मुक्तिको प्रदान करनेवाली है॥ २२९—२३१॥
| भगवान् अनन्त और काल मेरी ही दो प्रकारकी तामसी अवस्थाएँ हैं। देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्मा मेरी राजसी मूर्ति हैं। वे ही ये संसारका संहार करनेवाले दुर्धर्ष कालदेव हैं। कल्पका अन्त होनेपर ये रुद्रात्मा सम्पूर्ण विश्वका भक्षण करेंगे। सबको मोहित करनेवाली सत्त्वगुणसम्पन्ना मेरी 'नारायण' इस नामवाली जो मूर्ति है, वह नित्य समस्त संसारकी स्थापना करती है। (मेरी) उस (मूर्ति)-को विष्णु, परम ब्रह्म, परमात्मा, परमगति, मूलप्रकृति, अव्यक्त और सदानन्द—इस प्रकारसे कहा जाता है। विष्णुके द्वारा इस प्रकार समझानेपर देवीरूप उन सभी मातृकाओँने उन्हीं महादेव हरिकी शरण ग्रहण की॥ २३२—२३६॥
| मैंने आप लोगोंसे अन्धकके विनाश और अमित ओजस्वी देवाधिदेव भैरवके माहात्म्यका सम्पूर्ण वर्णन किया॥ २३७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १५॥