संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय १६ * | १२३ |
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| स तस्य पुत्रो मतिमान् बलिर्नाम महासुरः।<br>ब्रह्मण्यो धार्मिकोऽत्यर्थं विजिग्येऽथ पुरंदरम् ॥ १२ ॥<br><br>कृत्वा तेन महद् युद्धं शक्रः सर्व्वामरैर्वृतः।<br>जगाम निर्जितो विष्णुं देवं शरणमच्युतम् ॥ १३ ॥<br><br>तदन्तरेऽदितिर्देवी देवमाता सुदुःखिता।<br>दैत्येन्द्राणां वधार्थाय पुत्रो मे स्यादिति स्वयम् ॥ १४ ॥<br><br>तताप सुमहद् घोरं तपोराशिस्तपः परम्।<br>प्रपन्ना विष्णुमव्यक्तं शरण्यं शरणं हरिम् ॥ १५ ॥<br><br>कृत्वा हृत्पद्मकिञ्जल्के निष्कलं परमं पदम्।<br>वासुदेवमनाद्यन्तमानन्दं व्योम केवलम् ॥ १६ ॥<br><br>प्रसन्नो भगवान् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>आविर्बभूव योगात्मा देवमातुः पुरो हरिः ॥ १७ ॥<br><br>दृष्ट्वा समागतं विष्णुमदितिर्भक्तिसंयुता।<br>मेने कृतार्थमात्मानं तोषयामास केशवम् ॥ १८ ॥ | उनका वह बलि नामक महान् असुर पुत्र बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा अत्यन्त धार्मिक था। महान् अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये उसने इन्द्रको भी जीत लिया था। सभी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उसके साथ महान् युद्ध करते हुए पराजित होकर अच्युत विष्णुदेवकी शरण ग्रहण की ॥ १२-१३ ॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त दुःखी होकर देवताओंकी माता तपोराशि, परम तपोरूप देवी अदितिने दैत्येन्द्रोंके वधके लिये 'स्वयं भगवान् ही मेरे पुत्र हों' इस संकल्पको लेकर अत्यन्त महान् कठोर तप किया। अपने हृदयरूपी कमलकलिकामें निष्कल, परम पद, अनादि, अनन्त, आनन्दस्वरूप, व्योममय, अद्वितीय वासुदेवका ध्यान करती हुई वे शरणागतवत्सल अव्यक्त, हरि विष्णुकी शरणमें गयीं। प्रसन्न होकर शङ्ख-चक्र तथा गदा धारण करनेवाले योगात्मा हरि भगवान् विष्णु देवमाता (अदिति)-के समक्ष प्रकट हो गये। विष्णुको सामने देखकर भक्तिपरायणा अदितिने अपनेको कृतार्थ माना और वे केशवको स्तुतिसे प्रसन्न करने लगीं ॥ १४-१८ ॥ |
| अदितिरुवाच | अदितिने कहा— समस्त दुःखसमूहोंके नाश करनेके लिये एकमात्र कारणरूप आपकी जय हो। अनन्त माहात्म्य-सम्पन्न तथा योगाभियुक्त ! (योगमें प्रतिक्षण निरत) आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तसे रहित विज्ञानमूर्ते ! आपकी जय हो। अशेषकल्प (जिनमें किसी भी प्रकारके विषयका विराम नहीं है) तथा विशुद्ध आनन्दस्वरूप ! आपकी जय हो। कालस्वरूप विष्णु ! आपको नमस्कार है। नरसिंहरूपधारी शेष ! आपको नमस्कार है। संहार करनेवाले कालरुद्रको नमस्कार है। वासुदेव ! आपको बार-बार नमस्कार है। विश्वरूपी मायाका विधान करनेवाले ! आपको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्य सत्यरूप ! आपको नमस्कार है। धर्म एवं ज्ञाननिष्ठ ! आपको नमस्कार है। हे वराहरूप ! आपको बार-बार नमस्कार है। हजारों सूर्य और चन्द्रमाकी आभाके समान प्रकाशयुक्त मूर्तिवाले ! आपको नमस्कार है। वेदोंमें प्रतिपादित विशिष्ट ज्ञान और धर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले ! आपको नमस्कार है। देवदेवादिदेव आदिदेव ! आपको नमस्कार है। प्रभो ! आप विश्वके योनिरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ १९-२२ ॥ |
| जयाशेषदुःखौघनाशैकहेतो<br> जयानन्तमाहात्म्ययोगाभियुक्त ।<br>जयानादिमध्यान्तविज्ञानमूर्ते<br> जयाशेषकल्पामलानन्दरूप ॥ १९ ॥<br><br>नमो विष्णवे कालरूपाय तुभ्यं<br> नमो नारसिंहाय शेषाय तुभ्यम्।<br>नमः कालरुद्राय संहारकर्त्रे<br> नमो वासुदेवाय तुभ्यं नमस्ते ॥ २० ॥<br><br>नमो विश्वमायाविधानाय तुभ्यं<br> नमो योगगम्याय सत्याय तुभ्यम्।<br>नमो धर्मविज्ञाननिष्ठाय तुभ्यं<br> नमस्ते वराहाय भूयो नमस्ते ॥ २१ ॥<br><br>नमस्ते सहस्रार्कचन्द्राभमूर्ते<br> नमो वेदविज्ञानधर्माभिगम्य।<br>नमो देवदेवादिदेवादिदेव<br> प्रभो विश्वयोनेऽथ भूयो नमस्ते ॥ २२ ॥ |