संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ * कूर्मपुराण *
| नमः शम्भवे सत्यनिष्ठाय तुभ्यं<br>नमो हेतवे विश्वरूपाय तुभ्यम्।<br>नमो योगपीठान्तरस्थाय तुभ्यं<br>शिवायैकरूपाय भूयो नमस्ते ॥ २३ ॥ | सत्यनिष्ठ शम्भो ! आपको नमस्कार है। कारणरूप ! विश्वरूप ! आपको नमस्कार है। योगपीठके मध्यमें विराजमान रहनेवाले ! आपको नमस्कार है। हे एकरूप शिव ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २३ ॥ | | एवं स भगवान् कृष्णो देवमात्रा जगन्मयः।<br>तोषिताश्छन्दयामास वरेण प्रहसन्निव ॥ २४ ॥ | देवमाता (अदिति)-के द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर जगन्मय उन भगवान् कृष्ण-(विष्णु)-ने किंचित् हँसते हुए वर माँगनेके लिये कहा ॥ २४ ॥ | | प्रणम्य शिरसा भूमौ सा वव्रे वरमुत्तमम्।<br>त्वामेव पुत्रं देवानां हिताय वरये वरम् ॥ २५ ॥ | सिरसे भूमिमें प्रणाम करते हुए तथा श्रेष्ठ वर माँगते हुए उसने (अदितिने) कहा—मैं देवताओंके कल्याणके लिये आपको ही पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगती हूँ। शरणागतवत्सल अप्रमेय भगवान् 'ऐसा ही हो' इतना कहकर तथा वरोंको प्रदानकर वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ २५-२६ ॥ | | तथास्त्वित्याह भगवान् प्रपन्नजनवत्सलः।<br>दत्त्वा वरानप्रमेयस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥<br>ततो बहुतिथे काले भगवन्तं जनार्दनम्।<br>दधार गर्भं देवानां माता नारायणं स्वयम् ॥ २७ ॥<br>समाविष्टे हृषीकेशे देवमातुरथोदरम्।<br>उत्पाता जज्ञिरे घोरा बलेर्वैरोचनेः पुरे ॥ २८ ॥<br>निरीक्ष्य सर्वानुत्पातान् दैत्येन्द्रो भयविह्वलः।<br>प्रह्रादमसुरं वृद्धं प्रणम्याह पितामहम् ॥ २९ ॥ | तदनन्तर बहुत समय बीतनेके पश्चात् देवताओंकी माता (अदिति)-ने साक्षात् नारायण भगवान् जनार्दनको गर्भमें धारण किया। देवमाताके उदरमें हृषीकेशके प्रविष्ट होते ही विरोचनपुत्र बलिके नगरमें भयंकर उत्पात होने लगे। सभी उपद्रवोंको देखकर भयसे विह्वल हुआ दैत्यराज (बलि) वृद्ध पितामह असुर प्रह्लादको प्रणामकर कहने लगा— ॥ २७–२९ ॥ | | बलिरुवाच<br>पितामह महाप्राज्ञ जायन्तेऽस्मत्पुरेऽधुना।<br>किमुत्पाता भवेत् कार्यमस्माकं किंनिमित्तकाः ॥ ३० ॥<br>निशम्य तस्य वचनं चिरं ध्यात्वा महासुरः।<br>नमस्कृत्य हृषीकेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३१ ॥ | बलिने कहा—महाप्राज्ञ पितामह ! हमारे नगरमें इस समय ये उत्पात क्यों हो रहे हैं, इनका कारण क्या है? हमें क्या करना चाहिये ? उसकी बात सुनकर महासुर (प्रह्लाद)-ने देरतक ध्यान किया और फिर हृषीकेशको नमस्कार करके यह वचन कहा— ॥ ३०-३१ ॥ | | प्रह्राद उवाच<br>यो यज्ञैरिज्यते विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत्।<br>दधारासुरनाशार्थं माता तं त्रिदिवौकसाम् ॥ ३२ ॥<br>यस्मादभिन्नं सकलं भिद्यते योऽखिलादपि।<br>स वासुदेवो देवानां मातृदेहं समाविशत् ॥ ३३ ॥<br>न यस्य देवा जानन्ति स्वरूपं परमार्थतः।<br>स विष्णुरदितेर्देहं स्वेच्छयाऽद्य समाविशत् ॥ ३४ ॥ | प्रह्लाद बोले—यज्ञोंद्वारा जिन विष्णुका यजन किया जाता है और यह सम्पूर्ण विश्व जिनका (स्वरूप) है, देवताओंकी माता (अदिति)-ने उन्हें ही असुरोंके विनाशके लिये (गर्भमें) धारण किया है। समस्त विश्व जिनसे अभिन्न है और जो समस्त विश्वसे भिन्न भी है, उन वासुदेवने देवताओंकी माताके शरीरमें प्रवेश किया है। देवता भी जिनके स्वरूपको यथार्थतः नहीं जानते वे विष्णु ही इस समय अपनी इच्छासे अदितिके देहमें प्रविष्ट हुए हैं ॥ ३२–३४ ॥ | | यस्माद् भवन्ति भूतानि यत्र संयान्ति संक्षयम्।<br>सोऽवतीर्णो महायोगी पुराणपुरुषो हरिः ॥ ३५ ॥ | जिनसे सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और जहाँ नाशको प्राप्त होते हैं वे महायोगी पुराणपुरुष हरि अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३५ ॥ |