भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १८ *१२९
विनतायाश्च पुत्रौ द्वौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ।<br>तयोश्च गरुडो धीमान् तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>प्रसादाच्छूलिनः प्राप्तो वाहनत्वं हरेः स्वयम् ॥ १४॥<br><br>आराध्य तपसा रुद्रं महादेवं तथारुणः।<br>सारथ्ये कल्पितः पूर्वं प्रीतेनार्कस्य शम्भुना ॥ १५॥विनताके दो विख्यात पुत्र हुए—गरुड तथा अरुण। उनमेंसे बुद्धिमान् गरुडने दुस्तर तप करके भगवान् शंकरकी कृपासे साक्षात् हरिके वाहन होनेका सौभाग्य प्राप्त किया। इसी प्रकार पूर्वकालमें अरुणने महादेव रुद्रकी तपस्याद्वारा आराधना की, इससे महादेवने प्रसन्न होकर उसे सूर्यका सारथी बना दिया ॥ १४-१५॥
एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे ह्यस्मिञ्छृण्वतां पापनाशनाः ॥ १६॥इस वैवस्वत मन्वन्तरमें स्थावर तथा जंगम-रूप ये (महर्षि) कश्यपके वंशज कहे गये हैं। इनका वर्णन सुननेवालोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १६॥
सप्तविंशत् सुताः प्रोक्ताः सोमपत्न्यश्च सुव्रताः।<br>अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ १७॥<br><br>बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः।<br>तद्वदङ्गिरसः पुत्रा ऋषयो ब्रह्मसत्कृताः ॥ १८॥<br><br>कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवप्रहरणाः सुताः।<br>एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।<br>मन्वन्तरेषु नियतं तुल्यैः कार्यैः स्वनामभिः ॥ १९॥शोभन व्रतवाले द्विजो ! (दक्षक) सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ कही गयी हैं। अरिष्टनेमिकी पत्नियोंकी सोलह संतानें हुईं। विद्वान् बहुपुत्रके चार विद्युत् नाम-वाले पुत्र कहे गये हैं। इसी प्रकार अङ्गिराके पुत्र ब्रह्मा-द्वारा सम्मान-प्राप्त श्रेष्ठ ऋषि थे। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण अर्थात् देवोंके शस्त्र थे। हजार युगोंका अन्त होनेपर विभिन्न मन्वन्तरोंमें ये अपने नामोंके समान कार्योंके साथ निश्चितरूपसे पुनः उत्पन्न होते हैं ॥ १७—१९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥


अठारहवाँ अध्याय

महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना

सूत उवाच<br>एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासंतानकारणात्।<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार सुमहत् तपः ॥ १॥<br>तस्य वै तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ।<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ ॥ २॥<br>वत्सरान्नध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहाद्यशाः।<br>रैभ्यस्य जज्ञिरे रैभ्याः पुत्रा द्युतिमतां वराः ॥ ३॥<br>च्यवनस्य सुता पत्नी नैध्रुवस्य महात्मनः।<br>सुमेधा जनयामास पुत्रान् वै कुण्डपायिनः ॥ ४॥<br>असितस्यैकपर्णायां बर्हिष्ठः समजायत।<br>नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यो महातपाः ॥ ५॥सूतजी बोले— प्रजाकी अभिवृद्धिके लिये इन पुत्रोंको उत्पन्न कर पुत्राभिलाषी कश्यप अत्यन्त महान् तप करने लगे। कठोर तप कर रहे उनके 'वत्सर' तथा 'असित' नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे नैध्रुव और रैभ्य नामके महान् यशस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। रैभ्यके तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ रैभ्य नामक पुत्र हुआ। च्यवन ऋषिकी (सुमेधा नामवाली) पुत्री महात्मा नैध्रुवकी पत्नी थी। सुमेधाने 'कुण्डपायी' पुत्रोंको उत्पन्न किया। असितकी एकपर्णा नामक पत्नीने बर्हिष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया जो देवल नामवाले थे, वे योगके आचार्य,