संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१२६ * कूर्मपुराण *
| प्रक्षाल्य चरणौ विष्णोर्बलिर्भावसमन्वितः।<br>आचामयित्वा भृङ्गारमादाय स्वर्णनिर्मितम्॥ ५१॥<br>दास्ये तवेदं भवते पदत्रयं<br>प्रीणातु देवो हरिरव्ययाकृतिः।<br>विचिन्त्य देवस्य कराग्रपल्लवे<br>निपातयामास जलं सुशीतलम्॥ ५२॥<br>विचक्रमे पृथिवीमेष एता-<br>मथान्तरिक्षं दिवमादिदेवः।<br>व्यपेतरागं दितिजेश्वरं तं<br>प्रकर्तुकामः शरणं प्रपन्नम्॥ ५३॥<br>आक्रम्य लोकत्रयमीशपादः<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकं जगाम।<br>प्रणेमुरादित्यसहस्रकल्पं<br>ये तत्र लोके निवसन्ति सिद्धाः॥ ५४॥ | बलिने भावपूर्वक विष्णुके दोनों चरणोंको धोकर स्वर्णनिर्मित भृङ्गार (टोंटीदार पात्र) लेकर उन्हें आचमन कराया और 'मैं आपको आपके ही तीन पगवाली (भूमि) देता हूँ, इससे अव्यय आकृतिवाले देव हरि प्रसन्न हों' ऐसा संकल्पकर उन देवके कराग्रपल्लवपर सुशीतल जल गिराया। शरणमें आये हुए उस दैत्यराजको आसक्तिरहित बनानेकी इच्छासे उन आदिदेवने पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकमें पाद-विक्षेप किया। तीनों लोकोंको आक्रान्तकर ईश्वरका चरण प्रजापतिके लोकसे ब्रह्मलोकमें पहुँचा। उस लोकमें निवास करनेवाले जो सिद्धजन थे, उन्होंने हजारों आदित्यके समान (प्रकाशमान) उस चरणको प्रणाम किया॥ ५१-५४॥ |
| अथोपतस्थे भगवाननादिः<br>पितामहस्तोषयामास विष्णुम्।<br>भित्त्वा तदण्डस्य कपालमूर्ध्वं<br>जगाम दिव्यावरणानि भूयः॥ ५५॥<br>अथाण्डभेदात्निपपात शीतलं<br>महाजलं तत् पुण्यकृद्भिश्च जुष्टम्।<br>प्रवर्तते चापि सरिद्वरा तदा<br>गङ्गेत्युक्ता ब्रह्मणा व्योमसंस्था॥ ५६॥ | तदनन्तर अनादि भगवान् पितामहने वहाँ उपस्थित होकर विष्णुको प्रसन्न किया। उस ब्रह्माण्डके ऊपरी कपालको भेदकर पुनः वह चरण दिव्य आवरणोंमें चला गया। उस अण्डका भेदन होनेसे पुण्य करनेवालोंद्वारा सेवित वह शीतल महाजल नीचे गिरा। तभीसे आकाशमें स्थित वह नदियोंमें श्रेष्ठ नदी प्रवर्तित हुई जिसे ब्रह्माने 'गङ्गा' नामसे अभिहित किया॥ ५५-५६॥ |
| गत्वा महान्तं प्रकृतिं प्रधानं<br>ब्रह्माणमेकं पुरुषं स्वबीजम्।<br>अतिष्ठदीशस्य पदं तदव्ययं<br>दृष्ट्वा देवास्तत्र तत्र स्तुवन्ति॥ ५७॥<br>आलोक्य तं पुरुषं विश्वकायं<br>महान् बलिर्भक्तियोगेन विष्णुम्।<br>ननाम नारायणमेकमव्ययं<br>स्वचेतसा यं प्रणमन्ति देवाः॥ ५८॥ | ईश्वरका वह चरण महान्, प्रधान, प्रकृति, स्वबीज-स्वरूप अद्वितीय पुरुष ब्रह्मपर्यन्त पहुँचकर स्थित हो गया। उस अव्यय पदका दर्शनकर विभिन्न स्थानोंके देवता स्तुति करने लगे। उन संसाररूपी शरीरवाले पुरुष विष्णुको देखकर महान् बलिने उन अद्वितीय अव्यय नारायणको अपने भक्तिपूरित चित्तसे प्रणाम किया, जिन्हें सभी देवता प्रणाम करते रहते हैं॥ ५७-५८॥ |
| तमब्रवीद् भगवानादिकर्ता<br>भूत्वा पुनर्वामनो वासुदेवः।<br>ममैव दैत्याधिपतेऽधुनेदं<br>लोकत्रयं भवता भावदत्तम्॥ ५९॥ | आदिकर्ता भगवान् वासुदेवने पुनः वामनरूप धारणकर उस (बलि)-से कहा—दैत्याधिपते! इस समय भक्तिपूर्वक आपके द्वारा दिये गये ये तीनों लोक अब मेरे ही हैं॥ ५९॥ |
| प्रणम्य मूर्ध्ना पुनरेव दैत्यो<br>निपातयामास जलं कराग्रे। | दैत्यने पुनः सिरेसे प्रणामकर हाथोंके अग्रभागमें जल गिराया (और कहा—) अनन्तधाम! त्रिविक्रम! |