भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२२ * कूर्मपुराण *


सोलहवाँ अध्याय

सनत्कुमारद्वारा आत्मज्ञान प्राप्तकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचनका योगमें संलग्न होना, विरोचन-पुत्र बलिद्वारा देवताओंको पराजित करना, देवमाता अदितिका दुःखी होना तथा विष्णुसे प्रार्थनाकर पुत्ररूपमें उनके उत्पन्न होनेका वर प्राप्त करना, अदितिके गर्भमें विष्णुका प्रवेश, विष्णुका वामनरूपमें आविर्भाव, बलिके यज्ञमें वामनका प्रवेश तथा तीन पग भूमिकी याचना, तीसरे पगसे नापते समय ब्रह्माण्ड-भेदन, गङ्गाकी उत्पत्ति तथा भक्तिका वर प्राप्तकर बलि आदिका पातालमें प्रवेश


श्रीकूर्म उवाचश्रीकूर्मने कहा— प्राचीन कालमें अन्धकके निगृहीत हो जानेपर महात्मा प्रह्लादका विरोचन नामका पुत्र राजा बना। उस महान् असुरने देवेन्द्रसहित देवताओंको जीतकर धर्मपूर्वक चराचर त्रिलोकीका बहुत वर्षोंतक पालन किया। उसके इस प्रकार रहते हुए एक बार कभी विष्णुसे प्रेरित होकर महामुनि भगवान् सनत्कुमार उसके नगरमें आये। सिंहासनपर बैठे हुए उस महान् असुरने ब्रह्माजीके पुत्र (सनत्कुमार)-को देखकर (आसनसे) उठकर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर यह वाक्य कहा—॥ १-४ ॥
अन्धके निगृहीते वै प्रह्लादस्य महात्मनः।<br>विरोचनो नाम सुतो बभूव नृपतिः पुरा॥ १ ॥<br>देवाञ्जित्वा सदेवेन्द्रान् बहून् वर्षान् महासुरः।<br>पालयामास धर्मेण त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ २ ॥<br>तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचिद् विष्णुचोदितः।<br>सनत्कुमारो भगवान् पुरं प्राप महामुनिः॥ ३ ॥<br>दृष्ट्वा सिंहासनगतो ब्रह्मपुत्रं महासुरः।<br>ननामोत्थाय शिरसा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ४ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सम्प्राप्तो मे पुरातनः।<br>योगीश्वरोऽद्य भगवान् यतोऽसौ ब्रह्मवित् स्वयम्॥ ५ ॥आज मैं धन्य हुआ, कृतार्थ हुआ जो ये ब्रह्मज्ञानी, पुरातन योगीश्वर भगवान् स्वयं यहाँ आ गये हैं। हे ब्रह्मन्! देवस्वरूप पितामह ब्रह्माजीके पुत्र! आप किस प्रयोजनसे यहाँ आये हैं, मुझे बतलायें। मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ॥ ५-६ ॥
किमर्थमागतो ब्रह्मन् स्वयं देवः पितामहः।<br>ब्रूहि मे ब्रह्मणः पुत्र किं कार्यं करवाण्यहम्॥ ६ ॥
सोऽब्रवीद् भगवान् देवो धर्मयुक्तं महासुरम्।<br>द्रष्टुमभ्यागतोऽहं वै भवन्तं भाग्यवानसि॥ ७ ॥वे भगवान् देव धर्मात्मा महासुर (विरोचन)-से बोले—मैं आपको ही देखने आया हूँ, आप भाग्यशाली हैं। दैत्यश्रेष्ठ! दैत्योंके लिये यह (धार्मिक) नीति अत्यन्त दुर्लभ है। निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान कोई दूसरा धार्मिक नहीं है। ऐसा कहे जानेपर असुरराज (विरोचन)-ने उन महामुनिसे पुनः कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वश्रेष्ठ! आप मुझे धर्मोंमें जो श्रेष्ठ धर्म हो, उसे बतलायें। उन भगवान् योगीने महात्मा दैत्येन्द्रको आत्मज्ञानरूपी और सब प्रकारसे अत्यन्त रहस्यमय श्रेष्ठ धर्म बतलाया॥ ७—१० ॥
सुदुर्लभा नीतिरेषा दैत्यानां दैत्यसत्तम।<br>त्रिलोके धार्मिको नूनं त्वादृशोऽन्यो न विद्यते॥ ८ ॥
इत्युक्तोऽसुरराजस्तं पुनः प्राह महामुनिम्।<br>धर्माणं परमं धर्मं ब्रूहि मे ब्रह्मवित्तम॥ ९ ॥
सोऽब्रवीद् भगवान् योगी दैत्येन्द्राय महात्मने।<br>सर्वगुह्यतमं धर्ममात्मज्ञानमनुत्तमम्॥ १०॥
स लब्ध्वा परमं ज्ञानं दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>निधाय पुत्रे तद्राज्यं योगाभ्यासरतोऽभवत्॥ ११॥उन्होंने (महात्मा विरोचनने) परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हें (सनत्कुमारको) गुरुदक्षिणा प्रदान की तथा राज्य अपने पुत्र (बलि)-को सौंपकर वे योगाभ्यासमें निरत हो गये॥ ११॥