भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२८ * कूर्मपुराण *


सत्रहवाँ अध्याय

बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि कन्याओंकी संतानोंका वर्णन

सूत उवाच**सूतजी बोले—**बलिके महान् बल और पराक्रमवाले सौ पुत्र थे, उनमें प्रधान पुत्रका नाम 'बाण' था, जो द्युतिमान् और अत्यन्त बलवान् था। भगवान् शंकरमें अत्यन्त भक्तिवाले उस राजा (बाण)-ने राज्यका पालन करते हुए त्रिलोकीको अपने वशमें करके इन्द्रको पीड़ित किया। तब इन्द्रादि देवता कृत्तिवासा¹ (शंकर)-के पास जाकर कहने लगे—(भगवन्!) आपका भक्त 'बाण' नामक महान् असुर हमें पीड़ित कर रहा है॥ १-३॥
बलेः पुत्रशतं त्वासीन्महाबलपराक्रमम्।<br>तेषां प्रधानो द्युतिमान् बाणो नाम महाबलः॥ १ ॥<br>सोऽतीव शंकरे भक्तो राजा राज्यमपालयत्।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय बाधयामास वासवम्॥ २ ॥<br>ततः शक्रादयो देवा गत्वोचुः कृत्तिवाससम्।<br>त्वदीयो बाधते ह्यस्मान् बाणो नाम महासुरः॥ ३ ॥
व्याहृतो दैवतैः सर्वैर्देवदेवो महेश्वरः।<br>ददाह बाणस्य पुरं शरेणैकेन लीलया॥ ४ ॥<br>दह्यमाने पुरे तस्मिन् बाणो रुद्रं त्रिशूलिनम्।<br>ययौ शरणमीशानं गोपतिं नीललोहितम्॥ ५ ॥<br>मूर्ध्न्याधाय तल्लिङ्गं शाम्भवं भीतिवर्जितः।<br>निर्गत्य तु पुरात् तस्मात् तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ६ ॥सभी देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने एक बाणसे लीलापूर्वक 'बाण' के नगरको दग्ध कर दिया। उस नगरके जलनेपर बाण त्रिशूलधारी, गोपति (वृषवाहन) नीललोहित ईशान रुद्रकी शरणमें गया॥ ४-५॥<br>शम्भुके लिंगको सिरपर धारणकर वह निर्भयतापूर्वक अपने नगरसे बाहर निकल गया और परमेश्वर (शंकर)-की स्तुति करने लगा। स्तुति करनेपर नीललोहित, शंकर भगवान् ईशने स्नेहवश उस बाणासुरको गणपतिका पद प्रदान किया॥ ६-७॥
संस्तुतो भगवानीशः शंकरो नीललोहितः।<br>गाणपत्येन बाणं तं योजयामास भावतः॥ ७ ॥
अथाभवन् दनोः पुत्रास्ताराद्या ह्यतिभीषणाः।<br>तारस्तथा शम्बरश्च कपिलः शंकरस्तथा।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च प्राधान्येन प्रकीर्तिताः॥ ८ ॥<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवद् द्विजाः।<br>अनेकExternal/अनेकशिरसां तद्वत् खेचराणां महात्मनाम्॥ ९ ॥<br>अरिष्टा जनयामास गन्धर्वाणां सहस्त्रकम्।<br>अनन्ताद्या महानागाः काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः॥ १०॥दनुके² तार आदि अत्यन्त भीषण पुत्र हुए। उनमें तार, शम्बर, कपिल, शंकर, स्वर्भानु तथा वृषपर्वा प्रधान कहे गये हैं। द्विजो! दक्षप्रजापतिकी कन्या सुरसाके अनेक फणोंवाले हजार सर्प पुत्ररूपमें हुए। इसी प्रकार अरिष्टाने हजारों आकाशचारी महात्मा गन्धर्वोंको उत्पन्न किया। अनन्त आदि महानाग कद्रूके पुत्र कहे गये हैं॥ ८-१०॥
ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुंगवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवां गृध्रिकां शुचिम्॥ ११ ॥<br>गास्तथा जनयामास सुरभिर्महिषीस्तथा।<br>इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातींश्च सर्वशः॥ १२॥द्विजश्रेष्ठो! ताम्राने छः कन्याओंको जन्म दिया, जो शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवा, गृध्रिका तथा शुचि नामवाली हैं। सुरभिने गौओं तथा महिषियों (भैंसों)-को उत्पन्न किया। इरा ने सभी प्रकारके वृक्ष, लता, वल्ली तथा तृण-जातिवालोंको जन्म दिया। द्विजसत्तमो! खसाने यक्षों तथा राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको और क्रोधवशाने राक्षसोंको उत्पन्न किया॥ ११-१३॥
खसा वै यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।<br>रक्षोगणं क्रोधवशा जनयामास सत्तमाः॥ १३॥

१-कृत्ति (व्याघ्रचर्म)-को वसन (वस्त्र)-रूपमें धारण करनेवाले।
२-'दनु' दक्षप्रजापतिकी कन्या है। इसका विवाह कश्यपसे हुआ था।