संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १६ * १२७
| दास्ये त्वात्मानमनन्तधाम्ने<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय ॥ ६०॥<br>प्रगृह्य सूनोरपि सम्प्रदत्तं<br>प्रह्लादसूनोरथ शङ्खपाणिः ।<br>जगाद दैत्यं जगदन्तरात्मा<br>पातालमूलं प्रविशेति भूयः ॥ ६१ ॥<br>समास्यतां भवता तत्र नित्यं<br>भुक्त्वा भोगान् देवतानामलभ्यान् ।<br>ध्यायस्व मां सततं भक्तियोगात्<br>प्रवेक्ष्यसे कल्पदाहे पुनर्माम् ॥ ६२ ॥ | अमित पराक्रमी ! मैं अपने-आपको तुम्हें प्रदान करता हूँ। प्रह्लादके पुत्रके भी पुत्र अर्थात् बलिके द्वारा भलीभाँति दिया हुआ तीनों लोक ग्रहणकर संसारके अन्तरात्मा शङ्खपाणि (भगवान् विष्णु)-ने दैत्यसे पुनः कहा—(अब आप) पातालमूलमें प्रवेश करें। आप वहाँ नित्य रहते हुए देवताओंको भी प्राप्त न होनेवाले भोगोंका उपभोगकर भक्तियोगद्वारा मेरा निरन्तर ध्यान करते रहें। कल्पान्त होनेपर पुनः मुझमें ही (आप) प्रवेश करेंगे ॥ ६०-६२ ॥ |
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| उक्त्वैवं दैत्यसिंहं तं विष्णुः सत्यपराक्रमः ।<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः ॥ ६३ ॥<br><br>संस्तुवन्ति महायोगं सिद्धा देवर्षिकिन्नराः ।<br>ब्रह्मा शक्रोऽथ भगवान् रुद्रादित्यमरुद्गणाः ॥ ६४ ॥ | उस दैत्यश्रेष्ठसे इस प्रकार कहकर सत्यपराक्रम तथा विशाल डगोंवाले विष्णुने तीनों लोक इन्द्रको दे दिये। सिद्ध, देवता, ऋषि, किन्नर, ब्रह्मा, इन्द्र, भगवान् रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण (उन) महायोगीकी स्तुति करने लगे ॥ ६३-६४ ॥ |
| कृत्वैतदद्भुतं कर्म विष्णुर्वामनरूपधृक् ।<br>पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६५ ॥<br><br>सोऽपि दैत्यवरः श्रीमान् पातालं प्राप चोदितः ।<br>प्रह्लादेनासुरवरैर्विष्णुना विष्णुतत्परः ॥ ६६ ॥ | ऐसा अद्भुत कार्य करके वामन-रूप धारण करनेवाले विष्णु सभीके देखते-ही-देखते वहाँ अन्तर्धान हो गये। वह विष्णुपरायण श्रीसम्पन्न दैत्यश्रेष्ठ (बलि) भी विष्णुसे प्रेरित होकर प्रह्लाद एवं अन्य श्रेष्ठ असुरोंके साथ पातालमें चला गया ॥ ६५-६६ ॥ |
| अपृच्छद् विष्णुमाहात्म्यं भक्तियोगमनुत्तमम् ।<br>पूजाविधानं प्रह्लादं तदाहासौ चकार सः ॥ ६७ ॥<br><br>अथ रथचरणासिशङ्खपाणिं<br>सरसिजलोचनमीशमप्रमेयम् ।<br>शरणमुपययौ स भावयोगात्<br>प्रणतगतिं प्रणिधाय कर्मयोगम् ॥ ६८ ॥ | उसने प्रह्लादसे विष्णुका माहात्म्य, श्रेष्ठतम भक्तियोग तथा पूजनका विधान पूछा। तब उनके द्वारा बताये जानेपर उसने वैसा ही किया। तदनन्तर भक्तिपूर्वक कर्मयोगका आचरण कर वह शरणागतोंके आश्रयस्थल, हाथोंमें चक्र, तलवार तथा शंख धारण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले, अप्रमेय ईश्वरकी शरणमें गया ॥ ६७-६८ ॥ |
| एष वः कथितो विप्रा वामनस्य पराक्रमः ।<br>स देवकार्याणि सदा करोति पुरुषोत्तमः ॥ ६९ ॥ | ब्राह्मणो ! इस प्रकार यह (भगवान्) वामनके पराक्रमको मैंने बतलाया। ये पुरुषोत्तम सदा देवताओंके कार्योंको करते रहते हैं ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥