संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१३० * कूर्मपुराण *
| शाण्डिल्यानां परः श्रीमान् सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः ।<br>प्रसादात् पार्वतीशस्य योगमुत्तममाप्तवान् ॥ ६ ॥ | महान् तपस्वी शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, श्रीमान्, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले तथा विद्वान् थे। पार्वतीके पति भगवान् शंकरकी कृपासे उन्होंने श्रेष्ठ योग प्राप्त किया ॥ १-६ ॥ |
| शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ।<br>नरप्रकृतयो विप्राः पुलस्त्यस्य वदामि वः ॥ ७ ॥ | शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों शाखाएँ कश्यपवंशीय और मानव प्रकृतिवाली हैं। ब्राह्मणो! आपको अब पुलस्त्य ऋषिके वंशको बताता हूँ। विप्रो! |
| तृणबिन्दोः सुता विप्रा नाम्ना त्विलविला स्मृता ।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ८ ॥ | तृणबिन्दु की एक पुत्री थी जो इलविला नामसे प्रसिद्ध थी। उन राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको प्रदान की। उस |
| ऋषिस्त्वैलविलिस्तस्यां विश्रवाः समपद्यत ।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धिकाः ॥ ९ ॥ | इलविलासे विश्रवा ऋषि उत्पन्न हुए। उनकी पुष्पोत्कटा, राका, कैकसी तथा देववर्णिनी नामकी चार पत्नियाँ थीं, जो पुलस्त्यके वंशको बढ़ानेवाली तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न थीं। अब आप उनकी संतानोंको सुनें— ॥ ७-१० ॥ |
| पुष्पोत्कटा च राका च कैकसी देववर्णिनी ।<br>रूपलावण्यसम्पन्नास्तासां वै शृणुत प्रजाः ॥ १० ॥ | |
| ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्य सुषुवे देवरूपिणी ।<br>कैकसी जनयत् पुत्रं रावणं राक्षसाधिपम् ॥ ११ ॥ | उनकी देवरूपिणी (देववर्णिनी) (नामक पत्नी)-ने ज्येष्ठ वैश्रवण (कुबेर)-को जन्म दिया। कैकसीने राक्षसोंके अधिपति रावण नामक पुत्र और इसी प्रकार |
| कुम्भकर्णं शूर्पणखां तथैव च विभीषणम् ।<br>पुष्पोत्कटा व्यजनयत् पुत्रान् विश्रवसः शुभान् ॥ १२ ॥ | कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषणको जन्म दिया। पुष्पोत्कटाने भी महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व और खर नामक विश्रवाके शुभ पुत्रों और कुम्भीनसी नामक कन्याको जन्म दिया। अब आप राकाकी संतान सुनें— ॥ ११-१३ ॥ |
| महोदरं प्रहस्तं च महापार्श्वं खरं तथा ।<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां राकायां शृणुत प्रजाः ॥ १३ ॥ | |
| त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वो महाबलः ।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा दश ।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टा रुद्रभक्ताः सुभीषणाः ॥ १४ ॥ | त्रिशिरा, दूषण तथा महाबली विद्युज्जिह्व—ये राकाके पुत्र थे। पुलस्त्यके ये सभी दस राक्षस-पुत्र क्रूर कर्म करनेवाले, अत्यन्त भयंकर, उत्कट तपोबलवाले और रुद्रके भक्त थे। मृग, व्याल, दाढ़ोंवाले (प्राणी), भूत, पिशाच, सर्प, शूकर तथा हाथी—ये सभी पुलह (ऋषि)-के पुत्र हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें (महर्षि) क्रतुको संतानहीन कहा गया है। प्रजापति कश्यप मरीचिके पुत्र थे। भृगुके भी शुक्र नामक पुत्र हुए जो दैत्योंके आचार्य, महान् तपस्वी, स्वाध्याय तथा योगपरायण, अत्यन्त तेजस्वी और शंकरके भक्त थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अत्रिकी बहुत-सी पत्नियाँ थीं। वे पतिव्रता तथा आपसमें बहनें थीं। हमने सुना है कि वे घृताचीसे उत्पन्न कृशाश्वकी पुत्रियाँ थीं ॥ १४-१८ ॥ |
| पुलहस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्यालाश्च दंष्ट्रिणः ।<br>भूताः पिशाचाः सर्पाश्च शूकरा हस्तिनस्तथा ॥ १५ ॥ | |
| अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः स्वयमेव प्रजापतिः ॥ १६ ॥ | |
| भृगोरप्यभवच्छुक्रो दैत्याचार्यो महातपाः ।<br>स्वाध्याययोगनिरतो हरभक्तो महाद्युतिः ॥ १७ ॥ | |
| अत्रेः पत्न्योऽभवन् बह्व्यः सोदर्यास्ताः पतिव्रताः ।<br>कृशाश्वस्य तु विप्रेन्द्रा घृताच्यामिति मे श्रुतम् ॥ १८ ॥ | |
| स तासु जनयामास स्वस्त्यात्रेयान् महौजसः ।<br>वेदवेदाङ्गनिरतांस्तपसा हतकिल्बिषान् ॥ १९ ॥ | उन्होंने उन पत्नियोंसे महान् ओजस्वी, वेद-वेदाङ्ग-परायण और तपस्याद्वारा अपने पापोंको नष्ट करनेवाले कल्याणकारी आत्रेयों (स्वस्त्यात्रेयों)-को उत्पन्न किया। नारदने देवी अरुन्धतीको वसिष्ठके लिये प्रदान किया। दक्षके शापसे नारद मुनि ऊर्ध्वरेता हो गये ॥ १९-२० ॥ |
| नारदस्तु वसिष्ठाय ददौ देवीमरुन्धतीम् ।<br>ऊर्ध्वरेतास्तत्र मुनिः शापाद् दक्षस्य नारदः ॥ २० ॥ |