भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १६ * । १२५

न यत्र विद्यते नामजात्यादिपरिकल्पना।<br>सत्तामात्रात्मरूपोऽसौ विष्णुरंशेन जायते॥ ३६॥<br><br>यस्य सा जगतां माता शक्तिस्तद्धर्मधारिणी।<br>माया भगवती लक्ष्मीः सोऽवतीर्णो जनार्दनः॥ ३७॥<br><br>यस्य सा तामसी मूर्तिः शंकरो राजसी तनुः।<br>ब्रह्मा संजायते विष्णुरंशेनैकेन सत्त्वभृत्॥ ३८॥जिनमें नाम, जाति आदिकी परिकल्पना नहीं होती, सत्तामात्रसे व्याप्त रहनेवाले आत्मरूप वे ही विष्णु अपने अंशरूपसे प्रकट हो रहे हैं। जगत्की मातृरूपा और उसके (जगत्के) धर्मको धारण करनेवाली, भगवती लक्ष्मी जिनकी मायारूपी शक्ति हैं, वे जनार्दन ही अवतीर्ण हुए हैं। जिनकी तामसी मूर्ति शंकर हैं और राजसी मूर्ति ब्रह्मा हैं वे सत्त्वगुणको धारण करनेवाले विष्णु ही अपने एक अंशसे प्रकट हो रहे हैं॥ ३६-३८॥
इत्थं विचिन्त्य गोविन्दं भक्तिनम्रेण चेतसा।<br>तमेव गच्छ शरणं ततो यास्यसि निर्वृतिम्॥ ३९॥<br><br>ततः प्रह्लादवचनाद् बलिवैरोचनिर्हरिम्।<br>जगाम शरणं विश्वं पालयामास धर्मतः॥ ४०॥गोविन्दको इस प्रकार समझकर भक्तिसे विनम्र-चित्त हो उन्हींकी शरणमें जाओ, इससे तुम शान्ति प्राप्त करोगे। तब प्रह्लादके वचनसे विरोचनपुत्र बलि हरिकी शरण ग्रहण करता हुआ धर्मपूर्वक विश्वका पालन करने लगा॥ ३९-४०॥
काले प्राप्ते महाविष्णुं देवानां हर्षवर्धनम्।<br>असूत कश्यपाच्चैनं देवमातादितिः स्वयम्॥ ४१॥<br><br>चतुर्भुजं विशालाक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्।<br>नीलमेघप्रतीकाशं भ्राजमानं श्रियावृतम्॥ ४२॥<br><br>उपतस्थुः सुराः सर्वे सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>उपेन्द्रमिन्द्रप्रमुखा ब्रह्मा चर्षिगणैर्वृतः॥ ४३॥<br><br>कृतोपनयनो वेदानध्यैष्ट भगवान् हरिः।<br>समाचारं भरद्वाजात् त्रिलोकाय प्रदर्शयन्॥ ४४॥समय आनेपर कश्यपसे स्वयं देवमाता अदितिने देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाले उन महाविष्णुको जन्म दिया। वे (भगवान् विष्णु) चार भुजावाले, विशाल नेत्रवाले, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, नीले मेघके समान, शोभासे व्याप्त एवं प्रकाशमान थे। सभी देवता, सिद्ध, साध्य, चारण तथा प्रधान इन्द्र, उपेन्द्र और ऋषिगणोंसे आवृत्त ब्रह्मा उनके समीपमें गये। उपनयन (यज्ञोपवीत-संस्कार) हो जानेके बाद भगवान् हरिने तीनों लोकोंको प्रदर्शित करते हुए भरद्वाजसे वेदों और सदाचारका अध्ययन किया॥ ४१-४४॥
एवं हि लौकिकं मार्गं दर्शयति स प्रभुः।<br>स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ४५॥<br><br>ततः कालेन मतिमान् बलिवैरोचनिः स्वयम्।<br>यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्चयामास सर्वगम्॥ ४६॥<br><br>ब्राह्मणान् पूजयामास दत्त्वा बहुतरं धनम्।<br>ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाटं महात्मनः॥ ४७॥<br><br>विज्ञाय विष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचोदितः।<br>आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्॥ ४८॥इस प्रकार वे प्रभु लौकिक (लोक-कल्याणकारी) मार्ग दिखाते हैं। वे जैसा प्रमाण उपस्थित करते हैं, संसार उसीका अनुवर्तन करता है। तदनन्तर समयानुसार विरोचनके पुत्र बुद्धिमान् बलिने यज्ञोंके द्वारा सर्वव्यापी यज्ञेश्वर विष्णुकी स्वयं अर्चना की। उसने (दक्षिणारूपमें) बहुत-सा धन देकर ब्राह्मणोंकी पूजा की। उस महात्माके यज्ञस्थलमें ब्रह्मर्षि आये। (यज्ञ हो रहा है ऐसा) जानकर भरद्वाजसे प्रेरणा प्राप्तकर भगवान् विष्णु वामनरूप धारणकर यज्ञदेशमें आये॥ ४५-४८॥
कृष्णाजिनोपवीताङ्ग आषाढेन विराजितः।<br>ब्राह्मणो जटिलो वेदानुद्गिरन् भस्ममण्डितः॥ ४९॥<br><br>सम्प्राप्त्यासुरराजस्य समीपं भिक्षुको हरिः।<br>स्वपादैर्विमितं देशमयाचत बलिं त्रिभिः॥ ५०॥शरीरपर कृष्णमृगका चर्म तथा उपवीत (यज्ञोपवीत-जनेऊ) धारण किये, पलाशके दण्डसे सुशोभित, जटा धारण किये तथा भस्मसे मण्डित वे ब्राह्मण वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए असुरराज बलिके समीप आये। उन भिक्षुक (वेशधारी) हरिने बलिसे अपने तीन पगोंद्वारा नापी गयी भूमिकी याचना की॥ ४९-५०॥